Saturday, December 02, 2017

नशे से इतर भांग की खेती के हैं कई फायदे

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उत्तराखंड की पूर्ववर्ती सरकार ने कारोबारी तौर पर भांग की खेती के लिए कदम उठाए ही थे, कि भद्रजनों और नारकोटिक्स सरीखे विभागों ने कदम उठाने से पहले ही उसके आगे रोड़े ही नहीं, बल्कि एसिड बिखेर दिया। भांग जैसे लाभकारी पौधे को राक्षस नाम दिया जा रहा है। किसी की समझ में नहीं आ रहा है कि जिनको नशा ही करना है उन्हें खेत के भांग की आवश्यकता नहीं होती है। जूं के डर से कपड़े पहनना बंद नहीं किया जाता। वैसे ही नशा व्यापार के डर से भांग उगाने की नीति बंद नहीं की जानी चाहिए। मनुष्य सभ्यता में भांग की खेती पुरातन खेतियों में से एक है। सवाल यह है कि किस तरह भांग का औद्योगिक उत्पादन किया जाए, ताकि आर्थिक क्रान्ति आ सके। एक समय 18वीं सदी में काशीपुर में ईस्ट इंडिया कंपनी की फैक्ट्री के कारण पहाड़ों में भांग खेती में वृद्धि हुई थी। लिहाजा, भांग को निर्यात माध्यम समझकर ही इसे अपनाया जाना चाहिए।

भांग की खेती अनेक लाभ

पर्यावरण संबंधी लाभ
  • ·         भांग कोयला का सर्वोत्तम पर्याय है और इसकी जैविक ईंधन क्षमता कोयले से कहीं अधिक है।
  • ·         उत्तराखंड में अंग्रेजों के आने से पहले भांग उत्तम रेशों के लिए बोया जाता था।
  • ·         भांग से उत्तम कागज बनता था और आज भी कागज उद्योग को संबल दे सकता है।
  • ·         एक एकड़ में बोये जाना वाला भांग 20 सालों में उतना पेपर पल्प दे सकता है, जितना 4.1 एकड़ में उगे पेड़।
  • ·         भांग से बनने वाले कागज में डॉक्सिन युक्त क्लोरीन ब्लीच और वृक्ष पल्प के मुकाबले भांग कागज निर्माण में 75 प्रतिशत कम सल्फ्यूरिक एसिड की आवश्यकता होती है।
  • ·         भांग से बना कागज 7-8 बार रिसाइकल हो सकता है। जब कि वृक्ष के पल्प से बनाया जाने वाले कागज को केवल तीन बार तक रिसाइकल किया जा सकता है।
  • ·         भांग से कागज बनाने से जंगल कटान में कमी लाई जा सकती है।
  • ·         भांग के रेशे किसी भी प्राकृतिक रेशों में ताकतवर व कोमल रेशे हैं।
  • ·         भांग की उत्पादन शक्ति रुई से अधिक है। एक एकड़ में भांग के रेशे रुई से दो से तीन गुना अधिक रेशे पैदा होते हैं।
  • ·         वैसे भांग के कपड़े रुई से अधिक गर्म व अधिक समय तक उपयोगी कपड़े होते हैं।
  • ·         भांग की रस्से नायलोन की रस्सी के मुकाबले अधिक लाभकारी व उपयुक्त होते हैं।
  • ·         भांग कृषि में कीटाणुनाशक दवाईओं की आवश्यकता नहीं पड़ती है।
  • ·         भांग के लिए अनउपजाऊ भूमि भी काम आ सकती है।


कृषि में उपयोग
  • ·         भांग खेती कम उपजाऊ भूमि में भी हो सकती है।
  • ·         निम्नस्तर टीएचसी (टैट्राहाइड्रोकैनाबि न्वाइड्स) वाले भांग उत्पादन से हसीस/नशा पदार्थ नहीं बन सकता है।
  • ·       फसल चक्र हेतु भांग बहुत ही प्रभावकारी फसल है। (उत्तरखंड में मकई के साथ भांग का बोया जाना विज्ञान सम्मत विधि है)। लोबिया को भी भांग के फसल चक्र से लाभ मिलता है।
  • ·        भांग खेती हेतु 90-110 दिन ही चाहिए।
  • ·       भांग 16 फीट की ऊंचाई तक जा सकता है। जड़ एक फीट गहराई तक जाता है और भूमि की गहराई से पोषक तत्व खींचने में कामयाब पौधा है। फिर जब भांग के पत्ते भूमि में गिरते हैं और सड़ते हैं, या जलाकर राख बनते हैं तो ये पत्ते बाद वाली फसल को पोषक तत्व देते हैं। भांग की जड़ें एक फीट गहरे जाने से भांग भूमि के अंदर जुताई करने में सक्षम है।
  • ·        भांग एक ही खेत में सालों साल तक बोने की बाद भी उत्पादनशीलता में कमी नहीं आती है।
  • ·        भांग में अल्ट्रा वायलेट किरण प्रतिरोधक शक्ति सोयाबीन आदि से अधिक होती है।
  • ·        भांग खरपतवार नहीं जमने देता है।


भांग के तेल के लाभ
  • ·         भांग तेल हारमोन संतुलन में सहायक होता है।
  • ·         भांग तेल स्किन प्रोटेक्टिव लेयर को ऊर्जा देता है।
  • ·         भांग तेल कोलेस्ट्रॉल कम करने में सहायक है।
  • ·         भांग तेल डाइबिटीज में भी लाभकारी हो सकता है।
  • ·         भांग तेल सोराइसिस में लाभकारी हो सकता है।
  • ·         भांग का तेल रोधक शक्ति वृद्धि में काम आता है।


