Monday, December 16, 2013

एक और सम्‍मान



   ऋषिकेश प्रेस क्‍लब में निर्विरोध निर्वाचन के बाद मुझे आशीर्वाद देते क्‍लब के वरिष्‍ठ सदस्‍य


आभार प्रेस क्‍लब के सभी साथियों का

Saturday, November 09, 2013

Friday, November 08, 2013

Thursday, November 07, 2013

Monday, November 04, 2013

मेरा एक गीत

यह गीत मैंने पुरानी टिहरी के डूबने से लगभग एक दशक पहले लिखा था। जिसे 1998 में हेमवतीनंदन भट्ट व मंगला रावत ने गाया
आपको समर्पित यह गीत

http://www.4shared.com/mp3/NMHZz9Oz/BHOL_DOOBI_JAAN.html

Sunday, November 03, 2013

मेरा लिखा यह गीत


मेरे लिखा यह गीत शुरू में आमंत्रण देता सा लगता है, मगर अंतराओं में शराब से पनपने वाली विसंगतियों को सामने रखता है। आप भी सूनें

http://www.4shared.com/mp3/eH2O-75c/DAARU_KI_BOTAL.html

Saturday, November 02, 2013

बाबा की मूर्ति फिर चर्चाओं में....

       भई देश दुनिया में उत्‍तराखंड त्रासदी की प्रतीक बनी मूर्ति और बाबा एक बार फिर चर्चा में हैं। और यह बहस शुरू हुई, 31 अक्‍टूबर गुरुवार को मूर्ति को लगाने और उसी रात उसे हटाने के बाद से। क्षेत्र में कुछ बाबा के पक्ष और कुछ विपक्ष में आ गए हैं। दुहाई दी जा रही है कि यह यहां का आकर्षण है, इसे दोबारा लगना चाहिए। लेकिन कुछ बैकडोर में यह भी बतिया रहे हैं कि क्‍या यह गंगा पर अतिक्रमण नहीं। जब बीते 17 जून 2013 को पूर्वाह्न करीब साढ़े 11 बजे आक्रोशित गंगा ने रास्‍ते में आड़े आ रही मूर्ति को अपने आगोश में जब्‍त कर लिया, तो महज आध-पौन घंटे के भीतर यह देश दुनिया के मीडिया में सुर्खियां बटोरने लगी थी।
बड़ी बात कि देश के मीडिया को यह फुटेज उनके किसी रिपोर्ट ने नहीं, बल्कि इस मूर्ति के साधकों की तरफ से ही भेजी गई बताते हैं। सवाल तब भी उठे कि आखिर मीडिया में सुर्खियां बटोरने के पीछे फाइबर की इस मूर्ति का फायदा क्‍या रहा होगा। खैर यह बीती बात हो गई।
नतीजा, श्रावणमास के बाद तक तीर्थनगरी ऋषिकेश में भी खौफ के चलते पर्यटक नहीं आए। उन्‍हें लगा कि मूर्ति बह गई, तो अब वहां क्‍या बचा होगा। जिसका नुकसान क्षेत्र के कारोबारियों को करीब तीन-चार महीनों तक भुगतना पड़ा। जिसकी कसक अब तक बाकी है। अभी भी यहां का पर्यटन पूरी तरह से पटरी पर नहीं लौटा है। ऐसे में अब फिर मूर्ति लगाने की वही कवायद शुरु हो गई है।
अब सवाल यह कि हाईकोर्ट के आदेशों से पहले भी यदि आम आदमी यदि गंगा किनारे एक ईंट भी रखता था, तो मुखबिरों की सूचना पर प्रशासन बगैर नोटिस, सूचना के ही उसे ढहा देता था। अब भी ढहाने को आतुर दिखता है। मगर, यहां तो गंगा पर अतिक्रमण को सब देखते रहे, और आरती भी करते रहे। आखिर यह रियायत क्‍यों...
सवाल यह भी कि क्‍या गंगा को अतिक्रमित करती सिर्फ यह मूर्ति ही क्षेत्र में पर्यटन का आधार है। क्‍या इसके बिना देस विदेश के सैलानी यहां नहीं आएंगे। सच क्‍या मानें..। कुछ लोग दबे छुपे कहते हैं- इसके पीछे कोई बड़ा खेल संभव है। लिहाजा अब इस पर सोचा जाना जरुरी लगता है। साथ ही इसका फलित भी निकाला जाना चाहिए, कि आखिर गंगा के हित में क्‍या है।

