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Monday, October 16, 2017

मेरो हिमालय

म्यारा ऊंचा हिमालय
तै शांत रैण द्या
नि पौंछावा सड़की
पुंगड़ी - कूड़ी नि दब्यौण द्या,
म्यारा ऊंचा हिमालय
तै शांत रैण द्या ।

Monday, October 09, 2017

कलह से धीमी हुई डबल इंजन की रफ्तार

हाल में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने उत्तराखंड दौरे पर भले ही सरकार के छह महीने के कार्यकाल को 100 नंबर दिए हों, मगर उन्होंने अपने दौरे में सरकार के अधिक संगठनको तरजीह दी। शायद इसलिए भी कि कुछ समय से सरकार और संगठन के बीच का तालमेल पटरी पर नहीं है। यह भी कह सकते हैं कि किसी दल के लिए सियासत में प्रचंड बहुमत ही पर्याप्त नहीं होता है, निरंतरता और प्रगति के लिए संगठनात्मक ताकत का उत्तरोत्तर बढ़ना भी जरूरी है।

Tuesday, September 26, 2017

दोस्तों की जुगलबंदी ने दिखाई रोजगार की राह

 उत्तराखंड को प्रकृति ने बेपनाह सौंदर्य से लकदक किया है। हरसाल हजारों लोग इसी खूबसूरती के दीदार को यहां पहुंचते हैं। विश्व विख्यात फूलों की घाटी, हिमक्रीड़ा स्थल औली, झीलों की नगरी नैनीताल, पहाड़ों की रानी मसूरी, मिनी स्विट्जरलैंड पिथौरागढ़, कौसानी आदि के बाद सैलानी जब चोपता-दुग्लबिटा पहुंचते हैं, तो कश्मीर जैसी यहां की सुंदरता को देखकर अवाक रह जाते हैं। उन्हें विश्वास नहीं होता, कि वाकई उत्तराखंड में कोई जन्नत है।

Sunday, September 24, 2017

अगर हम किताबें नहीं पढ़ेंगे...

जो लोग किताबें नहीं पढ़ते, वे अंततः राम-रहीम को जन्म देते हैं। हमारे समाज में राम-रहीम पैदा होते हैं, क्योंकि हम किताबों को सिर्फ नौकरी पाने के लिये पढ़ते हैं। हम अगर किताब पढ़ेंगे तो हमारे आसपास राम-रहीम जन्म नहीं ले पायेंगे। हम अगर किताब पढ़ेंगे तो लालबहादुर शास्त्री और माणिक सरकार जैसे नेताओं को जन्म देंगे। अगर हम किताब पढ़ेंगे तो धर्म और राजनीति का घालमेल नहीं होने देंगे। लफ्फाजों के बहकावे में नहीं आयेंगे।

Thursday, September 21, 2017

अस्पताल

सुविधा त सबि छन यख
अजगाल अस्पताल मा
डागटर च
दवे च
कंपौंडर च
यख तक कि
नर्स अर आया भि च
पर हां !

Tuesday, September 19, 2017

खाली होते गांवों से कैसे बचेगा हिमालय !

पलायन रोकने की न नीति न प्लान, तो फिर हिमालय दिवस पर कोरे संकल्प क्यों?
उत्तराखंड में हाल में हिमालय को बचानेपर केंद्रित जलसे जोश ओ खरोश से मनाए गए। सरकार से लेकर एनजीओ, सामाजिक संगठनों, स्कूली छात्रों, सरकारी, गैर सरकारी कार्मिकों, पर्यावरणविदों और धर्मगुरुओं की चिंता, चिंतन, शपथ, संकल्प अपने पूरे शबाब पर रहे। एसी होटल, कमरों से लेकर स्कूलों के प्रांगण, सरकारी और गैर सरकारी दफ्तरों में शपथ (संकल्प) लेते चित्र अगले दिन के अखबारों में निखरकर सामने आए।