भांग के बीजों के लाभ
  • ·         भांग के बीजों में अन्य तेलीय बीजों की तुलना में 34 प्रतिशत अधिक तेल होता है।
  • ·         अन्य तेलों के मुकाबले भांग का तेल व्हेल के तेल के बाद सबसे अधिक लाभकारी होता है।
  • ·         भांग तेल में सल्फर नहीं होता है।
  • ·         भांग के बीजों को निटारने के बाद जो खली बचता है, उसमें सोयाबीन से अधिक प्रोटीन होता है। मसाले व अन्य भोज्य के रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है।
  • ·         तिल, सरसों आदि की खली की तरह इसकी पिंडी जानवरों के लिए हितकारी है।


भांग के अन्य उपयोग
  • ·         ड्रेस मैटिरियल्स, मैट्स, फैशनेबल थैले,
  • ·         बोर्ड, कई प्रकार के इंसुलेटर वस्तुएं,
  • ·         कंक्रीट ब्लॉक्स, फाइबर ग्लास में मिश्रण हेतु माध्यम,
  • ·         गहने, जानवरों के गद्दे /बिस्तर आदि।

 आलेख- भीष्म कुकरेती, मुंबई।


Wednesday, November 29, 2017

जादूगर खेल दिखाता है

जादूगर खेल दिखाता है
अपने कोट की जेब से निकालता है एक सूर्ख फूल
और बदल देता है उसे पलक झपकते ही नुकीले चाकू में
तुम्हें लगता है जादूगर चाकू को फिर से फूल में बदल देगा
पर वो ऐसा नहीं करता
वो अब तक न जाने कितने फूलों को चाकुओं में बदल चुका है।

जादूगर पूछता है कौन सी मिठाई खाओगे ?
वो एक खाली डिब्बा तुम्हारी ओर बढ़ाता है
तुमसे तुम्हारी जेब का आखिरी बचा सिक्का उसमें डालने को कहता है
और हवा में कहीं मिठाई की तस्वीर बनाता है
तुम्हारी जीभ के लार से भरने तक के समय के बीच
मिठाई कहीं गुम हो जाती है
तुम लार को भीतर घूटते हो
कुछ पूछने को गला खंखारते हो
तब तक नया खेल शुरू हो जाता है।

जादूगर कहता है
मान लो तुम्हारा पड़ोसी तुम्हें मारने को आए तो तुम क्या करोगे ?
तुम कहते हो, तुम्हारा पड़ोसी एक दयालू आदमी है
जादूगर कहता है, मान लो
तुम कहते हो, आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ
जादूगर कहता है, मान लो मानने में क्या जाता है?
तुम पल भर के लिए मानने को राजी होते हो
तुम्हारे मानते ही वह तुम्हारे हाथ में हथियार देकर कहता है
इससे पहले कि वो तुम्हें मारे, तुम उसे मार डालो
जादूगर तुम्हारे डर से अपने लिए हथियार खरीदता है।

जादूगर कहता है
वो दिन रात तुम्हारी चिंता में जलता है
वो पल-पल तुम्हारे भले की सोचता है
वो तुम्हें तथाकथित उन कलाओं के बारे में बताता है
जिनसे कई सौ साल पहले तुम्हारे पूर्वजों ने राज किया था
वो उन कलाओं को फिर से तुम्हें सिखा देने का दावा करता है

वो बडे़-बडे़ पंडाल लगाता है
लाउडस्पीकर पर गला फाड़ फाड़कर चिल्लाता है
भरी दोपहरी तुम्हें तुम्हारे घरों से बुलाकर
स्वर्ग और नरक का भेद बताता है
तुम्हारे बच्चों के सिरों के ऊपर पैर रखकर भाषण देता है
तुम अपने बच्चों के कंकालों की चरमराहट सुनते ही
उन्हें सहारा देने को दौड़ लगाते हो
गुस्से और नफरत से जादूगर की ओर देखते हो
तुम जादुगर से पूछना चाहते हो उसने ऐसा क्यों किया
इस बीच जादूगर अदृश्य हो जाता है
उसे दूसरी जगह अपना खेल शुरू करने की देर हो रही होती है।

कविता-  रेखा
साभार- सुभाष तराण

                    ये जो निजाम है

‘लोक’ की भाषा और संस्कृति को समर्पित किरदार


ब्यालि उरडी आई फ्योंली सब झैड़गेन/किनगोड़ा, छन आज भी हंसणा...।
बर्सु बाद मी घौर गौं, अर मेरि सेयिं कुड़ि बिजीगे...।
जंदरि सि रिटणि रैंद, नाज जन पिसैणि रैंद..।
परदेश जैक मुक न लुका, माटा पाणी को कर्ज चुका..।
इन रचनाओं को रचने वाली शख्सियत है अभिनेता, कवि, लेखक, गजलकार, साहित्यकार मदनमोहन डुकलान। जो अपनी माटी और दूधबोली की पिछले 35 वर्षों से सेवा कर रहे हैं।
10 मार्च 1964 को पौड़ी जनपद के खनेता गांव में श्रीमती कमला देवी और गोविन्द राम जी के घर मदन मोहन डुकलान का जन्म हुआ था। जब ये महज पांच बरस के थे, तो अपने पिताजी के साथ दिल्ली चले गए। इन्होंने 10वीं तक की पढ़ाई दिल्ली में ग्रहण की। जबकि 12वीं देहरादून से और स्नातक गढ़वाल विश्वविद्यालय से। बेहद सरल, मिलनसार स्वभाव और मृदभाषी ब्यक्तित्व है इनका। जो एक बार मुलाकात कर ले जीवनभर नहीं भूल सकता है इन्हें। क्योंकि पहली मुलाकात में ये हर किसी को अपना मुरीद बना देते हैं। यही इनकी पहचान और परिचय है।