Friday, November 01, 2013

हे उल्‍लूक महाराज

आप जब कभी किसी के यहां भी पधारे, लक्ष्‍मी जी ने उसकी योग्‍यता देखे बगैर उसी पर विश्‍वास कर लिया। जिसका नतीजा है कि बांधों के, राज्‍य के, सड़कों के, पुलों के, पैरा पुश्‍तौं के, पीएमजीवाई के, मनरेगा आदि के बनने के बाद वही असल में आपका परम भक्‍त हो गया। वहीं आपदा की पीड़ा के बाद भी बग्‍वाळ को उत्‍साह के रुप में देख और मनाने को उतावला है। उसके अंग अंग से पटाखे फूट रहे हैं, लालपरी उसे झूमने के लिए प्रेरित कर रही है।
आपकी कृपा पंथनिरपेक्ष, असांप्रदायिक, अक्षेत्रवादी है। आप अपने वंश पूजकों के लिए कृपा पात्र हैं
मगर, मेरे लिए यह समझ पाना कुछ मुश्किल हो रहा है कि आपके कृपापात्रों की लाइन में लगने के क्‍या उत्‍तराखंड राज्‍य और उसके मूल अतृप्‍त वंशज भी लायक हैं या नहीं। क्‍या आपका और आपकी महास्‍वामिनी का ध्‍यान उनकी ओर भी जागेगा। या फिर वे केवल शहीद होने, लाठियां खाने, भेळ भंगारों में लुढ़कने, दवा, शिक्षा, रोजगार, मूलनिवास आदि के लिए तड़पने तक सीमित रहेंगे।
हे उल्‍लूक महाराज, इस अज्ञानी, अधम, गुस्‍ताख का मार्गदर्शन करने की कृपा करें। बताएं कि महा कमीना होने के लिए पहाड़ों में क्‍या बेचूं, कमान और हाईकमान तक कितना और कब-कब स्‍वाळी पकोड़ी, घी की माणि पहुंचाऊं।
आपकी कृपा दृष्टि की जग्‍वाळ में -
आपका यह स्‍व घोषित सेवक

@Dhanesh Kothari

Thursday, October 31, 2013

ड्यूटी च प्‍यारी बर्फीला लदाख

ड्यूटी च प्‍यारी बर्फीला लदाख......

http://www.4shared.com/mp3/ljZy9hWc/DUTY_CHA_PYARI.html 

हेमवतीनंदन भट्ट हेमू' का लिखा और गाया हुअा एक गीत

Saturday, September 28, 2013

राइट टू रिजैक्‍ट शुभ, मगर कितना.... ?

