Saturday, December 08, 2012

नेगी को ध्वजवाहक बताना कितना सही

उत्तराखंड के सुप्रसिद्ध लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी इन दिनों अपनी बिरादरी के निशाने पर हैं। उत्तराखंड के एक अन्य गायक गजेन्द्र सिंह राणा ने अपने गीतसे उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया। उत्तराखंड के मीडिया और फेस बुक पर सकि्रय तमाम लोग और संगठन नेगी के समर्थन में खड़े हो गये। सबको लगता है कि नेगी जी जैसे प्रतिषिठत लोक गायक के... लिये इस तरह की ओछी हरकतें ठीक नहीं हैं। एक बड़ा तबका है जो नेगी जी को उत्तराखंड के गीत-संगीत का प्रतीक पुरुष मानता है। पिछले एक-दो दशकों से निशिचत रूप से उन्होंने उत्तराखंड के जनमानस पर अपनी गहरी छाप छोड़ी है। नरेन्द्र सिंह नेगी को उत्तराखंड में आज की भाषा में एक 'सेलिवेटरी होने का गौरव प्राप्त हुआ है। यही वजह है कि जब उनकी ही बिरादरी के एक गायक ने उनके खिलाफ गीत बना दिया तो भूचाल गया। खैर गजेन्द्र राणा ने किस पीड़ा के चलते यह गीत लिखा है यह तो वही जाने लेकिन इस आलोक में जो बहस चली है उसे किस रूप में आगे बढ़ना चाहिये इसका निर्धारण करना बहुत जरूरी है। वह इसलिये भी जरूरी है कि अपनी अभिव्यकित की स्वतंत्रता और पेशे को हम रचनात्मक दिशा दें या विध्वंसात्मक यह भी तय करना होगा। गजेन्द्र राणा ने यह तय नहीं किया और उन्होंने एक बर्रे के छते पर हाथ डाल दिया जहां उन्हें लहूलुहान होना ही था। गजेन्द्र राणा अपने स्तरीय गीतों के माध्यम से अगर नरेन्द्र सिंह नेगी का विकल्प बनते तो शायद उत्तराखंड की सांस्कृतिक जमीन मजबूत होती। लेकिन उन्होंने इस तरह के बेहूदा गीत गाकर केवल अपनी किरकिरी करार्इ, बलिक नरेन्द्र सिंह नेगी की प्रासंगिकता को और आगे बढ़ा दिया। असल में इस तरह की प्रवृति हमारे पूरे समाज के लिये घातक होती है। इस तरह की रचनाओं से पहले रचनाकार को अपने विवेक से काम लेना चाहिये।
फेस बुक और मीडिया ने इस सवाल को जिस तरह से उठाया उससे उत्तराखंड के लोक साहित्य-संगीत पर नर्इ चर्चा शुरू की जा सकती है। नरेन्द्र सिंह नेगी के तमाम समर्थकों ने उनके पक्ष में अपनी-अपनी तरह से कसीदे पढ़े। मांग उठ रही है कि उन्हें पदमश्री पुरस्कार दिया जाना चाहिये। बताया जाता है किसी ने यह भी कहा कि भारत रत्न मिलना चाहिये। मिल भी जाये तो हमारे लिये तो गौरव की ही बात होगी। हम तो चाहेंगे कि नेगी जी को नोबेल मिल जाये। लेकिन कभी थोड़ा ठहरकर हमें यह भी समझने की कोशिश करनी चाहिए कि जो मांग या बात हम लोग करते हैं उसका कोर्इ जमीनी आधार भी होता है या नहीं। मैं नरेन्द्र सिंह नेगी के गीतों का मुरीद रहा हूं। कुमाऊं क्षेत्र में नरेन्द्र सिंह नेगी को सबसे पहले तब जाना गया जब उन्होंने 'नौछमी नरेणा गीत की रचना की। दुर्भाग्य से नरेन्द्र सिंह नेगी को गढ़वाल से बाहर अपनी सबसे कमजोर और मसखरी से भरे गीत से प्रसिद्धि मिली (हालांकि इस गीत की प्रासंगिकता और तथ्यों को मैं तत्कालीन राजनीति और उसमें आयी विकृतियों को जनता के सामने रखकर एक नयी चेतना के रूप में देखता हूं। मैं नरेन्द्र सिंह नेगी के इस गाने को उसी परिसिथति में देखता हूं। उनके गीतों का