बचपन से ही बहुमुखी प्रतिभा के धनी मदन मोहन डुकलान अपने पिताजी के साथ जब दिल्ली आये, तो उसके बाद उनका अपने गांव और पहाड़ जाना बहुत ही कम हो गया था। इनके पिताजी दिल्ली में आयोजित रामलीला के दौरान मंच का संचालन किया करते थे। वे अक्सर अपने पिताजी के साथ रामलीला में मंचों पर जाते रहते थे। जिस कारण इनका झुकाव अभिनय की तरफ हो गया था।

रामलीला में ही अभिनय का पहला पात्र उनके हिस्से में आया पवनपुत्र हनुमान के वानर सेना के वानर सदस्य के रूप में। जिसको उन्होंने बखूबी निभाया। जिसके बाद से उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और आज अभिनय में उनका कोई सानी नहीं। डुकलान जब दिल्ली में 10वीं की पढाई कर रहे थे तो कविताओं के प्रति उनके रुझान को देखते हुए उनकी अध्यापिका ने उन्हें कविता लिखने को प्रोत्साहित किया। जिसके बाद उन्होंने कई हिंदी कविताएं लिखी। दिल्ली से शुरू हुआ उनके कविता लिखने का सफर आज भी बदस्तूर जारी है।

जब वे बीएससी द्वितीय वर्ष में अध्यनरत थे तो तभी महज 19 बरस की आयु में उनका चयन ओएनजीसी में हो गया था। ओएनजीसी में नौकरी के दौरान उन्हें बहुत सारे मित्र मिले, जो रंगमंच के हितैषी थे और कई लोगों ने उन्हें प्रोत्साहित भी किया। जो आज भी उनके साथ रंगमंच में बड़ी शिद्दत से जुटे हुए हैं।

उनकी अपनी बोली भाषा के प्रति प्रेम और समर्पण को देखकर नहीं लगता की उनका बचपन अपनी माटी से बहुत दूर गुजरा हो। लेकिन यही हकीकत है कि उन्होंने माटी से दूर रहने के बाद भी अपनी माटी को नहीं बिसराया। वो हिंदी में बहुत अच्छा लिखते थे। 80 के दशक में मध्य हिमालय के देहरादून, पौड़ी, श्रीनगर, सतपुली, कोटद्वार, हरिद्वार, रामनगर जैसे छोटे बडे़ नगरों में धाद के संस्थापक लोकेश नवानी गढ़वाली बोली भाषा के संरक्षण, संवर्धन के लिए प्रयासरत थे। इसी दौरान इनकी मुलाकात लोकेश नवानी जी के साथ हुई। जो इनके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटना थी। जिसने इनके जीवन की दिशा बदल कर रख दी।

लोकेश नवानी जी ने मदन मोहन डुकलान को गढ़वाली भाषा के साहित्य के बारे में विस्तार से बताया और उन्हें गढ़वाली में लिखने के लिए प्रोत्साहित किया। जिसके बाद से डुकलान अपनी दुधबोली भाषा के संरक्षण और संवर्धन में लगे हुए हैं। वे विगत 35 बरसों से अभिनय से लेकर काव्य संग्रहों और कवि सम्मेलनों के जरिये अपनी दुधबोली भाषा और साहित्य को नई ऊंचाइया देते आ रहे हैं।

उन्होंने अपनी दुधबोली भाषा के लिए हिंदी का मोह त्याग दिया, नहीं तो हिंदी कवियों में आज वे अग्रिम कतार में खड़े रहते। इसके अलावा गढ़वाली में गजल विधा का प्रयोग करने वाले वे शुरूआती दौर के रचनाकारों में थे। जो कि गढ़वाली साहित्य में अपने तरह का अलग प्रयास था। इस विधा को गढ़वाली साहित्य में स्थान दिलाने में उनका अहम् योगदान रहा है। पौड़ी से लेकर देहरादून और दिल्ली में आयोजित होने वाले गढ़वाली कवि सम्मेलनों में आपको मदन मोहन डुकलान की उपस्थिति जरूर दिखाई देती है।
बकौल डुकलान बोली भाषा के संरक्षण, संवर्धन के लिए सम्मिलित प्रयासों की नितांत आवश्यकता है। बच्चों को अपनी बोली भाषा में लेखन, संगीत, नाटकों से जोड़ा जाना चाहिए। यही हमारी पहचान है। युवाओं को खुद भी इस दिशा में आगे आना चाहिए।

वास्तव में देखा जाय तो मदन मोहन डुकलान का गढ़वाली साहित्य के संरक्षण और संवर्धन में अमूल्य योगदान रहा है। वह विगत 35 बरसों से न केवल बोली भाषा के मजबूत स्तभ बने हुए हैं, अपितु सांस्कृतिक व साहित्यिक गतिविधियों से लेकर रंगमंच तक निरंतर सक्रिय भूमिका निभा रहें हैं। गढ़वाली साहित्य के प्रचार प्रसार में भी उनका योगदान अहम रहा है।

उत्तराखंड में लोकभाषा, संस्कृति, समाज की निस्वार्थ सेवा करने वाले बहुत ही कम लोग हैं। ऐसे में मदन मोहन डुकलान और अन्य साहित्यकारों के कार्यों को लोगों तक नहीं पहुंचा सके तो नई पीढ़ी कैसे इनके बारे में जान पाएगी।