राइट टू रिजेक्‍ट स्‍वस्‍थ लोकतंत्र के लिए शुभ माना जा सकता है, मगर कितना? इस पर भी सोचा जाना चाहिए। खासकर इसलिए कि क्‍या अब तक नकारात्‍मक वोटों से संसद या विधानसभाओं में पहुंचने वाले इससे रुक पाएंगे। शायद जानकार मानेंगे कि उनका जवाब ना में ही होगा। कारण कुछ लोग जो पहले भी वोट नहीं देते थे, क्‍या वह देश की राजनीतिक व्‍यवस्‍था पर प्रश्‍नचिह्न नहीं था? हां अब इतना फर्क होगा कि नकारात्‍मक वोट की संख्‍या सार्वजनिक हो जाएगी। लेकिन फिर वही सवाल कि क्‍या इससे फायदा होगा?
मेरा मानना है कि राइट टू रिजेक्‍ट से बड़ा बदलाव आए या नहीं, लेकिन देश के शिक्षित वर्ग के रुझान का पता जरुर चल सकता है। कारण, देश में अब तक अनपढ़ों को किसी के भी पक्ष में बरगलाने में इसी वर्ग का सबसे बड़ा हाथ रहा है, और यही वर्ग चुनाव के बाद हरबार राजनीतिक प्रणाली, राजनेताओं, पार्टियों को बीच चौराहे बातों बातों में गालियां भी देता रहा है। सो साफ है कि अब उसे वोट के इस्‍तेमाल से पहले अपने चयन पर किंतु-परंतु के साथ मुहर लगानी होगी। वरना उसकी भूमिका, अंधभक्ति, स्‍वार्थ को भी सब जान जाएंगे।
हां एक बात अवश्‍य कही जा सकती है कि इससे निकलने वाली ध्‍वनि लोकतंत्र के कथित पहरुओं को भविष्‍य के लिए कोई कड़ा संदेश जरुर दे सकती है। और इससे राजनीतिक गलियारों में यदाकदा कोई साफ सुथरी छवि, ध्‍येय, निष्‍ठा वाला पहुंच सकता है। इस लिहाज से दीर्घकालीन योजनाओं की तरह राइट टू रिजेक्‍ट प्रणाली से भरोसा बांधा जा सकता है।
यह पहल एक और तरफ भी इशारा करती दिख रही है कि लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍थाओं के समय का पहिया घुमने लगा है। जो कि राइट टू रिजेक्‍ट से राइट टू रिकॉल और फिर निर्वाचन के लिए 50+1 के मानक तक पहुंच सकती है। जिससे धनबल, बाहुबल, उन्‍माद, भावनात्‍मक शोषण जैसी कुटील चालों का बल निकाल सकती है।
यहां आप से अनुरोध कि सफाई के इस अभियान पर अपनी प्रतिक्रिया तो दें ही, साथ ही उस शिक्षित (अनपढ़) वर्ग को भी समझाने का प्रयास करें। शायद यह हमारे लिए देशभक्ति जताने का एक अच्‍छा माध्‍यम बन जाए। जो देश के साथ ही हमारी, आने वालों की जिंदगियों को सुरक्षित और खुशहाल बना सके।

धनेश

Tuesday, September 17, 2013

तय मानों

तय मानों
देश लुटेगा
बार-बार, हरबार लुटेगा

तब-तब, जब तक
खड़े रहोगे चुनाव के दिन
अंधों की कतारों में
समझते रहोगे-
ह्वां- ह्वां करते
सियारों के क्रंदन को गीत

जब तक पिघलने दोगे
कानों में राष्‍ट्रनायकों का 'सीसा'
अधूरे ज्ञान के साथ
दाखिल होते रहोगे
चक्रव्‍यूह में
बने रहोगे आपस में
पांडव और कौरव

तय मानों
देश के लुटने के जिम्‍मेदार
तुम हो, और कोई नहीं

सर्वाधिकार- धनेश कोठारी

Wednesday, August 21, 2013

आखिर चटखारेदार खबरों से लाभ किसे

उत्‍तराखंड त्रासदी के बाद केदारनाथ पूरी तरह से तबाह हुआ, जहां अगले कई वर्षों तक हालात शायद ही सुधरे। वहीं, जलप्रलय ने चारधाम यात्रा के तमाम रास्तों  को भी क्षत विक्षत कर पहाड़ की रोजी रोटी को बरबाद कर डाला। यहां भी सरकारी नाकामियों के कारण कब तक हालात सामान्य  हो सकेंगे कहना मुश्किल है। लेकिन और बात जो पहाड़ के हितों को चोट पर चोट कर रही है, वह मीडिया की अनर्गल रिपोर्टें। जिसकी बदौलत देशभर से लोग पहाड़ का रुख करने से भी हिचक रहे हैं।

Wednesday, August 07, 2013

क्‍या यह चिंताएं वाजिब लगती हैं..

