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Thursday, August 17, 2017

यहां है दुनिया का एकलौता 'राहू मंदिर'


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कभी नहीं सुना होगा कि देश के किसी गांव में देवों के साथ दानव की पूजा भी हो सकती है। आश्चर्य होगा सुन और जानकर कि उत्तराखंड के एक गांव में भगवान शिव के साथ राहू को भी पूजा जाता है। इस मंदिर में भोलेनाथ शिव के साथ राहू की प्रतिमा भी स्थापित है। इस मंदिर को देश ही नहीं दुनिया का भी एकमात्र राहू मंदिर माना जाता है।

Thursday, August 10, 2017

कब खत्म होगा युवाओं का इंतजार ?

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उत्तराखंड आंदोलन और राज्य गठन के वक्त ही युवाओं ने सपने देखे थे, अपनी मुफलिसी के खत्म होने के। उम्मीद थीं कि नए राज्य में नई सरकारें कम से कम यूपी की तरह बर्ताव नहीं करेंगी, उन्हें रोजगार तो जरूर मिलेगा। जिसके लिए वह हमेशा अपने घरों को छोड़कर मैदानों में निकल पड़ते हैं। सिलसिला आज भी खत्म नहीं हुआ है। वह पहले की तरह ही घरों से पलायन कर रहे हैं। गांव की खाली होने की रफ्तार राज्य निर्माण के बाद ज्यादा बढ़ी। सरकारी आंकड़े ही इसकी गवाही दे रहे हैं। ऐसा क्यों हुआ? जवाब बहुत मुश्किल भी नहीं।

Sunday, August 06, 2017

आखिर क्या मुहं दिखाएंगे ?


किचन में टोकरी पर आराम से पैर पसारे छोटे से टमाटर को मैं ऐसे निहार रहा था, जैसे वो शो-केस में रखा हो। मैं आतुर था कि उसे लपक लूं। इतने में ही बीबी ने कहा- अरे! क्या कर रहे हो, ये एक ही तो बचा है। कोई आ ही गया तो क्या मुहं दिखाएंगे? आजकल किचन में टमाटर होना प्रेस्टीज इश्यू हो गया है। पूरे 100 रुपये किलो हैं।

Saturday, August 05, 2017

वह दूसरे जन्म में पानी को तरसती रही

एक परिवार में दो महिलाएं जेठानी और देवरानी रहती थी। जेठानी बहुत दुष्ट और देवरानी शिष्ट, सौम्य, ईमानदार व सेवा भाव वाली थी। दोनों के ही कोई संतान नहीं थी। देवरानी जो भी कमाकर लाती, वह अपनी जेठानी को सौंप देती और दुःख-दर्द के वक्त पूरे मनोयोग से उसकी सेवा करती। ताकि दोनों में प्रेम भाव बना रहे। किंतु देवरानी के इतना करने के बाद भी जेठानी हर समय नाराज रहती, उसके साथ किसी भी काम में हाथ नहीं बंटाती।

Tuesday, August 01, 2017

फिर जीवंत हुई ‘सयेल’ की परंपरा

हरियाली पर्व हरेलाकी तरह पहाड़ के लोकजीवन में धान की रोपाई के दौरान निभाई जाने वाली सयेलकी परंपरा भी हमारे पर्वतीय समाज में सामुहिकता के दर्शन कराती है। हरेला को हमने हाल के दिनों में सरकारी आह्वान पर कुछ हद तक अपनाना शुरू कर दिया है। मगर, सयेल की परंपरा कहीं विस्मृति की खोह में जा चुकी है। यह खेती से हमारी विमुखता को दर्शाती है। हालांकि पिछले दिनों यमकेश्वर विकास खंड के गांव सिंदुड़ी के बैरागढ़ तोक में बुजुर्ग कुंदनलाल जुगलाण की पहल पर जरूर इसे दोबारा से चलन में लाने की कोशिश हुई है।

Friday, March 31, 2017

“सुबेर नि हूंदि“ (गज़ल)

काम काज़ा की अब कैथै देर नि हूंदि
अजकाल म्यारा गौं मा सुबेर नि हूंदि


घाम त तुमरि देळमि कुरबुरि मै बैठु जांदु द्य
अगर सूरज़ थैं बूण भजणा कि देर नि हूंदि


खोळ्यूं का द्यप्ता भि दगड़म परदेस पैट जांदा
जो गौं गळ्यां मा घैंटी डौड्ंया की केर नि हूंदि


गुठ्यारा की गौड़ि अपणि बाछि थैं सनकाणि चा
द्विया खळ्कि जांदा जो या दानि गुयेर नि हूंदि


द्यप्तौं का ठौ का द्यू बळ्दरा भि हर्चिगीं कखि
द्यप्तौं का घारम बल देर च पर अंधेर नि हूंदि


जब बटैकि उज्यळौं मा रैणा कु ढब ऐ ग्याई
अंध्यरौं मा गांवा की मुकजात्रा बेर बेर नि हूंदि


होलि तू दूणेक,नाळेक,पाथेक,सेरेक परदेस मा
जलमभुमि कभि अपणों खुण सवासेर नि हूंदि


जो बैठिगीं, वो बैठिगीं भग्यान वे खैरा चमसू
’पयाश’ बांजि पुंगड़ियूं मा क्वी हेरफेर नि हूंदि


--  पयाश पोखड़ा