Wednesday, February 19, 2014

कन्फ्यूजिंग प्रश्नों पर चाहूं रायशुमारी

      अपने भविष्य को लेकर आजकल बड़ा कन्फ्यूजिया गया हूं। निर्धारण नहीं कर पा रहा हूं, कौन सा मुखौटा लगाऊं। आम- आदमी ही बना रहूं, या आम और आदमी के फेविकोल जोड़ से खासहो जाऊं। अतीत के कई वाकये मुझे पसोपेस में डाले हुए हैं। कुछ महीने पहले मेरी गली का पुराना चिंदी चोरउर्फ छुटभैयाधंधे को सिक्योर करने की खातिर खासबनना, दिखना और हो जाना चाहता था। एक ही सपना था उसका, कि बाय इलेक्शन या सेलेक्शन वह किसी भी सदन तक पहुंच जाए। फिर बतर्ज एजूकेशनल टूर हर महीने बैंकाकजैसे स्वर्गों की यात्रा कर आए। मगर, कल जब वह नुक्कड़ पर सुट्टामारते मिला, तो बोला- दाज्यू अब तुम बताओ यह आम आदमीबनना कैसा रहेगा? मैं हतप्रभ। देखा उसे, तो उसमें साधारण आदमी से ज्यादा आपवाला आदमीबनने की ललक दिखी, सो कन्फ्यूजिया गया। इसलिए उसे जवाब देने की बजाए मैं मन-मोहनहो गया।
फिर सोचा क्यों न आपके साथ ही चैनलों की डिबेटटाइप बकैती की जाए। बैठो, बात करते हैं, हम- तुम, इन कन्फ्यूजियाते प्रश्नों पर। आपसे रायशुमारी अहम है मेरे लिए। तब भी फलित न निकला तो एसएमएस, एफबी, ट्वीटर का ऑप्शन खुला है। जरुरी लगा तो प्रीपोल, पोस्टपोल, एग्जिट पोल भी संभव। रुको, बकैती से पहले बता दूं। गए साल प्रवचन में बापूकहते थे, प्रभु की शरण में आम और खास सब बराबर हैं। मगर, बड़ी बात है (आम) आदमी बनना। उससे पहले सुना था, ‘भैंसलाठी वाले की होती है। फिर सुना, देखा कि हर पांच साल में खास (नेता) लोग दशकों से मूरख बनते आम आदमी को खासकहते, बताते हैं। उसके भूत और भविष्य उनकी चिंता की कड़ाही में उबलते हैं। नौबत पादुकाएं उठाने की आएं, तो उसे सिर माथे लगाने से हिचकते नहीं।
अब देखो, अरविंद ने बड़ी नौकरी छोड़ी, आम आदमी बनें, तो सीधे सीएम बन गए। उन्हीं के नक्शेकदम कई और खासभी अपने ओहदोंको त्यागकर आम- आदमीबनने के लिए धरती पकड़ होने लगे हैं। आशुतोष भैया तो मलाई छोड़ चटाई पर आ भी गए। सो बंधु कन्फ्यूज बहुत है। समझना मुश्किल हो रहा है कि मेरे कन्फ्यूजन को दूर कौन करेगा, केजू, राहुल या नमो। केजू कथा का मूल पात्र तो आदमी पर आमका प्रत्यय लगाना नहीं भूलता। इसी फार्मूले से खुद को भी आदमी से पहले आमबताता है। दामादजी की तरह बनाना पीपुल्सनहीं कहता। वहीं राहुल बाबा तो वर्षों से झोपड़ी यात्राओं से बताते रहे हैं कि खास होते हुए भी उन्हें सुदामाके पास बैठना, उठना, लेटना अच्छा लगता है। वही आम आदमी जिनके लिए कभी दादीने गरीबी हटाओ का नारा दिया था।
इधर देसी मीडिया ने अपने नरेंद्र भाई को शॉर्टनेम नमोक्या दिया, कि हर कोई शनिदोष निवारणशैली में जापकरना नहीं भुल रहा। आखिर चायवाले का खासहोना, और फिर कारपोरेटी रैलियों को जुगाड़ कर वापस चायवालों (आम) तक पहुंचना भी तो बड़ी बात है। वेटिंग को कन्फर्म करने के लिए इशारों में बतियाए रहे हैं- उन्हें 60 साल दिए, मुझे 60 महीने दे दो। भुज से लेकर चतुर्भुज तक 350 की स्पीड वाली बुलेट शंटिंग कर दूंगा। सो भांति-भांति के मुखौटों को देख मैं कन्फ्यूज हूं। यदि मैं किन्नर नरेश (खास) बन गया, तो कितने दिनों का टिकाऊ समर्थन मांगना पड़ेगा। अभी तक तो दे दनादन कांग्रेसी घुड़की मिल रही है। तभी संजयकी उधार दृष्टि से मैंने इलाहबाद को निहारा। जहां संभवतः नमो और आशुतोष युद्धम् शरणम् गच्छामि। ऐसे में मेरे जैसे निठल्ले चिंतित हैं, कि इनके रहते अपने दशहरी, लंगड़े का क्या होगा। सो मैं कौन सा मुखौटा लगाऊं, है कोई सॉल्यूशन आपके पास।
@Dhanesh Kothari

Friday, February 14, 2014

बसंत


लो फिर आ गया बसंत
अपनी मुखड़ी में मौल्‍यार लेकर
चाहता था मैं भी
अन्‍वार बदले मेरी

मेरे ढहते पाखों में
जम जाएं कुछ पेड़
पलायन पर कस दे
अपनी जड़ों की अंग्‍वाळ

बुढ़ी झूर्रियों से छंट जाए उदासी
दूर धार तक कहीं न दिखे
बादल फटने के बाद का मंजर

मगर
बसंत को मेरी आशाओं से क्‍या
उसे तो आना है
कुछ प्रेमियों की खातिर
दो- चार फूल देकर
सराहना पाने के लिए

इसलिए मत आओ बसंत
मैं तो उदास हूं

धनेश कोठारी
कापीराइट सुरक्षित @2013

Monday, February 10, 2014

सिखै

सि
हमरा बीच बजार
दुकानि खोलि
भैजी अर भुल्‍ला
ब्‍वन्‍न सिखीगेन

मि
देळी भैर जैक
भैजी अर भुल्‍ला
व्‍वन्‍न मा
सर्माणूं सिखीग्‍यों

कापीराइट सुरक्षित
2010 मा मेरी लिखीं एक गढ़वळी कविता

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