Sunday, June 30, 2013

बाबा केदार के दरबार में

खुद के दुखों का पिटारा ले
खुशीयां समेटने गए थे वो सब
जो अब नहीं है...साथ हमारे,
बाबा केदार के दरबार में
हाथ उठे थे...सर झुके थे
दुआ मांगने के लिए...बहुत कुछ पाने के लिए
अपनो के लिए-
मगर पता नहीं...बाबा ने क्यों बंद कर ली-आंखे
हो गए मौन-
मां मंदाकिनी भी गयी रूठ ...और...फिर..
सूनी हो गयी कई मांओं की गोद
बिछुड़ गया बूढे मां-पिता का सहारा
उझड़ गयी मांग सुहानगों की
छिन गया निवाला कई के मुंह से

क्या फर्क पड़ता है

ये इतनी लाशें
किस की हैं
क्यों बिखरी पड़ी हैं
ये बच्चा किसका है
मां को क्यों खोज रहा है....मां मां चिलाते हुए
दूर उस अंधेरे खंडहर में
वो सफेद बाल...बूढी नम आंखें
क्यों लिपटी हैं
एक मृत शरीर से
क्यों आखिर क्यों बिलख रही है
नयी नवेली दुल्हन
उस मृत पड़े शरीर से लिपट,लिपट कर

Friday, June 28, 2013

वाह रे लोकतंत्र के चौथे खंभे

मित्रों कभी कभी मुझे यह सवाल कचोटता है कि आखिर हम पत्रकारिता किसके लिए कर रहे हैं। निश्चित ही इसके कई जवाब भी कई लोगों के पास होंगे। मगर जब मैं कवरेज को भी खांचों में बंटा देखता हूं, तो दिमाग सन्‍न रह जाता है।
ऐसा ही एक वाकया हाल के दिनों में देखने को मिला, केदारनाथ त्रासदी में बचे लोगों को ऋषिकेश लाया जा रहा था। हर अखबारनवीस, टीवी रिपोर्टर दर्द से सनी मार्मिक कहानियों को समेट रहा था, क्‍योंकि डेस्‍क की डिमांड चुकी थी। दर्द को बेचकर ही शायद पाठकों के दिलों तक पहुंचने का सवाल था।

Saturday, June 22, 2013

बाबा, बाबा आप कहां हैं..

        उत्‍तराखंड में जलप्रलय के बाद मचा तांडव हमारे अतीत के साथ ही भविष्‍य को भी बहा ले गया है। कहर की विनाशकता को पूरा देश दुनिया जान चुकी है, मदद को हाथ उठने लगे हैं, सहायता देने वालों के दिल और दरवाजे हर तरफ खुल गए हैं। मगर अफसोस कि अभी तक हरसाल योग के नाम पर विदेशियों से लाखों कमाने वाले बाबा, पर्यावरण संरक्षण और निर्मल गंगा के नाम पर लफ्फाजियां भरी बैठकों का आयोजन करने वाले बाबा, गंगा की छाती पर अतिक्रमण करने वाले बाबा, सरकारी जमीनों और मदद की फिराक में रहने वाले बाबा, पीले वस्‍त्रधारी संस्‍कृत छात्रों के बीच चमकने वाले बाबा, कहीं नजर नहीं आ रहे हैं। आखिर वह अब हैं कहां.. क्‍यों नहीं आए वह अब तक त्रासदी के दर्द को कम करने के लिए, क्‍यों नहीं खुले अब तक उनके खजाने

Thursday, June 20, 2013

मूर्ति बहने का राष्ट्रीय शोक

         ऋषिकेश में एक मूर्ति बही तो देश का पूरा मीडिया ने आसमान सर पर उठा लिया। खासकर तब जब वह न तो ऐतिहासिक थी, न पौराणिक। 2010 में भी मूर्ति ऐसे ही बही थी। जबकि राज्‍य के अन्‍य हिस्‍सों में हजारों जिंदगियां दफन हो चुकी हैं। तब भी मीडिया के लिए मूर्ति का बहना बड़ी खबर बनी हुई है। मजेदार बात कि यह क्लिप मीडिया को बिना प्रयास के ही मिल गए। आखिर कैसे.. जबकि ऋषिकेश में राष्‍ट्रीय मीडिया का एक भी प्रतिनिधि कार्यरत नहीं है। एक स्‍थानीय मीडियाकर्मी की मानें तो यह सब मैनेजिंग मूर्ति के स्‍थापनाकारों की ओर से ही हुई।

Saturday, June 08, 2013

मैं, इंतजार में हूं


मैं, समझ गया हूं
तुम भी, समझ चुके हो शायद
मगर, एक तीसरा आदमी है
जो, चौथे और पांचवे के -
बहकावे में आ गया है
खुली आंखों से भी
नहीं देखना चाहता 'सच'

मैं और तुम विरोधी हैं उसके
कारण, हम नहीं सोचते उसकी तरह
न, वह हमारी तरह सोचता है

रिक्‍त शब्‍द भरो की तरह
हम खाली 'आकाश' भरें, भी तो कैसे
सवाल कैनवास को रंगना भर भी नहीं
पुराने चित्र पर जमीं धूल की परतें
खुरचेंगे, तो तस्‍वीर के भद्दा होने का डर है

मैं, इंतजार में हूं
एक दिन हिनहिनाएगा जरुर
और धूल उतर जाएगी उसकी
काश...
हमारा इंतजार जल्‍दी खत्‍म हो जाए
रात गहराने से पहले ही......

सर्वाधिकार- धनेश कोठारी 

Sunday, June 02, 2013

बेटियां


कई बार देखा
बेटियों को बेटा बनते हुए
मगर, बेटे
हर बार बेटे ही बने देखे

इसलिए
जोर देकर कहूंगा
बेटियां तो 'बेटियां' ही होती हैं
बेटा बन गए, तो
क्‍या मालूम
फिर पीछे मुड़कर देखें न देखें....।

सर्वाधिकार- धनेश कोठारी

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