Thursday, September 14, 2017

उत्तराखंड की जांबाज बेटियां विश्व परिक्रमा को रवाना

उत्तराखंड की दो जांबाज बेटियां लेफ्टिनेंट कमांडर वर्तिका जोशी और पायल गुप्ता भारतीय नौसेना के बेहद महत्वपूर्ण मिशन नाविक सागर परिक्रमाके लिए रवाना हो गई हैं। नौसेना के छह सदस्यीय नाविक दल की सदस्य ये दो बेटियां, अगले छह महीने में लगभग 22 हजार नॉटिकल मील की समुद्री दूरी नापते हुए पृथ्वी का चक्कर पूरा करेंगी।

Wednesday, September 13, 2017

स्वैच्छिक चकबंदी और बागवानी के प्रेरक बने ‘भरत’

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उत्तरकाशी जिले के नौगांव विकासखंड अंतर्गत हिमरोल गांव के भरत सिंह राणा अपने क्षेत्र में लोगों को स्वैच्छिक चकबंदी के लिए प्रेरित कर मिसाल बन रहे हैं। जगह-जगह बिखरे खेतों की चकबंदी कर विभिन्न प्रजाति के फल पौधों का रोपण किया, पॉली हाउस, ड्रिप एरीगेशन, पाइप लाइन, दो सिंचाई हौजों का निर्माण करके बागवानी शुरू की है।

Tuesday, September 12, 2017

अथ श्री उत्तराखंड दर्शनम्

नेत्र सिंह असवाल

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जयति जय-जय देवभूमि, जयति उत्तराखंड जी
कांणा गरूड़ चिफळचट्ट, मनखि उत्तणादंड जी।

तेरि रिकदूंल्यूं की जै-जै, तेरि मुसदूल्यूं की जै
त्यारा गुंणी बांदरू की, बाबा बजि खंड जी।

इक मिनिस्टर धुरपिळम् पट, एक उबरा अड़गट्यूं
हैंकू खांदम नप्प ब्वादा, धारी म्यारू डंड जी।

Monday, August 28, 2017

सिर्फ भाषणों और नारों से नहीं बचती बेटियां!

जिस पर बेटियों के साथ दुराचार व हत्या के आरोप में सीबीआई जांच के बाद न्यायालय में मुकदमा चल रहा हो, ऐसे व्यक्ति को देश के प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी जी स्वच्छता अभियान का ब्रांड एंबेसडर बनाते हैं। उनकी पार्टी सत्ता में आने के लिए ऐसे व्यक्ति के साथ वोटों का सौदा करती है। वोटों के सौदे से चुनाव जीतने के बाद उनकी पार्टी के कई बड़े नेता दुराचार के आरोपी के घर में मत्था टेकने जाते हैं।

Thursday, August 24, 2017

कैसा है कीड़ाजड़ी का गोरखधंधा

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देवभूमि उत्तराखंड अपनी नैसर्गिकता के साथ ही प्राकृतिक संपदा से भी परिपूर्ण है। इसी संपदा में शामिल हैं वह हजारों औषधीय पादप, जो आज के दौर में भी उपयोगी हैं। यही कारण है कि आज भी चिकित्सा की आयुर्वेदिक पद्धति के शोधकर्ता हिमालय का रुख करते हैं। खासबात कि यह सब पहाड़ की पुरातन परंपरा का हिस्सा हैं। गांवों में जानकार बुजुर्ग आज भी अपने आसपास से ही इन्हीं औषधियों का उपयोग कर लेते हैं। चीन और तिब्बत में कीड़ाजड़ी परंपरागत चिकित्सा पद्धित का हिस्सा है।

Friday, August 18, 2017

वीर भड़ूं कू देस बावन गढ़ कू देस

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वीर भड़ूं कू देस बावन गढ़ कू देस..., प्रख्यात लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी का यह गीत सुना ही होगा। जी हां! गढ़वाल को 52 गढ़ों का देश भी कहा जाता है। इस परिक्षेत्र में 52 राजाओं के आधिपत्य वाले यह राज्य तब स्वतंत्र थे। इनके अलावा भी गढ़वाल हिमालय क्षेत्र में थोकदारों के अधीन छोटे अन्य गढ़ भी थे। छठी शताब्दी में भारत में आए चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी इनमें से कुछ का जिक्र किया था।

Thursday, August 17, 2017

यहां है दुनिया का एकलौता 'राहू मंदिर'


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कभी नहीं सुना होगा कि देश के किसी गांव में देवों के साथ दानव की पूजा भी हो सकती है। आश्चर्य होगा सुन और जानकर कि उत्तराखंड के एक गांव में भगवान शिव के साथ राहू को भी पूजा जाता है। इस मंदिर में भोलेनाथ शिव के साथ राहू की प्रतिमा भी स्थापित है। इस मंदिर को देश ही नहीं दुनिया का भी एकमात्र राहू मंदिर माना जाता है।

Thursday, August 10, 2017

कब खत्म होगा युवाओं का इंतजार ?