मूल्योकन उससे बहुत आगे का है) मैं नेगी जी के गीतों से तीस साल पहले से परिचित था। मैंने उनका पहला गीत 'नयौ-नयौ ब्यौ..... सुना था। उनका दूसरा गीत 'सुणले दिदा तैक अयूंछ....., 'ना बैठ ना बैठ बिंदी ना बैट चर्खी मां.... आदि सुने। असल में हमें गढ़वाली भाषा-बोली समझने की इच्छा यहीं से जागी। राज्य आंदोलन के दौरान उनकी जो कैसेट आयी उसे मैंने अपने पैसों से खरीद कर लोगों के बीच बंटवाया। यह वह दौर था जब हमारे सामने रोटी का भी संकट था। कुल मिलाकर नरेन्द्र सिंह नेगी को मैं व्यकितगत रूप से उत्तराखंड के गीत-संगीत का एक मजबूत स्तंभ मानता हूं। लोकगीतों के अलावा उन्होंने जो गीत लिखे भी उनमें भाषा का सौन्दर्य और पहाड़ के परिवेश की पीड़ा झलकती है। उन्होंने जिस तरह के गीतों का संसार रचा है वह अदभुत है। इन तमाम खूबियों के बावजूद नरेन्द्र सिंह नेगी उत्तराखंड के लोक गीत-संगीत के एक अच्छे रचनाकार मात्र हैं। वे कुछ गायकों से अच्छे हो सकते हैं लेकिन उन्हें यहां की गीत-संगीत परंपरा का ध्वजवाहक बताना न्यायोचित नहीं है।
उत्तराखंड के गीत-संगीत की पूरी यात्रा पर नजर डालें तो एक भी गीत ऐसा नहीं है जो देश-विदेश में हमारा प्रतिनिधित्व करता हो। एक कोशिश ब्रजेन्द्र लालसाह और मोहन उप्रेती ने जरूर की थी कि देश-विदेश में 'बेडू पाकों बारमासा...... गीत से पहाड़ को जाना गया। हमारा कोर्इ गीत-संगीत-गीतकार-संगीतकर नहीं है जिसे देश में भूपेन हजारिका, तीजनबार्इ, सपना अवस्थी, गुरदास मान के रूप में जाना जाता हो। एक ऐसा गीत नहीं है जो भोजपुरी, हिमाचली, राजस्थानी, हरियाणवी आदि के बराबर में रखा जा सकता हो। कोर्इ लोक गायक और लोक संगीत की परंपरा आगे नहीं बढ़ी जिसे हम अपने इन तथाकथित नायकों की उपलबिध मान सकें। गीत-संगीत की दृषिट से मूल्यांकन किया जाए तो गढ़वाली का सबसे कर्णप्रिय और दिल से गाया गया गीत भी स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर का है। आज देश के दूरदर्शन और टीवी चैनलों में जितने भी धारावाहिक और संगीत के कार्यक्रम आते हैं उनमें देश के विभिन्न हिस्सों की भाषा संस्कृति पर आधारित कार्यक्रम आते हैं। किसी जमाने में विधासागर नौटियाल, मनोहर श्याम जोशी, शेखर जोशी, उर्मिल थपलियाल जैसे कुछ लोगों को छोड़ दिया जाये तो उत्तराखंड के परिवेश पर बने नाटकों, फिल्मों, गीतों आदि को कहीं स्थान नहीं मिला। इसकी वजह यह भी रही कि ये उत्तराखंड से ज्यादा हिन्दी के रचनाकार थे। गिरीश तिवारी 'गिर्दा और बल्ली सिंह चीमा की कविताओं को देश के लोग इसलिये जानते हैं क्योंकि उन्होंने उत्तराखंड से बाहर भी अपना एक रचना संसार बनाया। गिर्दा का आधे से अधिक साहित्य देश के सुप्रसिद्ध गीतकारों के गीतों का अनुवाद है। उन्होंने जिस खूबी से उसे कुमांउनी में प्रस्तुत किया है वह अदभुत है। आकाशवाणी में उत्तराखंड के जो कार्यक्रम प्रसारित भी होते थे उन्हें मुख्यधारा के संगीत में शामिल करने की बजाए 'उत्तरायण और 'गिरि गुंजन जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से आगे लाया गया। यह भी इसलिये संभव हो पाया कि यहां इस क्षेत्र के लोग जुड़े हुये थे। यह उसी तरह का मामला है जैसे दिल्ली जैसे महानगर में पहाडि़यों की ज्यादा संख्या देखकर कांग्रेस और भाजपा जैसी पार्टियां उत्तराखंड प्रकोष्ठ का निर्माण कर उन्हें मुख्य धारा से बाहर कर देते हैं। इससे कुछ लोगों की दुकान तो चल सकती है लेकिन पहाड़ के लोगों का हित नहीं हो सकता है।