कोश्‍यारी जी को चिंता है कि यदि आपदा प्रभावित गांवों को जल्‍द राहत नहीं दी गई तो नौजवान माओवादी हो जाएंगे। समझ नहीं पा रहा हूं कि माओवादी होना क्‍या राष्‍ट्रद्रोही होना है, क्‍या माओवादी बनने का आशय आंतकी बनने जैसा है, यदि इन जगहों पर माओवादी पनप गए तो क्‍या पहाड़ और ज्‍यादा दरकने लगेंगे, क्‍या ये गांवों में लूटपाट शुरू कर देंगे, क्‍या ये लोग खालिस्‍तान या कश्‍मीर की तरह अलग देश की मांग कर बैठेंगे, आखिर क्‍या होगा यदि माओवाद को आपदा पीडि़त बन गए तो...
बड़ा सवाल यह कि ऐसी चिंता सिर्फ कोश्‍यारी जी की ही नहीं है, बल्कि राज्‍य निर्माण के बाद कांग्रेस, बीजेपी नौकरशाहों की चिंताओं में यह मसला शामिल रहा है। इसकी आड़ में केंद्र को ब्‍लैकमेल किया जाता रहा है, और किए जाने का उपक्रम जारी है।
यहां एक और बात साफ कर दूं कि मेरे जेहन में उपजे उक्‍त प्रश्‍नों का अर्थ यह न निकाला जाए कि मैं माओवाद का धुर समर्थक या अंधभक्‍त या पैरोकार हूं। बल्कि जिस तरह से पहाड़ के नौजवानों के माओवादी होने की चिंताएं जताई गई हैं, वह एक देशभक्‍त पहाड़ को गाली देने जैसा लग रहा है, जिसके युवा आज भी सेना में जाकर देश के लिए मर मिटने  का जज्‍बा अपने सीने  में पालते हुए बड़े होते हैं। जिसकी गोद में पले खेले युवा गढ़वाल और कुमाऊं रेजीमेंट के रुप में बलिदान की अमर गाथाएं लिखते रहें हैं। ऐसे में क्‍या यह चिंताएं वाजिब लगती हैं....

Sunday, July 07, 2013

कौन संभालेगा पहाड़ों को...


पहाड़ों पर कौन बांधेगा 'पलायन' और 'विस्‍थापन' को...

