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Saturday, November 28, 2015

लोक स्‍वीकृत रचना बनती है लोकगीत

            लोकगीतों के संदर्भ में कहा जाता है, कि लोक जीवन से जुड़ी, लोक स्वीकृत गीत, कृति, रचना ही एक अवधि के बाद स्‍वयंमेव लोकगीत बन जाती है। जैसा कि बेडो पाको बारामासा’ ‘तू होली बीरा ऊंची डांड्यों मा क्योंकि वह लोक स्वीकार्य रहे हैं। इसी तरह पहाड़ में भी लिखित इतिहास से पूर्व और लगभग बीते तीन दशक पहले तक बादी-बादिणसामाजिक उतार-चढ़ावों, बदलावों, परम्पराओं इत्यादि पर पैनी नजर रखते थे, और इन्हीं को अपने अंदाज में सार्वजनिक तौर पर प्रस्तुत भी करते थे। इन्हें आशु कविभी माना जा सकता है।

Thursday, November 19, 2015

..और उम्‍मीद की रोशनी से भर गई जिंदगियां

तू जिन्दा है तो जिंदगी की जीत पर यकीन कर, अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला जमीन पर... दीपोत्सव दीवाली की शाम जब केदारघाटी के आकाश में वो आतिश पहुंची, तो साहित्‍यकार लोकेश नवानी सहसा ही माइक पर ये गीत गाने लगे। उनके भाव ने हमें जाने अनजाने में हमें यह यकीन दे दिया, कि 2 जुलाई 2013 को केदारनाथ आपदा के बाद प्रारंभ हुई हमारी (धाद की) आपदा प्रभावित छात्रों के पुनुरुत्थान के निमित्‍त यह यात्रा अपने संकल्प को पूरा कर पाने की राह में है। राहत कार्यों में जुटे हम लोगों को आपदा प्रभावित छात्रों की शिक्षा में सहयोग करने का ये विचार जिस बातचीत के दौरान आया, उसमें भी हम ये नहीं जानते थे कि ये यात्रा कितनी दूर तलक जा पायेगी, और ये परिस्थितिजन्य सम्बन्ध एक दिन हम सभी को एक गहरे दायित्वबोध से भर देगा।

Sunday, November 15, 2015

नई लोकभाषा का 'करतब' क्‍यों ?



       उत्तराखण्ड को एक नई भाषा की जरुरत की बात कई बार उठी। यह विचार कुछ वैसा ही है जैसे राज्य निर्माण के वक्त प्रदेश के पौराणिक व ऐतिहासिक नाम को ठेंगा दिखा,उत्तरांचल कर दिया गया था। देश में हर प्रांत की अपनी-अपनी भाषा है। इन्हीं भाषाओं की कई उपबोलियां भी हैं। तब भी गुजराती, मराठी, बांग्ला, डोगरी, तमिल, तेलगू, कन्नड, उड़िया, पंजाबी या अन्य ने खुद को समझाने के लिए या दुनिया के सामने खुद को परिभाषित करने के लिए किसी तीसरी भाषा अथवा बोली को ईजाद नहीं किया।

Friday, November 06, 2015

गैरसैंण राजधानी : जैंता इक दिन त आलु..


अगर ये सोच जा रहा हैं कि गैरसैंण में कुछ सरकारी कार्यालयों को खोल देने से. कुछ नई सड़कें बना दिये जाने से, कुछ क्लास टू अधिकारियों को मार जबरदस्ती गैरसैंण भेज देने से राजधानी के पक्षधर लोग चुप्पी साध लेंगे। शायद नहीं....। आज भावातिरेक में यह भी मान लेना कि उत्तराखण्ड में जनमत गैरसैंण के पक्ष में है। तो शायद यह भी अतिश्‍योक्ति से ज्यादा कुछ नहीं है। भाजपा ने जब राज्य की सीमायें हरिद्वार-उधमसिंहनगर तक बढ़ाई थीं तो तब ही अलग पहाड़ी राज्य का सपना बिखर गया था, और फिर परिसीमन ने तो मानो खूंन ही निचोड़ दिया। इसके बाद भी गैरसैंण की मांग जारी है। क्यों है न आश्‍चर्य....

Wednesday, November 04, 2015

झड़ने लगे हैं गांव


सूखे पत्तों की तरह झड़ने लगे हैं यहाँ के गाँव
उजड़ने लगी है मनुष्यों की एक अच्छी स्थापना
महामारी और बमबारी के बिना
मनुष्यों से रिक्‍त हो जाने के बाद
बचे रह जाएँगे यहाँ केवल
पेड़, पत्थर, पहाड़, नदियां
बदरी-केदार के वीरान रास्ते
अतीत की स्मृतियाँ
पूर्वजों की आत्माओं को भटकाने के लिए
भग्नावशेषों के थुपड़े