नरेन्द्र सिंह नेगी के बहाने हम लोग केशव अनुरागी जैसे उत्तराखंड के गीत-संगीत के पुरोधाओं को भी याद कर लेते जिन्होंने रेडियो के जमाने से यहां के गीत-संगीत के लिये मंच तैयार किया। लोक पर जितना काम केशव अनुरागी ने किया उसके लिये आज के संगीत के इन नायकों को कर्इ जन्म लेने पड़ेंगे। अभी भी रामलीलाओं से लेकर छोटे मंचों में अपनी प्रस्तुति देने वाले जमीन से जुड़े कर्इ लोक गायक वहां की विधाओं को जिन्दा रखें हैं। उनके पास जीवकोपार्जन का संकट भी है। लेकिन जब अमेरिका-इंग्लैड में गाने वाले और देश में बड़े आयोजनों में शिरकत करना ही योग्यता का मापदंड हो तो उत्तराखंड के गीत-संगीत के संरक्षण और संबर्धन की परवाह किसको है। इसलिये हम लोग नरेन्द्र सिह नेगी का उत्तराखंड के गीत-संगीत पर उनके योगदान और योग्यता की र्इमानदारी से चर्चा करें। और यहां के उन्नत साहित्य-संगीत-कला को व्यापक स्तर पर लोगों के सामने लाने में उसका उपयोग करें तो शायद पहाड़ का भला होगा। हम सब लोग यदि वास्तव में नरेन्द्र सिंह नेगी जैसे लोगों और उनके गीत-संगीत को दुनिया के सामने लाना चाहते हैं तो हमें उनके गीत और कविताओं के लिये व्यापक आकाश बनाना होगा। उनके गीतों के अनुवाद और उत्तराखंड से बाहर ले जाने के बारे में सोचना होगा। गजेन्द्र राणा से लेकर अगर आप नरेन्द्र सिंह नेगी का मूल्यांकन करते हैं तो नरेन्द्र सिंह नेगी और उनके गीतों के साथ अन्याय करते हैं। यही समय है हम यहां के गीत-संगीत-साहित्य और कला के विकास के बारे में गंभीरता से सोचें नहीं तो हम एक दूसरे की पीठ खुजलाकर अपनी स्वघोषित संस्कृति-भाषा-साहित्य-कला का ढोल पीटते रहेंगे। इतिहास के तमाम पृष्ठ ऐसे हैं जहां उत्तराखंड के योगदान को वह स्थान नहीं मिल पाया जिसके वे हकदार थे। यह अलग बात है कि गर्व करने के लिये हमारे बहुत सारे इतिहासकार, बड़े साहित्यकार और सामाजिक क्षेत्रों की हसितयां शामिल हैं जिन्हें देश के बड़े पुरस्कार मिलते रहे हैं। पदमश्री से लेकर जमनलाल बजाज और मैग्ससे तक की दौड़ में कहीं पहाड़ के दर्द पीछे छूट जाये इसका भी हमें ध्यान रखना होगा।
अन्त में साथी विक्रम नेगी की यह कविता हमारे अग्रजों के योगदान को साफ कर देती है-पहाड़ एक ही था
तुमने दो कर दिये,सीधे-साधे पहाड़ के ऊपर तुमने
अपना पहाड़ खड़ा कर लिया।
हमारे पहाड़ के कपड़े उतारकर,तुमने अपने पहाड़ को पहना दिये।
तुम्हारा पहाड़ मोटा होता गया,तुम्हारे पहाड़ के बोझ से
हमारा पहाड़ जमीन में धंस रहा है
तुमने खूब मजे किये
हमारे पहाड़ की बैचेनी को रिकार्ड करके
तुमने खूब मोटी-मोटी किताबें लिखीं
हमारे पहाड़ के आंसुओं पर
याद रखना
हमारा पहाड़ अभी मरा नहीं है
वो जिन्दा है,हमारा पहाड़ पलटकर तुम्हें जबाव देगा,इंतजार करो.....See More

चारु तिवारी
कार्यकारी संपादक, जनपक्ष आजकल (मासिक)

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