इनके खाते में दर्ज सृजन के कई दस्तावेज
अगर मदन मोहन डुकलान के सृजन संसार पर एक सरसरी निगाहें डाले तो साफ पता चलता है कि अपनी बोली भाषा के लिए उनका योगदान अतुलनीय है। उन्होंने जहां पहला गढ़वाली कविता पोस्टर बनाया, तो वहीं अपनी दुधबोली भाषा के प्रति असीम प्रेमभाव दिखाते हुए अपने संसाधनों से गढ़वाली त्रैमासिक पत्रिका चिट्ठी-पत्रिका निरंतर प्रकाशन किया। इस पत्रिका के जरिये उन्होंने कई लोगों को एक मंच भी प्रदान किया। जबकि ये पत्रिका विशुद्ध रूप से अव्यवसायिक है। उन्होंने ग्वथनी गौं बटे’ (18 कवियों को कविता संग्रह), ‘अंग्वाल’ (वृहद् गढ़वाली कविता संकलन), ‘हुंगरा’ (100 गढ़वाली कथाओं का संग्रह) का संपादन किया। वहीं आंदि-जांदि सांस (गढ़वाली कविता संग्रह), अपणो ऐना अपणी अन्वार (गढ़वाली कविता संग्रह), चेहरों के घेरे (हिंदी कविता संग्रह), इन दिनों (हिंदी कवियों का सह-संकलन), प्रयास (हिंदी कवियों का सह-संकलन) जैसी ख्याति प्राप्त पुस्तकें लिखीं। जो उनकी प्रतिभा को चरितार्थ करती हैं।

इन सम्मानों ने बढ़ाया मदन मोहन का मान
उन्हें रंगमंच से लेकर अपनी बोली भाषा और साहित्य की सेवा के लिए कई सम्मानों से भी सम्मानित किया जा चूका है। जिसमें उत्तराखंड संस्कृति सम्मान, दूनश्री सम्मान, डॉ. गोविन्द चातक सम्मान (उत्तराखंड भाषा संस्थान), उत्तराखंड शोध संस्थान सम्मान, सर्वश्रेठ अभिनेता (नाटक- प्यादा), गोकुल आर्ट्स नाट्य प्रतियोगिता, वाराणसी, सर्वश्रेठ अभिनेता (फिल्मः याद आली टिरी) - यंग उत्तराखंड सिने अवार्ड, सर्वश्रेठ अभिनय- नेगेटिव रोल (फिल्मः अब त खुलली रात) - यंग उत्तराखंड सिने अवार्ड, यूथ आइकॉन अवार्ड के बाद कुछ दिन पहले गढ़वाली भाषा के लिए देश की राजधानी दिल्ली में कन्हैयालाल डंडरियाल साहित्य सम्मान 2017 भी शामिल है।

आलेख- संजय चौहान, युवा पत्रकार।

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Thursday, November 16, 2017

17 साल बाद भी क्यों ‘गैर’ है ‘गैरसैंण’

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गैरसैंण एकबार फिर से सुर्खियों में है। उसे स्थायी राजधानी का ओहदा मिल रहा है? जी नहीं! अभी इसकी दूर तक संभवनाएं नहीं दिखती। सुर्खियों का कारण है कि बर्तज पूर्ववर्ती सरकार ही मौजूदा सरकार ने दिसंबर में गैरसैंण में एक हफ्ते का विधानसभा सत्र आहूत करने का निर्णय लिया है। जो कि सात से 13 दिसंबर तक चलेगा। विस सत्र में अनुपूरक बजट पास किया जाएगा। इसके लिए आवश्यक तैयारियां भी शुरू कर दी गई हैं। तो दूसरी तरफ गैरसैंण पर सियासत भी शुरू हो गई है। 
कांग्रेस और यूकेडी नेताओं ने जहां भाजपा सरकार की नियत पर प्रश्नचिह्न लगाए हैं, वहीं भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने भी जनभावनाओंके अनुरूप निर्णय लेने की बात को दोहरा भर दिया है।

दरअसल, उत्तराखंड के पृथक राज्य के रूप में अस्तित्व में आने से अब तक गैरसैंण के मुद्दे पर कांग्रेस और भाजपा का अतीत सवालों में रहा है। दोनों दल उसे स्थायी राजधानी बनाने के पक्षधर हैं, ऐसा कभी नहीं लगा। यूकेडी ने राज्य आंदोलन के दौरान गैरसैंण को पृथक राज्य की स्थायी राजधानी बनाने के संकल्प के तहत जरूर उसे वीर चंद्रसिंह गढ़वाली के नाम पर चंद्रनगर का नाम दिया। लेकिन बीते 17 सालों के दौरान दो सरकारों में भागीदारी के बावजूद वह इस पर निर्णायक दबाव पैदा नहीं कर सकी।

उत्तराखंड में अन्य राजनीतिक पार्टियों का कोई मजबूत जमीनी आधार नहीं, इसलिए वह भी सड़क के आंदोलन तो दूर आम लोगों को गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने के लाभ तक नहीं बता पाएं हैं। जिसके चलते गैरसैंण के मसले पर जनमत तैयार होने जैसी कोई बात अब तक सामने नहीं आई है। हाल के वर्षों में कुछ स्थानीय और प्रवासी युवाओं ने इस मुद्दे पर खासकर पर्वतजन के बीच वैचारिक पृष्ठभूमि तैयार करने की कोशिशें की हैं और प्रयासरत भी हैं। मगर, संसाधनों के लिहाज से वह भी कुछ दूर आगे बढ़ने के बाद निराश होकर लौटते हुए लग रहे हैं।

इसबीच राज्य में चार बार हुए चुनावों के नतीजों को देखें, तो जिस पहाड़ की खातिर गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग उठ रही है, उसके दिए चुनाव परिणाम कहीं से भी इसके पक्ष में नहीं दिखे। निश्चित तौर पर इसका पूरा लाभ अब तक सत्तासीन रही कांग्रेस और भाजपा ने अपने-अपने तरीके से उठाती रही।