अब तक या कहें आगे भी पलायन पहाड़ की बड़ी चिंता में शामिल रहा, और रहेगा। मगर अब एक और चिंता 'विस्‍थापन' के रुप में सामने आ रही है। पहाड़ के जर्रा-जर्रा दरकने लगा है। गांवों की जिंदगी असुरक्षित हो गई है। सदियों से पहाड़ में भेळ्-पखाण, उंदार-उकाळ, घाम-पाणि, बसगाळ-ह्यूंद, सेरा-उखड़ से सामंजस्‍य बिठाकर चलने वाला पहाड़ी भी थर्र-थर्र कांप रहा है। नित नई त्रासदियों ने उसे इतना भयभीत कर दिया है कि अब तक रोजी-रोटी के बहाने से पलायन करने की उसकी मजबूरी के शब्‍दकोश में 'विस्‍थापन' नामक शब्‍द भी जुड़ गया है।
मजेदार बात कि कथित विकास की सड़कें भी उसके काम नहीं आ रही हैं, बल्कि भूस्‍खलन के रुप में मौत की खाई पैदा कर रही हैं। अब तक उसने कुछ अपने ही रुजगार के लिए बाहर भेजे थे। लेकिन अब वह खुद भी यहां से विस्‍थापित हो जाना चाहता है। निश्चित ही उसकी चिंताओं को नकारना मुश्किल है। क्‍योंकि जीवन को सुखद तरीके से जीने का उसका मौलिक हक है। जिसे अब तक किसी न किसी बहाने से छीना जाता रहा है। अब जब पहाड़ ही ढहने लगे हैं, और उसकी जान लेने पर आमादा हैं, तो हम भी कैसे कह सकते हैं कि नहीं 'तुम पहाड़ी हो, हिम्‍मत वाले हो, साहस और वीरता तुम्‍हारी रगों में समाई है' मौत से मुकाबला करने के लिए यहीं रहो, मारबांदी रहो।
ऐसे में यदि विकास की सड़कें उसे दूर परदेस ले जाना चाहती हैं, तो ले जाने दो। किंतु, प्रश्‍न यह भी कि यदि पहले 'पलायन' और अब उसकी चाह के अनुरुप 'विस्‍थापन' से आखिर पहाड़ तो खाली हो जाएंगे। एक सभ्‍यता, संस्कृति, परंपरा, पहचान, जीजिविषा पलती, फलती, बढ़ती थी, उसे कौन पोषित करेगा। क्‍योंकि भूगोल में बदलाव कहीं न कहीं हमारे बीच एक अलग तरह का दूराव पैदा कर देता है।
.... और इससे भी बड़ी चिंता कि यदि पहाड़ खाली हो गए तो देश की इस सरहद पर दूसरी रक्षापंक्ति को कौन संभालेगा। सेना तो मोर्चे पर ही दुश्‍मनों को पछाड़ सकती है। कोई उसके हौसले के लिए भी तो चाहिए। क्‍या पलायन और विस्‍थापन के बाद हम देशभक्ति की अपनी 'प्रसिद्धि' को कायम रख सकेंगे।
मेरी चिंता पहाड़ को लगे ऐसे अभिशाप से ही जुड़ी है, जो फिलहाल समाधान तो नहीं तलाश पा रही, लेकिन 'डर' जरुर पैदा कर रही है। खासकर तब अधिक, जब बांधों के निर्माण के दौरान मजबूरी में विस्‍थापित हुए लोगों की तरह अब हर तरफ विस्‍थापन की आवाजें उठने लगी हैं। जोकि जीवन की सुरक्षा के लिहाज से कतई गलत भी नहीं, मगर चिंताएं इससे आगे की भी तो हैं, उनका समाधान कौन निकालेगा।
इसलिए क्‍यों न कोई ऐसा रास्‍ता बने, विकास के साथ पहाड़ों में जीवन को सुरक्षा की भी गारंटी दे, बाहर से आने वाले सैलानियों को नहीं तो कम से कम हम पहाडि़यों को।

धनेश कोठारी

Sunday, June 30, 2013

बाबा केदार के दरबार में

खुद के दुखों का पिटारा ले
खुशीयां समेटने गए थे वो सब
जो अब नहीं है...साथ हमारे,
बाबा केदार के दरबार में
हाथ उठे थे...सर झुके थे
दुआ मांगने के लिए...बहुत कुछ पाने के लिए
अपनो के लिए-
मगर पता नहीं...बाबा ने क्यों बंद कर ली-आंखे
हो गए मौन-
मां मंदाकिनी भी गयी रूठ ...और...फिर..
सूनी हो गयी कई मांओं की गोद
बिछुड़ गया बूढे मां-पिता का सहारा
उझड़ गयी मांग सुहानगों की
छिन गया निवाला कई के मुंह से

क्या फर्क पड़ता है

ये इतनी लाशें
किस की हैं
क्यों बिखरी पड़ी हैं
ये बच्चा किसका है
मां को क्यों खोज रहा है....मां मां चिलाते हुए
दूर उस अंधेरे खंडहर में
वो सफेद बाल...बूढी नम आंखें
क्यों लिपटी हैं
एक मृत शरीर से
क्यों आखिर क्यों बिलख रही है
नयी नवेली दुल्हन
उस मृत पड़े शरीर से लिपट,लिपट कर

