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Thursday, December 29, 2016

गुलज़ार साहब की कविता "गढ़वाली" में


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लोग सै ब्वळदिन,
ब्यठुला हैंकि बानि का 
उलखणि सि हुंदिन ।

सर्या राति फस्सोरिक नि सिंदिन,
कभि घुर्यट त कबरि कणट कनि रंदिन,
अद्निंदळ्यामा भि कामकाजा कु
स्या पट्टा लेखिक,
लाल पिंग्ळि पिठै लगैकि,
दिनमनि मा ब्यौ बरि
उर्याणि रंदिन पुर्याणि रंदिन ।

Sunday, December 25, 2016

समझौता-विहीन संघर्षों की क्रांतिकारी विरासत को सलाम


             तेइस अप्रैल, 1930 को बिना गोली चले, बिना बम फटे पेशावर में इतना बड़ा धमाका हो गया कि एकाएक अंग्रेज भी हक्के-बक्के रह गये, उन्हें अपने पैरों तले जमीन खिसकती हुई-सी महसूस होने लगी। इस दिन हवलदार मेजर चन्द्र सिंह गढ़वाली के नेतृत्व में रॉयल गढ़वाल राइफल्स के जवानों ने देश की आजादी के लिए लडऩे वाले निहत्थे पठानों पर गोली चलाने से इंकार कर दिया। अंग्रेजों ने तो पठान स्वतंत्रता सेनानियों के विरूद्ध गढ़वाली फौज को उतारा ही इसलिये था कि हिंदू-मुस्लिम विभाजन का बांटो और राज करोखेल जो वे 1857 के ऐतिहासिक विद्रोह के बाद से इस देश में खेलते आये थे, उसे वे पेशावर में एक बार फिर सरंजाम देना चाहते थे। 

Friday, December 23, 2016

दुनिया ने जिन्हें माना पहाड़ों का गांधी


24 दिसंबर 1925 को अखोड़ी गाँव,पट्टी-ग्यारह गांव, घनसाली, टिहरी गढ़वाल में श्रीमती कल्दी देवी और श्री सुरेशानंद जी के घर एक बालक ने जन्म लिया। जो उत्तराखंड के गांधी के रूप मे विख्यात हुए। इनका नाम था इन्द्रमणी बडोनी । इनकी कक्षा 4 (लोअर मिडिल) अखोड़ी से, कक्षा 7(अपर मिडिल)रौडधार प्रताप नगर से हुई। इन्होने उच्च शिक्षा देहरादून और मसूरी से बहुत कठिनाइयों के बीच पूरी की। इनके पिताजी का जल्दी निधन हो गया था । इन्होने खेती बाड़ी का काम किया और रोजगार हेतु बॉम्बे गये। अपने 2 छोटे भाई महीधर प्रसाद और मेधनीधर को उच्च शिक्षा दिलाई । इन्होने गांव में ही अपने सामाजिक जीवन को विस्तार देना प्रारम्भ किया जगह जगह सांस्कृतिक कार्यक्रम कराये।

Monday, December 19, 2016

गोर ह्वेग्यो हम


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जैकि मरजि जनै आणी, वु उनै लठ्याणूं छ
जैकि गौं जनै आणी, वु उनै हकाणू छ
ज्वी जनै पैटाणू छ, उनै पैटि जाणा छौ हम
सच ब्वन त मनखि नि रैग्यो, गोर ह्वेग्यो हम

Friday, December 09, 2016

युगों से याद हैं सुमाड़ी के 'पंथ्‍या दादा'

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सुमाड़ी गांव
'जुग जुग तक रालू याद सुमाड़ी कू पंथ्‍या दादा' लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी के एक गीत की यह पंक्तियां आपको याद ही होंगी. यह वही सुमाड़ी गांव के पंथ्‍या दादा थे, जिन्‍होंने तत्‍कालीन राजशाही निरंकुशता और जनविरोधी आदेशों के विरोध में अपने प्राणों की आहु‍ती ही दे डाली थी. उत्‍तराखंड की महान ऐतिहासिक गाथाओं में उनका नाम उसी गौरव के साथ शुमार ही नहीं, बल्कि उन्‍हें याद भी किया जाता है.

Thursday, December 08, 2016

हत्यारी सडक राजमार्ग 58 ...


ऋषिकेश से लेकर 
बद्रीनाथ तक 
लेटी है नाग की तरह 
जबडा फैलाये 
हत्यारी सडक 
राममार्ग 58 
रोज माँगती है 
भूखी नर भक्षणी शिकार 

Friday, October 07, 2016

... जिसकी जागर सुन, बरस जाते हैं बादल



उत्तराखंड को लोक और उसकी संस्‍कृति अपनी आगोश में अब भी काफी कुछ अनकहा, अनछुए पहलुओं को छुपाए हुए है. इन्‍हीं पहलुओं में एक है जागर गायन की विधा. देव आह्वान के स्‍वरूप जागरों में इतनी दिव्‍य शक्ति है, कि वह बादलों का रूख मोड़कर उन्‍हें बरसने तक को मजबूर कर सकते हैं. इसी चमत्‍कार का अनोखे साधक हैं जोशीमठ विकास खंड के गैणूलाल. जिन्‍हें दुनिया तो अब तक नहीं जान सकी. मगर जिन्‍होंने उन्‍हें प्रत्‍यक्ष सुना, वह कभी गैणूलाल को भूला भी नहीं पाएंगे.

Wednesday, August 31, 2016

हुजुर !! मुझे गेस्ट राजधानी न बना देना...


