Monday, May 02, 2016

मैं माधो सिंह का मलेथा हूँ­­­

maletha gaon uattarakhand
हुजूर!! मैं मलेथा हूँ, गढ़वाल के 52 गढ़ों के बीरों की बीरता के इतिहास की जीती जागती मिसाल। मैंने इतिहास को बनते और बदलते हुये देखा, गढ़वाल के बीर भड़ों की बीरता को देखा और अपनी माटी के लिए अपनों को ही मौन और बेजुबान होते भी देखा।
श्रीनगर के राजशाही साम्राज्य को देखा तो दो बार गौना ताल टूटने से लेकर मनसुना और केदारनाथ की तबाही में अलकनंदा के बिकराल रूप को देखा है मैंने। लेकिन अपनी माटी को बचाने के लिए बेजुबान और मौन सपूतों को पहली बार इतनी करीब से देखा की मेरा पूरा रोम रोम दर्द से कराह उठा।
मेरे पास जब कुछ नहीं था, तो मेरे सपूत माधो सिंह भंडारी ने मेरी बंजर और सूखे खेतों को हरा भरा करने के लिए पूरे पहाड़ को काटकर मलेथा गूल बनाई और जब उसमे पानी नहीं आया तो मुझे हरा भरा करने के लिए अपने जिगर के टुकड़े को ही कुर्बान कर दिया था। तब जाकर मेरी सुखी और बंजर धरती पर हरियाली लौट आई।
इस हरियाली ने मेरे गांव ही नहीं, अपितु हजारों-हजारों लोगों को जो ख़ुशी दी उसे में बयान नहीं कर सकती हूँ। मेरे सीडीनुमा खेत बरसों से ही मेरी पहचान रहें है, मैंने बरसों से कभी भी अपने सपूतों को खाली पेट सोने नहीं दिया, मैंने हर किसी के घर में अनाज का भरपूर भण्डार भरा। मेरी प्राकृतिक सुंदरता से अभिभूत होकर के ही मोलाराम ने अपनी चित्रकारी का परचम लहराया। मैंने कभी किसी के साथ द्वेष-भाव नहीं किया, मैंने हर किसी को अपने हिस्से का कुछ न कुछ दिया, मेरे खेतों के पास जो आम के सैकड़ों पेड़ है, उसमें जब आम के फल लगते हैं तो बच्चो से लेकर पुरुष, महिलाओं और राहगीरों को उपहार में दिये। यहाँ तक की बेजुबान पक्षियों और जानवरों को भी दिये। लेकिन कभी भी मैंने इसके लिए किसी से कुछ भी नहीं माँगा।
जेठ के महीने की तपती गर्मी में मैंने इन्ही आम के पेड़ों के नीचे आमजन से लेकर मुसाफिरों और तीर्थयात्रियों को छांव की ठंडक दी। गेंहू की बालुड़ी और सट्टी की बालुड़ी में जब पंछियों का हुजूम मेरी बीच सारियों में अटखेलियाँ खेला करती हैं, तो मन प्रफुलित हो जाता है। क्योंकि ये मेरी अमूल्य निधि है। मेरे खेतों की लहलहाती धान की खुशबू ने लोगों को बताया की पहाड़ की धरती भी सोना उगलती है। बसंत की बासंती सुंदरता मेरे इन खेतों में लहलाती सरसों, आपको बसंत के आगमन का सन्देश देंती हैं। धान-गेंहूँ की गुड़ाई, निराई, कटाई से लेकर मेरे इन खेतों में गोबर डालती महिलाओं-नौनिहालों की लम्बी-लम्बी कतारें ज्येठ की तपती गर्मी हो या फिर सावन की रिमझिम फुहार इस बात की प्रतीक हैं कि मेरे ये खेत धन-दौलत की डलिया हैं।
असाड़ के महीने मेरे मलेथा के सेरों में मलेथा कूल से खेतों में पानी लगाया जाता है। जिसके बाद धान की जो रोपाई की जाती है। उसमें बैलो के गले में बंधी घंटियों की खनक, हाथों में हल लिए और मेरी मिटटी से लथपथ मेरे पुरुष किसान और बिज्वडे की क्यारी से धान की छोटी-छोटी पौध निकालकर खेतों में रोपती मेरी आर्थिकी और जीवन रेखाएं यानी कि महिलायें मेरी इस धरती को अपनी मेहनत से सींचती और हरा भरा करती है। मेरे इन खेतों में जैसी रोपाई होती है वैसी अन्यत्र कहीं नहीं।
मेरे ठीक सामने अलकनंदा नदी बहती है, जो अपने सुख दुःख मुझसे बांटती है। उसने हमेशा से ही मुझे हौसला दिया है। लेकिन आज मेरा हौसला भरभरा रहा है। क्योंकि आज में खुद को अकेला महसूस कर रहीं हूँ। न जाने किसकी नजर लग गई है मुझको। नीति नियंताओं ने मेरी इस सोना उगलने वाली धरती पर पत्थर कूटने वाला यंत्र (स्टोन क्रेशर) लगवाने की हिमाकत की है, वो भी एक नहीं बल्कि 5-5। लेकिन मेरी मात्रशक्ति ने उनके मंसूबों को सफल नहीं होने दिया। रवाईं-जौनपुर के तिलाड़ी वन आन्दोलन, रैणी के जंगल बचाने को गौरा के चिपको आन्दोलन, शराब के खिलाप बंड पट्टी के कंडाली आन्दोलन की तर्ज पर मलेथा आन्दोलन शुरू किया।