Friday, June 28, 2013

वाह रे लोकतंत्र के चौथे खंभे

मित्रों कभी कभी मुझे यह सवाल कचोटता है कि आखिर हम पत्रकारिता किसके लिए कर रहे हैं। निश्चित ही इसके कई जवाब भी कई लोगों के पास होंगे। मगर जब मैं कवरेज को भी खांचों में बंटा देखता हूं, तो दिमाग सन्‍न रह जाता है।
ऐसा ही एक वाकया हाल के दिनों में देखने को मिला, केदारनाथ त्रासदी में बचे लोगों को ऋषिकेश लाया जा रहा था। हर अखबारनवीस, टीवी रिपोर्टर दर्द से सनी मार्मिक कहानियों को समेट रहा था, क्‍योंकि डेस्‍क की डिमांड चुकी थी। दर्द को बेचकर ही शायद पाठकों के दिलों तक पहुंचने का सवाल था।

Saturday, June 22, 2013

बाबा, बाबा आप कहां हैं..

        उत्‍तराखंड में जलप्रलय के बाद मचा तांडव हमारे अतीत के साथ ही भविष्‍य को भी बहा ले गया है। कहर की विनाशकता को पूरा देश दुनिया जान चुकी है, मदद को हाथ उठने लगे हैं, सहायता देने वालों के दिल और दरवाजे हर तरफ खुल गए हैं। मगर अफसोस कि अभी तक हरसाल योग के नाम पर विदेशियों से लाखों कमाने वाले बाबा, पर्यावरण संरक्षण और निर्मल गंगा के नाम पर लफ्फाजियां भरी बैठकों का आयोजन करने वाले बाबा, गंगा की छाती पर अतिक्रमण करने वाले बाबा, सरकारी जमीनों और मदद की फिराक में रहने वाले बाबा, पीले वस्‍त्रधारी संस्‍कृत छात्रों के बीच चमकने वाले बाबा, कहीं नजर नहीं आ रहे हैं। आखिर वह अब हैं कहां.. क्‍यों नहीं आए वह अब तक त्रासदी के दर्द को कम करने के लिए, क्‍यों नहीं खुले अब तक उनके खजाने

Thursday, June 20, 2013

मूर्ति बहने का राष्ट्रीय शोक

         ऋषिकेश में एक मूर्ति बही तो देश का पूरा मीडिया ने आसमान सर पर उठा लिया। खासकर तब जब वह न तो ऐतिहासिक थी, न पौराणिक। 2010 में भी मूर्ति ऐसे ही बही थी। जबकि राज्‍य के अन्‍य हिस्‍सों में हजारों जिंदगियां दफन हो चुकी हैं। तब भी मीडिया के लिए मूर्ति का बहना बड़ी खबर बनी हुई है। मजेदार बात कि यह क्लिप मीडिया को बिना प्रयास के ही मिल गए। आखिर कैसे.. जबकि ऋषिकेश में राष्‍ट्रीय मीडिया का एक भी प्रतिनिधि कार्यरत नहीं है। एक स्‍थानीय मीडियाकर्मी की मानें तो यह सब मैनेजिंग मूर्ति के स्‍थापनाकारों की ओर से ही हुई।

Saturday, June 08, 2013

मैं, इंतजार में हूं


मैं, समझ गया हूं
तुम भी, समझ चुके हो शायद
मगर, एक तीसरा आदमी है
जो, चौथे और पांचवे के -
बहकावे में आ गया है
खुली आंखों से भी
नहीं देखना चाहता 'सच'

मैं और तुम विरोधी हैं उसके
कारण, हम नहीं सोचते उसकी तरह
न, वह हमारी तरह सोचता है

रिक्‍त शब्‍द भरो की तरह
हम खाली 'आकाश' भरें, भी तो कैसे
सवाल कैनवास को रंगना भर भी नहीं
पुराने चित्र पर जमीं धूल की परतें
खुरचेंगे, तो तस्‍वीर के भद्दा होने का डर है

मैं, इंतजार में हूं
एक दिन हिनहिनाएगा जरुर
और धूल उतर जाएगी उसकी
काश...
हमारा इंतजार जल्‍दी खत्‍म हो जाए
रात गहराने से पहले ही......