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उत्तराखंड आंदोलन और राज्य गठन के वक्त ही युवाओं ने सपने देखे थे, अपनी मुफलिसी के खत्म होने के। उम्मीद थीं कि नए राज्य में नई सरकारें कम से कम यूपी की तरह बर्ताव नहीं करेंगी, उन्हें रोजगार तो जरूर मिलेगा। जिसके लिए वह हमेशा अपने घरों को छोड़कर मैदानों में निकल पड़ते हैं। सिलसिला आज भी खत्म नहीं हुआ है। वह पहले की तरह ही घरों से पलायन कर रहे हैं। गांव की खाली होने की रफ्तार राज्य निर्माण के बाद ज्यादा बढ़ी। सरकारी आंकड़े ही इसकी गवाही दे रहे हैं। ऐसा क्यों हुआ? जवाब बहुत मुश्किल भी नहीं।

Sunday, August 06, 2017

आखिर क्या मुहं दिखाएंगे ?


किचन में टोकरी पर आराम से पैर पसारे छोटे से टमाटर को मैं ऐसे निहार रहा था, जैसे वो शो-केस में रखा हो। मैं आतुर था कि उसे लपक लूं। इतने में ही बीबी ने कहा- अरे! क्या कर रहे हो, ये एक ही तो बचा है। कोई आ ही गया तो क्या मुहं दिखाएंगे? आजकल किचन में टमाटर होना प्रेस्टीज इश्यू हो गया है। पूरे 100 रुपये किलो हैं।

Saturday, August 05, 2017

वह दूसरे जन्म में पानी को तरसती रही

एक परिवार में दो महिलाएं जेठानी और देवरानी रहती थी। जेठानी बहुत दुष्ट और देवरानी शिष्ट, सौम्य, ईमानदार व सेवा भाव वाली थी। दोनों के ही कोई संतान नहीं थी। देवरानी जो भी कमाकर लाती, वह अपनी जेठानी को सौंप देती और दुःख-दर्द के वक्त पूरे मनोयोग से उसकी सेवा करती। ताकि दोनों में प्रेम भाव बना रहे। किंतु देवरानी के इतना करने के बाद भी जेठानी हर समय नाराज रहती, उसके साथ किसी भी काम में हाथ नहीं बंटाती।

Tuesday, August 01, 2017

फिर जीवंत हुई ‘सयेल’ की परंपरा

हरियाली पर्व हरेलाकी तरह पहाड़ के लोकजीवन में धान की रोपाई के दौरान निभाई जाने वाली सयेलकी परंपरा भी हमारे पर्वतीय समाज में सामुहिकता के दर्शन कराती है। हरेला को हमने हाल के दिनों में सरकारी आह्वान पर कुछ हद तक अपनाना शुरू कर दिया है। मगर, सयेल की परंपरा कहीं विस्मृति की खोह में जा चुकी है। यह खेती से हमारी विमुखता को दर्शाती है। हालांकि पिछले दिनों यमकेश्वर विकास खंड के गांव सिंदुड़ी के बैरागढ़ तोक में बुजुर्ग कुंदनलाल जुगलाण की पहल पर जरूर इसे दोबारा से चलन में लाने की कोशिश हुई है।

Friday, March 31, 2017

“सुबेर नि हूंदि“ (गज़ल)

काम काज़ा की अब कैथै देर नि हूंदि
अजकाल म्यारा गौं मा सुबेर नि हूंदि

घाम त तुमरि देळमि कुरबुरि मै बैठु जांदु द्य
अगर सूरज़ थैं बूण भजणा कि देर नि हूंदि