पिछली कांग्रेस सरकार जहां मैदानी वोटों के खतरे से डरकर गैरसैंण पर निर्णायक फैसला नहीं ले सकी, उसी तरह भाजपा भी डरी हुई ही लग रही है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट का जनभावनाओं वाला ताजा बयान और गैरसैंण में सिर्फ सत्र का आयोजन इसी तरफ इशारा कर रहा है।


लिहाजा, इतना तो स्पष्ट है कि गैरसैंण स्थायी राजधानी के मसले पर जहां कांग्रेस की पैंतरेबाजी सिर्फ सियासत भर लग रही है, वहीं भाजपा की टालमटोल को समझें तो उसके लिए भी गैरसैंण पहले की तरह अब भी गैरही है। सो, ... आगे-आगे देखिए होता है क्या?
आलेख- धनेश कोठारी

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Wednesday, November 01, 2017

उत्तराखंड में एक और फूलों की घाटी ‘चिनाप’

विश्व प्रसिद्ध फूलों की घाटी से तो हर कोई परिचित है। लेकिन इससे इतर एक और फूलों की जन्नत है चिनाप घाटी। जिसके बारे में शायद बहुत ही कम लोगों को जानकारी होगी। सीमांत जनपद चमोली के जोशीमठ ब्लाक में स्थित है कुदरत की ये गुमनाम नेमत। जिसका सौंदर्य इतना अभिभूत कर देने वाला है कि देखने वाला इसकी सुंदरता से हर किसी को ईर्ष्या होने लगे।

गौरतलब है ये घाटी चमोली के जोशीमठ ब्लाक के उर्गम घाटी, थैंग घाटी व खीरों घाटी के मध्य हिमालय की हिमाच्छादित चोटियों की तलहटी में 13 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां पर 300 से अधिक प्रजाति के फूल बेपनाह सुंदरता और खुशबू बिखेरे रहते हैं। पुराणों में भी इसकी सुंदरता और खुशबू के बारे में वर्णन है। जिसमें कहा गया है कि यहां के फूलों की सुंदरता व खुशबू के सामने बद्री नारायण और गंधमान पर्वत के फूलों की सुंदरता व खुशबू न के बराबर है। वैसे इस घाटी की सुंदरता 12 महीने बनी रहती है। लेकिन खासतौर पर जुलाई से लेकर सितंबर के दौरान खिलने वाले असंख्य फूलों से इस घाटी का अविभूत कर देने वाला सौंदर्य बरबस ही हर किसी को अपनी ओर खींचने को मजबूर कर देता है।

इस घाटी की सबसे बड़ी विशेषता यह है की यहां पर फूलों की सैकड़ों क्यारियां मौजूद हैं। जो लगभग पांच वर्ग किमी के दायरे में फैली हैं। हर क्यारी में 200 से लेकर 300 प्रकार के प्रजाति के फूल खिलतें हैं। जिनको देखने के बाद ऐसा प्रतीत होता है की इन कतारनुमा फूलों की क्यारियों को खुद कुदरत ने अपने हाथों से फुरसत में बड़े सलीके से बनाया हो।

फूलों की इस जन्नत में कई दुर्लभ प्रजाति के हिमालयी फूल के अलावा बहुमूल्य वनस्पतियां व जड़ी बूटियां पाई जाती हैं। इसके अलावा राज्यपुष्प ब्रह्मकमल की तो तो यहां सैकड़ों क्यारियां पाई जाती हैं जो इसके सुंदरता में चार चांद लगा देती हैं। साथ ही इस घाटी से चारों ओर हिमालय का नयनाभिराम और रोमांचित कर देना वाला दृश्य दिखाई देता है। लेकिन आज भी फूलों की ये जन्नत देश और दुनिया की नजरों से ओझल है। राज्य बनने के 17 साल बाद भी सूबे के नीति नियंताओं की नजरें प्रकृति की इस अनमोल नेमत पर नहीं पड़ी। जबकि ये घाटी सूबे के पर्यटन के लिए मील का पत्थर साबित हो सकतीं हैं।

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प्रकृति प्रेमी, अधिवक्ता और गांव के युवा दिलबर सिंह फरस्वाण कहते हैं कि चिनाप फूलों की घाटी को पर्यटन मानचित्र पर लाने के लिए ग्रामीण कई बार जनप्रतिनिधियों से लेकर जिले के आलाधिकारी से मांग कर चुके हैं। लेकिन नतीजा सिफर रहा। यदि चिनाप फूलों की घाटी को पर्यटन के रूप में विकसित किया जाता है, तो आने वाले सालों में उत्तराखंड में सबसे अधिक पर्यटक यहां का रुख करेंगें। चिनाप फूलों की घाटी के साथ-साथ यहां पर फुलारा बुग्याल, गणेश मंदिर, सोना शिखर जैसे दर्शनीय स्थलों का दीदार किया जा सकता है। जबकि हेलंग, उर्गम, चेनाप, खीरों, होते हुए हनुमान चट्टी पैदल ट्रेकिंग किया जा सकता है। साथ ही बदरीनाथ तक भी ट्रेकिंग किया जा सकता है। ये ट्रैक पर्वतारोहियों के लिए किसी रोमांच से कम नहीं है।

वहीं जोशीमठ ब्लाक के ब्लाक प्रमुख प्रकाश रावत कहतें है कि चिनाप जैसे गुमनाम स्थलों को देश और दुनिया के सामने लाया जाना अति आवश्यक है। क्योंकि इससे न केवल पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा बल्कि स्थानीय लोगों के लिए भी रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। उन्होंने चिनाप घाटी को भी द्रोणागिरी की तर्ज पर टै्रक ऑफ द ईयर घोषित करने की मांग की है। ताकि देश और दुनिया की नजरों से ओझल ये घाटी पर्यटन के मानचित्र पर आ सके।