सर्वाधिकार- धनेश कोठारी 

Sunday, June 02, 2013

बेटियां


कई बार देखा
बेटियों को बेटा बनते हुए
मगर, बेटे
हर बार बेटे ही बने देखे

इसलिए
जोर देकर कहूंगा
बेटियां तो 'बेटियां' ही होती हैं
बेटा बन गए, तो
क्‍या मालूम
फिर पीछे मुड़कर देखें न देखें....।

सर्वाधिकार- धनेश कोठारी

Thursday, March 28, 2013

सांसू त् भ्‍वोर

बिसगणि बिसैकि सै
उकळी जैलि उकाळ
एक न एक दिन
सांसू त् भ्‍वोर

जाग मा च मयेड़
बैठीं देळी मा अब्बि तलक
बर्सूं बाद- सै
पछणे जैलि धार मा ई
सांसू त् भ्‍वोर

धारा मंगरा पगळी जाला
डांडा कांठा मौळी जाला
बौडी जाला भाग-
फेर, देर-सबेर
सांसू त् भ्‍वोर

सर्वाधिकार- धनेश कोठारी

Friday, March 22, 2013

Chola-Badal: Review

Chola-Badal: Satire on Blind Followership of Political Leaders

Critical review of Garhwali satirical proseCritical Review of Garhwali Satirical prose written by Dhanesh Kothari -1 Review of Satirical article ‘Chola-Badal(Chitthi Patri January 2002) by Dhanesh Kothari

Review by Bhishma Kukreti
[Notes on Satire on Blind Followership of Political Leaders; Garhwali Satire on Blind Followership of Political Leaders; Uttarakhandi Satire on Blind Followership of Political Leaders; Mid Himalayan regional language Satire on Blind Followership of Political Leaders; Himalayan regional language Satire on Blind Followership of Political Leaders; North Indian regional language Satire on Blind Followership of Political Leaders; South Asian regional language Satire on Blind Followership of Political Leaders; Asian regional language Satire on Blind Followership of Political Leaders; Oriental regional language Satire on Blind Followership of Political Leaders]