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मैं गैरसैण हूं.... राज्य बने हुये 16 बरस बीत जाने को है, लेकिन आज भी राजधानी के नाम पर पर पसरी धुंध साफ नहीं हुई। मुझे राजधानी बनाने के सपने को लेकर ही अलग उत्‍तराखंड राज्य की लड़ाई लड़ी और जीती गई थी। जैसे तैसे राज्य तो मिला, लेकिन राजनीति के शुरवीरों ने मुझे राजधानी घोषित करने की जगह स्थायी राजधानी चयन आयोग की बोतल मे बंद कर दिया। फिर बारी-बारी से आयोग का कार्यकाल बढ़ाया गया। मेरे बाद रायपुर मे भी विधानसभा भवन को मंजूरी मिली, जो समझ से परे है।

Saturday, August 20, 2016

काफल पाको ! मिन नि चाखो

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'काफल' एक लोककथा 
उत्‍तराखंड के एक गांव में एक विधवा औरत और उसकी 6-7 साल की बेटी रहते थे। गरीबी में किसी तरह दोनों अपना गुजर बसर करते। एक दिन माँ सुबह सवेरे जंगल में घास के लिए गई, और घास के साथ 'काफल' (पहाड़ का एक बेहद प्रचलित और स्‍वादिष्‍ट फल) भी साथ में तोड़ के लाई। जब बेटी ने काफल देखे तो वह बड़ी खुश हुई।

Tuesday, August 16, 2016

सामयिक गीतों से दिलों में बसे 'नेगी'



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       अप्रतिम लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी के उत्तराखंड से लेकर देश दुनिया में चमकने के कई कारक माने जाते हैं. नेगी को गढ़वाली गीत संगीत के क्षितिज में लोकगायक जीत सिंह नेगी का पार्श्व में जाने का भी बड़ा लाभ मिला. वहीं, मुंबई, दिल्‍ली जैसे महानगरों में सांस्‍कृतिक कार्यक्रमों में सक्रियता, सुरों की साधना, संगीत की समुचित शिक्षा, गीतों में लोकतत्‍व की प्रधानता जैसी कई बातों ने नरेंद्र सिंह नेगी को लोगों के दिलों में बसाया.

Tuesday, August 09, 2016

सिल्‍वर स्‍क्रीन पर उभरीं अवैध खनन की परतें

फिल्म समीक्षा
गढ़वाली फीचर फिल्म
उत्तराखंड में अवैध खननसिर्फ राजनीतिक मुद्दा भर नहीं है। बल्कि, यह पहाड़ों, नदियों, गाड-गदेरों की नैसर्गिक संरचना और परिस्थितिकीय तंत्र में बदलाव की चिंताओं का विषय भी है। लिहाजा, ऐसे मुद्दे को व्यापक रिसर्च के बिना ही रूपहले फिल्मी परदे पर उतारना आसान नहीं। हालिया रिलीज गढ़वाली फीचर फिल्म भुली ऐ भुलीके साथ ही यही हुआ है।

Sunday, May 08, 2016

दुनियावी नजरों से दूर, वह 'चिपको' का 'सारथी'

दुनिया को पेड़ों की सुरक्षा के लिए 'चिपको' का अनोखा मंत्र देने और पर्यावरण की अलख जगाने वाले 'चिपको आंदोलन' के 42 साल पूरे हो गए हैं। इस आंदोलन की सबसे बड़ी 'यूएसपी' थी, पर्वतीय महिलाओं की जीवटता और निडरपन। मात्रशक्ति ने समूची दुनिया को बता दिया था, कि यदि वह ठान लें तो कुछ भी असंभव नहीं।

Wednesday, May 04, 2016

'जग्वाळ' से शुरू हुआ था सफर

uttarakhand
उत्‍तराखंडी फिल्‍मों का सफरनामा
4 मई का दिन उत्‍तराखंड के लिए एक खास दिन है। जब दुनिया में सिनेमा के अन्‍वेषण के करीब सौ साल बाद 1983 में पहली आंचलिक फीचर फिल्‍म 'जग्‍वाळ' प्रदर्शित हुई। यह इतिहास रचा नाट्य शिल्‍पी पाराशर गौड़ ने। तकनीकी कमियों के बावजूद पहली फिल्‍म के नाते 'जग्वाळ' को औसत रिस्‍पांस मिला। इसके बाद बिन्देश नौडियाल ने 1985 में 'कबि सुख कबि दु:ख' प्रदर्शित की।

Monday, May 02, 2016

पुष्‍कर की 'मशकबीन' पर 'लोक' की धुन

चेहरे पर हल्की सफ़ेद दाढ़ी... पहाड़ी व्‍यक्तित्व और शान को चरितार्थ करती हुई सुंदर सी मूछें... सिर पर गौरवान्वित महसूस कर देने वाली पहाड़ी टोपी... साधारण पहनावा और वेषभूषा... ये पहचान है, विगत 45 बरसों से मशकबीन के जरिये लोकसंस्कृति को संजोते, सहेजते पुष्कर लाल की। जो अकेले ही शादी ब्याह से लेकर, मेले, कौथिगों और धार्मिक अनुष्ठानों में अपनी ऊँगलियों के हुनर के जरिये पहाड़ की लोकसंस्कृति की विरासत को बचाए हुये हैं।

Sunday, May 01, 2016

मैं माधो सिंह का मलेथा हूँ­­­

maletha gaon uattarakhand
हुजूर!! मैं मलेथा हूँ, गढ़वाल के 52 गढ़ों के बीरों की बीरता के इतिहास की जीती जागती मिसाल। मैंने इतिहास को बनते और बदलते हुये देखा, गढ़वाल के बीर भड़ों की बीरता को देखा और अपनी माटी के लिए अपनों को ही मौन और बेजुबान होते भी देखा।