वास्तव मे हमारे उत्तराखंड में चिनाप घाटी जैसे दर्जनों स्थल ऐसे हैं, जो पर्यटन के लिहाज से मील का पत्थर साबित हो सकतें हैं। लेकिन नीति नियंताओं ने कभी भी इनकी सुध नहीं ली। यदि ऐसे स्थानों को चिह्नित करके इन्हें विकसित किया जाए, तो इससे न केवल पर्यटक यहां का रूख करेंगे, अपितु रोजगार के अवसरों का सृजन भी होगा। सरकार को चाहिए की तत्काल ऐसे स्थानों के लिए वृहद कार्ययोजना बनाए।

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आलेख- संजय चौहान, पीपलकोटी

Monday, October 30, 2017

शिकायतें तब भी थीं, अब भी हैं

 उत्तराखंड अलग राज्य बनने से पहले यूपी सरकार को लेकर जितनी शिकायतें पर्वतजनके मानस पर अंकित थीं, उससे कहीं अधिक शिकायतें हल होने के इंतजार में अपनी ही सरकारों का मुहं तक रही हैं। कारण, 17 वर्षों में निस्तारण की बजाए उनकी संख्या ज्यादा बढ़ी है। जिसकी तस्दीक सरकारी आंकड़े करते हैं। यानि कि राज्य निर्माण की उम्मीदें अब तक के अंतराल में टूटी ही हैं।

आलम यह रहा कि 17 सालों में पलायन की रफ्तार दोगुनी तेजी से बढ़ी। अब तक करीब 30 हजार से अधिक गांव वीरान हो गए हैं। कई तो मानवविहीन बताए जा रहे हैं। ढाई लाख घरों में ताले लटक चुके हैं। पर्वतीय क्षेत्रों से करीब इस वक्फे में जहां 14 फीसदी आबादी कम हुई, तो राज्य के मैदानी इलाकों में यह छह प्रतिशत से अधिक बढ़ी। नतीजा, पहाड़ को जनप्रतिनिधित्व के तौर पर छह सीटें गंवानी पड़ी हैं, जिसमें 2026 में लगभग 10 सीटें और कम होने का अनुमान है।

हाल के चुनाव आयोग के आंकड़ों को समझें, तो हरदिन 250 लोग पहाड़ों से पलायन कर रहे हैं। अक्टूबर 2016 से सितंबर 2017 तक राज्य में 1,57,672 नाम वोटर लिस्ट से कटे और 11,704 डुप्लीकेट मिले। वहीं, 9,822 नामों को शिफ्ट किया गया। जबकि इसी दरमियान वोटर लिस्ट में अंकित 3,13,096 में से अधिकांश नाम राज्य के मैदानी इलाकों से जुड़े हैं।

इन स्थितियों के बीच हाल में पलायन के कारणों की पड़ताल (जो कि सर्वविदित हैं) के लिए सरकार ने आयोग गठित किया है। आयोग कैसे काम करते हैं, उनका निष्कर्ष कितना लाभकारी होता है, यह पूर्व मे राज्य की स्थायी राजधानी के बारे गठित आयोग की रिपोर्टों और निष्कर्षों से समझना मुश्किल नहीं। खैर, पलायन आयोग मूल तथ्यों को मैनेज किए बिना कम समय में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप देगा, और सरकार ठोस कदम उठाएगी, इसकी फिलहाल उम्मीद ही की जा सकती है।

आलेख- धनेश कोठारी

Saturday, October 28, 2017

सिर्फ आलोचना करके तो नहीं जीत सकते

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उत्तराखंड क्रांति दल खुद को अपनी आंदोलनकारी संगठनकी छवि से मुक्त कर एक जिम्मेदार और परिपक्व राजनीतिक पार्टी के रूप में स्थापित करना चाहता है। इसके पीछे निश्चित ही उसके तर्क हैं। जिन्हें अनसुना तो कम से कम नहीं किया जा सकता है। मगर, अतीत में आंदोलनकारी संगठन और फिर सियासी असफलताओं के आलोक में उसके लिए मनोवांछित कायाकल्पआसान होगा?
यूकेडी जिस फार्मेट में अब सामने आना चाहती है, उसका यह नया अवतार जनमन को स्वीकार्य होगा? राज्य के मौजूदा सियासी परिदृश्य में कोई स्पेस बाकी है? खासकर तब जब 17 बरसों में कांग्रेस और भाजपा ने जनता के बीच खुद को लगभग एक-दूसरे का पूरक मनवा लिया हो।

पृथक उत्तराखंड की लड़ाई में उक्रांद के संघर्ष को कौन भला नकार सकता है। 1994 के राज्य आंदोलन का अगवा भी लगभग वही रहा। परिणाम निकला और नौ नवंबर सन् 2000 में आखिरकार अलग राज्य की नींव पड़ी। तब नेशनल मीडिया तक ने उत्तराखंड में यूकेडी को तीसरी ताकत के तौर पर विशेष तौर से पेश किया। अलग राज्य में सन् 2002 के पहले विधानसभा चुनाव में दल को जनता ने चार सीटें दीं। किंतु, वह अगले पांच साल में खुद को एक राजनीतिक दल के तौर पर नहीं उबार सकी।

