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Sunday, May 08, 2016

दुनियावी नजरों से दूर, वह 'चिपको' का 'सारथी'

दुनिया को पेड़ों की सुरक्षा के लिए 'चिपको' का अनोखा मंत्र देने और पर्यावरण की अलख जगाने वाले 'चिपको आंदोलन' के 42 साल पूरे हो गए हैं। इस आंदोलन की सबसे बड़ी 'यूएसपी' थी, पर्वतीय महिलाओं की जीवटता और निडरपन। मात्रशक्ति ने समूची दुनिया को बता दिया था, कि यदि वह ठान लें तो कुछ भी असंभव नहीं।

Wednesday, May 04, 2016

'जग्वाळ' से शुरू हुआ था सफर

uttarakhand
उत्‍तराखंडी फिल्‍मों का सफरनामा
4 मई का दिन उत्‍तराखंड के लिए एक खास दिन है। जब दुनिया में सिनेमा के अन्‍वेषण के करीब सौ साल बाद 1983 में पहली आंचलिक फीचर फिल्‍म 'जग्‍वाळ' प्रदर्शित हुई। यह इतिहास रचा नाट्य शिल्‍पी पाराशर गौड़ ने। तकनीकी कमियों के बावजूद पहली फिल्‍म के नाते 'जग्वाळ' को औसत रिस्‍पांस मिला। इसके बाद बिन्देश नौडियाल ने 1985 में 'कबि सुख कबि दु:ख' प्रदर्शित की।

Monday, May 02, 2016

पुष्‍कर की 'मशकबीन' पर 'लोक' की धुन

चेहरे पर हल्की सफ़ेद दाढ़ी... पहाड़ी व्‍यक्तित्व और शान को चरितार्थ करती हुई सुंदर सी मूछें... सिर पर गौरवान्वित महसूस कर देने वाली पहाड़ी टोपी... साधारण पहनावा और वेषभूषा... ये पहचान है, विगत 45 बरसों से मशकबीन के जरिये लोकसंस्कृति को संजोते, सहेजते पुष्कर लाल की। जो अकेले ही शादी ब्याह से लेकर, मेले, कौथिगों और धार्मिक अनुष्ठानों में अपनी ऊँगलियों के हुनर के जरिये पहाड़ की लोकसंस्कृति की विरासत को बचाए हुये हैं।

Sunday, May 01, 2016

मैं माधो सिंह का मलेथा हूँ­­­

maletha gaon uattarakhand
हुजूर!! मैं मलेथा हूँ, गढ़वाल के 52 गढ़ों के बीरों की बीरता के इतिहास की जीती जागती मिसाल। मैंने इतिहास को बनते और बदलते हुये देखा, गढ़वाल के बीर भड़ों की बीरता को देखा और अपनी माटी के लिए अपनों को ही मौन और बेजुबान होते भी देखा।