Sunday, August 21, 2016

काफल पाको ! मिन नि चाखो


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'काफल' एक लोककथा 
उत्‍तराखंड के एक गांव में एक विधवा औरत और उसकी 6-7 साल की बेटी रहते थे। गरीबी में किसी तरह दोनों अपना गुजर बसर करते। एक दिन माँ सुबह सवेरे जंगल में घास के लिए गई, और घास के साथ 'काफल' (पहाड़ का एक बेहद प्रचलित और स्‍वादिष्‍ट फल) भी साथ में तोड़ के लाई। जब बेटी ने काफल देखे तो वह बड़ी खुश हुई।

Tuesday, August 16, 2016

सामयिक गीतों से दिलों में बसे 'नेगी'



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       अप्रतिम लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी के उत्तराखंड से लेकर देश दुनिया में चमकने के कई कारक माने जाते हैं. नेगी को गढ़वाली गीत संगीत के क्षितिज में लोकगायक जीत सिंह नेगी का पार्श्व में जाने का भी बड़ा लाभ मिला. वहीं, मुंबई, दिल्‍ली जैसे महानगरों में सांस्‍कृतिक कार्यक्रमों में सक्रियता, सुरों की साधना, संगीत की समुचित शिक्षा, गीतों में लोकतत्‍व की प्रधानता जैसी कई बातों ने नरेंद्र सिंह नेगी को लोगों के दिलों में बसाया.

Wednesday, August 10, 2016

सिल्‍वर स्‍क्रीन पर उभरीं अवैध खनन की परतें

फिल्म समीक्षा
गढ़वाली फीचर फिल्म
उत्तराखंड में अवैध खननसिर्फ राजनीतिक मुद्दा भर नहीं है। बल्कि, यह पहाड़ों, नदियों, गाड-गदेरों की नैसर्गिक संरचना और परिस्थितिकीय तंत्र में बदलाव की चिंताओं का विषय भी है। लिहाजा, ऐसे मुद्दे को व्यापक रिसर्च के बिना ही रूपहले फिल्मी परदे पर उतारना आसान नहीं। हालिया रिलीज गढ़वाली फीचर फिल्म भुली ऐ भुलीके साथ ही यही हुआ है।

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