आखिरकार भारी जनदबाव, लम्बे संघर्ष और जद्दोजहद के बाद सरकार को मेरी धरती पर लगने वाले स्टोन क्रेशर लगाने का निर्णय वापस लेना पड़ा। सब स्टोन क्रेशर के लाइसेन्स निरस्त करने पड़े, इस आन्दोलन को सफल बनाने में जो सबसे बड़ा योगदान रहा वो मेरी मात्रशक्ति का और हिमालय बचाओ के संयोजक समीर रतूड़ी का है। जिन्होंने मेरे लिए अन्न का त्याग किया। समीर के अनशन ने लोगों को मेरी याद दिलाई। लेकिन सबसे बड़ा दुःख मुझे तब हुआ जब मेरी आर्थिक और जीवन रेखायें यहाँ की महिलाओं और समीर रतूड़ी पर आन्दोलन के एवज में मुकदमें थोपे गए। मैं हुकमरानों से पूछना और जानना चाहती हूँ कि क्या अपनी सोना उगने वाली जमीन को बचाना और उसके लिए आगे आकर आवाज बुलंद करना अपराध है, अपने भविष्य के लिए आशकिंत होना अपराध है, या फिर अपनी पुरखों की जागीर को बचाना आज गुनाह हो गया, क्या इसी की सजा मुझे मिल रही है।
इसके बिरोध में समीर रतूड़ी बिगत २० दिनों से अधिक दिनों तक अनशन भी किया। इस दौरान समीर को टिहरी जेल से लेकर जौलीग्रांट अस्पताल में जिन्दगी और मौत से लड़ना पडा। समीर के पीछे मैं और मेरी मात्रशक्‍ति‍ पहाड़ की बुलंदियों की तरह से अडिग रहे और हैं। जिसने कभी भी हारना नहीं सीखा है। इस बार भी जीत मेरी ही होगी। में हमेशा से ही लोकतंत्र की हिमायती रही हूँ, माननीय न्यायालय में भी मेरी अगाढ सच्ची श्रध्‍्दा, आस्था और विश्वास रहा है। लेकिन आज भी एक यक्ष प्रश्न मेरे मन मस्तिष्क में कौंध रहा है कि ऐसी कौन सी मज़बूरी नीति नियंताओं और हुक्मरानों के समक्ष खड़ी हो गई थी, कि मेरी इस सोना उगने वाली धरती को स्टोन क्रेशर के शोर और धुंये से बदरंग करना चाहते थे। इस दौरान मेरे वो शुभचिंतक राजनीति के पुरोधा क्यों मौनवर्त धारण किए रहे। जिन्होंने मेरी धरती से ही राजनीति का कहकरा सीखा है। क्यों उन्हें मेरे बेइंतहा दर्द महसूस नहीं होता है।
गांवो को बचाने का सपना बुनने वालों से पूछना चाहती हूँ की यदि गांव के खेत ही नहीं रहेंगे तो गाँव कहाँ बचेगा, आज जब एक गांव अपने साथ हो रहे अन्याय पर डटा हुआ है तो आज कहा अदृश्य हो गएँ है आपके सिपहसालार, क्या जात्रा करने भर से गांव बच जायेंगें, हुकूम --- स्टोन क्रेशर लगवाने से अच्छा ये होता की मेरी इस पूरी धरती को गोद लेकर के इसमें पैदावार कैसे बढाया जा सके इस पर अनुसन्धान करते, कृषि की नई नई तकनीक का उपयोग करके नई संभावनो को तलासते, इसे पूरे प्रदेश में कृषि के एक मॉडल गांव के रूप में प्रस्तुत करते ताकि खेतों का वजूद भी रहता, मेरे किसानों को भी इसका फायदा मिलता और देश-विदेशों से आने वाले लोग इसको करीब से देखते।  
मुझे पता चला है की कई लोगों की शिकायत है की मेरे नाम पर राजनीती हो रही है, लेकिन मुझे राजनीती से कोई लेना देना नहीं है, मुझे राजनीति का न तो भूगोल और न ही गणित समझ में आता है, जो लोग मुझे लेकर राजनीती करना चाह रहें है में उन्हें साफ़ लफ्जों में आगाह कर देना चाहती हूँ की मुझे राजनीती की बिसात का मोहरा मत बनाइये, मेरी पावन धरती, मेरी पहचान राजनीती का अखाडा नहीं है, ये तो बीरो की तपोभूमि है, मुझे तो मेरे खेतो की खुशहाली और मेरे लोगों की खुशियाँ चाहिये, इससे ज्यादा कुछ भी नहीं और अंत में मुझे कलम के लिख्वारों, जन के सरोकारों से तालुक रखने वालो से भी बहुत शिकायत है की इतिहास तुम्हे हमेशा संदेह की नजरो से देखेगा जब बरसों बाद इतिहास ये पूछेगा की मलेथा पर आकर तुम्हारी कलम इतनी खामोश, लाचार और बेबस क्यों हो गई थी, तुम्हारी कलम की पैनी धार क्यों कुंद हो गई थी, तो फिर तुम निरुत्तर हो जाओगे।

प्रस्‍तुति- संजय चौहान, चमोली गढ़वाल

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