Tuesday, March 05, 2013

हाइकू

1
बोगठ्या
काळू हो चा गोरु
दोष नि मिटण
त् क्य फैदू

2
पळ्नथरा
ढुंगौं पर बि पळ्येक
खुंडा होणान्
विचार

सर्वाधिकार- धनेश कोठारी

Friday, March 01, 2013

हाइकू


दूध्याळूं थैं दूद नि
अर गणेश-
गंडेळ होणान्


भग्यान
खै नि जाणनान्
अभागी ब्वन्नु
मैं बि भग्यान होंदू

सर्वाधिकार- धनेश कोठारी

Monday, February 25, 2013

Sunday, February 10, 2013

'जाह्नवी' का लोकार्पण

   नई दिल्ली, विश्व पुस्तक मेला-2013 में रविवार को युवा कवि-पत्रकार जगमोहन 'आज़ाद' के तिसरे कविता संग्रह 'जाह्नवी' का लोकार्पण हिन्दी अकादमी के सचिव डॉ.हरिसुमन बिष्ट एवं वरिष्ठ लेखक एवं समयांतर के संपादक पंकज बिष्ट ने किया। पुस्तक का विमोचन करते हुए वरिष्ठ लेखक एवं हिन्दी अकादमी के सचिव डॉ.बिष्ट ने कहा की जगमोहन के इस संग्रह कि कविताएं निराल की कविता सरोज स्मृति की याद दिला देती है।
जाह्नवी संग्रह के माध्यम् से जगमोहन ने अपनी चार साल की बिटियां जाह्नवी के छोटे से जीवन को कविता के रूप में पिरो कर एक नयी परिभाषा उकेरी है...जो बहुत ही मार्मिक और मन से जुड़ी है। डॉ.हरिसुमन ने पुस्तक मेले में विमोचन के समय उपस्थित पाठकों और दर्शकों को अवगत कराया की...जगमोहन की बिटिया...जाह्नवी...भयंकर बिमारी ब्रेनइंजरी से ग्रस्त थी,जो चार साल की छोटी इस उम्र में इस बिमारी से लड़ते हुए...हमसे दूर चली गयी,लेकिन जगमोहन ने अपनी कविताओं के माध्यम् से अपनी बिटियां को अपनी गोद में आज भी जीवित रखा है।
इस अवसर पर समयांतर के संपादक एवं वरिष्ठ लेखक पंकज बिष्ट ने कहा कि युवा कवि जगमोहन आज़ाद की पुस्तक जाह्नवी की कविताएं निश्चित तौर हम सब की बेटी की कविताएं है। इन कविताओं को पढ़ते हुए। जीवन और मृत्यु को परिभाषित करने की नयी सोच पैदा ही नहीं करती बल्कि असाध्य रोग किस तरह मनुष्यता की सारी प्रगति पर प्रश्नचिहन भी छोड़ती है। जिसे जगमोहन ने अपनी हर कविता में उकेरा है। यह बहुत ही सोचनीय और गंभीर भी हैं कि एक सहृदय पिता के द्वारा पुत्री के शोक में रचित एक-एक पंक्ति जब हमें भावुक कर रही हैं तो खुद इस पिता की मनोस्थित क्या रही होगी। यह शायद जगमोहन बेहतर जानते होगें। लेकिन उन्होंने जिस तरह से अपनी पुत्री की छोटे जीवन काल के इन कविताओं में उकेरा हैं,यह यकीनन बेटी जाह्नवी को श्रद्धांजलि है। इसके लिए जगमोहन आज़ाद की तारीफ की जानी चाहिए।
इस अवसर पर उपस्थित युवा पत्रकार जगदीश जोशी साधक ने कहा की,मैने अपनी आंखों से जगमोहन आज़ाद को अपनी बेटी जाह्नवी को देश के बड़े-बड़े अस्पतालों और वेद्याचार्यों के यहां जाते हुए देखा है। मैने उनकी पीड़ा को बहुत करीब से देखा है। अपनी बिटियां की बिमारी को लेकर जो संघर्ष जगमोहन और उनकी पत्नी सुनीता ने किया,मैने उसे बहुत नजदीक से महसूस किया हैं,और आज उन संघर्षों और पीड़ा को इन कविताओं में देख रहा हूं,तो भावुक हो जाता हूं।
इस मौके पर भावुक होते हुए पुस्तक के लेखक जगमोहन आज़ाद ने कहां की इस संग्रह में मौजूद हर एक कविता मेरी बिटियां जाह्नवी की कविताएं हैं। ये हमारे वजूद की कविताएं है...जो हमारी गोद में हमेशा खेलती कुदती रहेगी...हमारी जाह्नवी की तरह...
जगमोहन आज़ाद की पुस्तक के विमोचन के अवसर पर हिन्दी के वरिष्ठ लेखक प्रदीप पंत,धात के संस्थापक लोकेश नवानी,वरिष्ठ पत्रकार रमेश आज़ाद,राजेश डोबरियाल,नेशनल बुक ट्रस्ट,इंडिया के सहायक निदेशक राकेश कुमार सहित कई पत्रकार एवं कवि मौजूद थे।

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