वर्ष 2007 में एक सीट और घटकर तीन ही रह गई। सबक तब भी नहीं लिया और समूची पार्टी भाजपा के आगे लमलेट हो गई। हालांकि तब भाजपा को नौ बिंदुओं पर सहमति के आधर पर समर्थन देने का तर्क दिया गया। जो आज भी अधूरे हैं। कैबिनेट में शामिल होने के बाद भी दिवाकर भट्ट (जो कि वर्तमान में पार्टी अध्यक्ष हैं) पार्टी को इसका लाभ नहीं दिला सके। तीसरी विस (2012) में बमुश्किल एक सीट मिली, तो एकमात्र विधायक प्रीतम सिंह पंवार पूरे पांच साल कांग्रेस की गोद में बैठे रहे।

इससे पूर्व और 17 साल के वक्फे में लीडरशिप के बीच वर्चस्व के लिए संघर्ष, पार्टी में बिखराव, नए धड़ों का गठन सबकुछ हुआ। नतीजा, जनता में बची कुछ प्रतिशत सिंपैथीभी 2017 आने तक जाती रही। पहले ही पार्टी छोड़ चुके प्रीतम सिंह पंवार निर्दलीय विस पहुंचे, तो भाजपा में शामिल दिवाकर भट्ट और ओमगोपाल रावत ने टिकट न मिलने पर चुनाव मैदान में निर्दलीय उतरने पर हार का सामना किया।

खैर, इस फजीहत ने बिखरे धड़ों को फिर से एकमंच आने को मजबूर किया। जिसकी कमान फील्ड मार्शल दिवाकर भट्ट को मिली है। जबकि काशी सिंह ऐरी, त्रिवेंद्र पंवार, पुष्पेश त्रिपाठी ने संयोजक के रूप में नई जिम्मेदारियों को संभाला है। अब शीर्ष नेतृत्व गलतियों को स्वीकार कर अपने चेहरे-मोहरे को एक सियासी दल के रूप में बदलने की बात कह रहा है। पार्टी पर्वतीय जिलों को फोकस में रखकर गांवों तक सांगठनिक विस्तार और खासकर युवाओं को यूकेडी के करीब लाने की रणनीति की बात पर काम कर रही है। साथ ही उसने अपनी भाषा और तौर तरीकों को भी रूपांतरित करने की ठानी है।

मगर, इससे इतर एक बात कि वह आज भी विरोधियों की आलोचनाओं के मायाजाल से बाहर नहीं निकल पा रही है। भाजपा-कांग्रेस के विरूद्ध आलोचना के इस राग में उसके पुराने सेंटेंस ही दोहराए जा रहे हैं। जबकि पिछले 17 बरसों में राज्य में घोटालों की लिस्ट लंबी हुई है। खनन, शराब, शिक्षा और यहां तक कि नीतियों को प्रभावित करने में माफियातंत्र पहले से अधिक हावी दिखता है। बेपटरी कानून व्यवस्था के चलते उत्तराखंड अपराधियों की शरणस्थली बनने लगा है। पलायन ने पहाड़ी गांवों को खाली कर दिया, तो मैदान बाहर से आई भीड़ से पट रहे हैं।

बावजूद इसके यूकेडी के तेवरों में मुखरता नहीं दिख रही। गैरसैंण स्थायी राजधानी क्यों के युवाओं के सवाल पर वह अपना पक्ष और तर्क मजबूती से नहीं रख पा रही है। पहाड़ों में स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, बिजली, पानी, खेती, रोजगार आदि के लिए उसने कोई ब्लू पिं्रट तैयार किया है या नहीं, कोई नहीं जानता। तकनीकी युग और प्रोपगंडे के इस दौर में वह भाजपा और कांग्रेस का मुकाबला किस तरह करेगी, इसपर उसकी कोई तैयारी नहीं दिखती है। वह सिर्फ आलोचनाओंके बूते चुनावों जीतने का ख्वाब देख रही है। जिसके कामयाब होने में फिलहाल तो शंका है।

आलेख- धनेश कोठारी 

Saturday, October 21, 2017

जहां बिखरी है कुदरत की बेपनाह खूबसूरती

उत्तराखंड के हिमालय में कई छोटे-बड़े बुग्याल मौजूद हैं। औली, गोरसों बुग्याल, बेदनी बुग्याल, दयारा बुग्याल, पंवालीकांठा, चोपता, दुगलबिट्टा सहित कई बुग्याल हैं, जो बरबस ही सैलानियों को अपनी और आकर्षित करते हैं। लेकिन इन सबसे अलग बेपनाह हुस्न और अभिभूत कर देने वाला सौंदर्य को समेटे सीमांत जनपद चमोली के देवाल ब्लाक में स्थित आली बुग्याल आज भी अपनी पहचान को छटपटाता नजर आ रहा है। प्रकृति ने आली पर अपना सब कुछ लुटाया है, लेकिन नीति नियंताओं की उदासीनता के कारण आज आली हाशिए पर चला गया है।

जान लें कि पहाड़ों में जहां पेड़ समाप्त होने लगतें हैं यानि की टिंबर रेखा, वहां से हरे भरे मखमली घास के मैदान शुरू हो जाते हैं। आपको यहीं पर स्नो और ट्री लाइन का मिलन भी दिखाई देगा। उत्तराखंड में घास के इन मैदानों को बुग्याल कहा जाता है। ये बुग्याल बरसों से स्थानीय लोगों के लिए चारागाह के रूप में उपयोग में आतें हैं। जिनकी घास बेहद पौष्टिक होती हैं। इन मखमली घासों में जब बर्फ की सफेद चादर बिछती है, तो ये किसी जन्नत से कम नजर नहीं आते हैं। इन बुग्यालों में आपको नाना प्रकार के फूल और वनस्पति लकदक दिखाई देंगे। हर मौसम में बुग्यालों का रंग बदलता रहता है। बुग्यालों से हिमालय का नजारा ऐसे दिखाई देता है, जैसे किसी कलाकार ने बुग्याल, घने जंगलों और हिमालय के नयनाभिराम शिखरों को किसी कैनवास पर उतारा है। बुग्यालों में कई बहुमूल्य औषधि युक्त जडी-बू्टियां भी पाई जाती हैं। इसके साथ-साथ हिमालयी भेड़, हिरण, मोनाल, कस्तूरी मृग जैसे जानवर भी देखे जा सकते हैं।

चमोली के देवाल ब्लाक में स्थित आली बुग्याल तक पहुंचने के लिए कर्णप्रयाग से लगभग 100 किमी वाहन में जाना पड़ता है। कर्णप्रयाग से नारायणबगड़, थराली, देवाल, मुंदोली होते हुए अंतिम गांव वाण पहुंचा जाता है। जबकि वाण गांव से आली तक का सफर पैदल ही तय करना पड़ता है। वाण गांव से थोड़ा ऊपर जाने पर लाटू देवता का पौराणिक मंदिर है। जिसके कपाट पूरे साल में केवल एक ही दिन के लिए खुलते हैं। हिमालयी महाकुंभ नंदा देवी राजजात यात्रा में लाटू देवता से अनुमति मिलने के बाद ही राजजात आगे बढती है। लाटू देवता को मां नंदा का धर्म भाई माना जाता है और राजजात में यहां से आगे नंदा का पथ प्रदर्शक लाटू ही होता है।

लाटू मंदिर के बाद रणकधार नामक जगह आती है। फिर आगे नील गंगा, गैरोली पाताल, डोलियाधर होते हुए बांज, बुरांस, कैल के घने जंगलों, नदी, पशु, पक्षियों के कलरव ध्वनियों के बीच 13 किमी पैदल चलने के उपरान्त 12 हजार फीट की ऊंचाई पर आली और बेदनी के मखमली बुग्याल के दीदार होते हैं। बेदनी से ही सटा हुआ है आली बुग्याल। जो पांच किमी से भी अधिक क्षेत्रफल में विस्तारित और फेला हुआ है। यहां से सूर्योदय और सूर्यास्त देखना किसी रोमांच से कम नहीं है। ये दोनों दृश्य बेहद ही अद्भुत और अलौकिक होते हैं। साथ ही यहां से दिखाई देने वाले त्रिशूल और नंदा देवी सहित अन्य पर्वत शृखंलाओं का दृश्य लाजबाब होता है। वहीं हरी मखमली घास, ओंस की बूंदे, चारों और से हिमालय की हिमाच्छादित नयनाविराम चोटियां, धूप के साथ बादलों की लुकाछिपी आपको यहां किसी जन्नत का अहसास कराती है। दिसंबर से मार्च तक यहां बिछी बर्फ की सफेद चादर स्कीइंग के लिए किसी ऐशगाह से कम नहीं है। इसे स्कीइंग रिसोर्ट के रूप में विकसित किया जा सकता है।

वास्तव में देखा जाए तो आली बुग्याल को स्थानीय लोग ही नहीं बल्कि पहाड़ों से प्यार करने वाले, देश से लेकर विदेशी भी आली की सुंदरता के कायल हैं। आली की नैसर्गिक सुंदरता आपको हिमालय के बहुत करीब ले जाती है। मुझे भी नंदा देवी राजजात यात्रा 2014 में आली बुग्याल का दीदार करने का अवसर मिला था। आली बुग्याल के बेपनाह सौंदर्य को देखकर बस देखता ही रह गया था। हरे घास का ये मैदान घोड़े की पीठ का आभास दिलाता है। हिमालय की गोद में बसे मखमली घास और फूलों के इस खजाने को आज भी पर्यटकों का इंतजार है। अगर आप भी आली के बेपनाह हुश्न का दीदार करना चाहते हैं तो सितंबर से लेकर नवंबर महीने तक यहां का रुख कर सकते हैं।

देवाल की ब्लाक प्रमुख उर्मिला बिष्ट कहती हैं कि आली बुग्याल पर्यटन के लिहाज से सबसे ज्यादा मुफीद है। इसे विश्वस्तरीय स्कीइंग रिजोर्ट के रूप में विकसित किया जा सकता है। जिससे न केवल पर्यटन बढे़गा, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए भी रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। 1972 में आली को रोपवे से जोड़ने का प्रस्ताव भेजा गया था। हमने भी कई बार आली को पर्यटन केंद्र और स्कीइंग रिजोर्ट के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव पर्यटन विभाग और सरकार को भेजा है। लेकिन अभी तक कोई कार्यवाही नहीं हुई है। जिस कारण से आली बुग्याल आज भी पर्यटन के दृष्टि से अपनी पहचान नहीं बना पाया है।

पर्यटन व्यवसाय से जुड़े स्थानीय युवा हीरा सिंह बिष्ट कहते हैं कि आली का मखमली बुग्याल सैलानियों को बरबस ही अपनी और आकर्षित करता हैं। लेकिन सरकारों की उदासीनता और उपेक्षा के चलते आज आली अपनी पहचान के लिए तरसता नजर आ रहा है। वहीं हिमालय को बेहद करीब से जानने वाले पर्वतारोही विजय सिंह रौतेला कहते हैं कि आली बुग्याल की सुदंरता के सामने हर किसी का हुश्न फीका है। बरसात के समय हरी भरी घास की हरियाली मन को मोहित करती है, तो बर्फ के समय पूरा बुग्याल सफेद चादर से चमक उठता है। जबकि यहां से सूर्योदय और सूर्यास्त का नजारा देखना वाकई अद्भुत है। सरकार को चाहिए कि इस बुग्याल को पर्यटन के रूप में विकसित करें, ताकि पर्यटन को बढ़ावा मिले और स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर मुहैया हो सकें।

आलेख- संजय चौहान
फोटो साभार- विजय रौतेला

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