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Friday, September 18, 2015

नई सुबह की आस बंधाती है ‘सुबेरौ घाम’

फिल्म समीक्षा
    ‘महिला की पीठ पर टिका है पहाड़यह सच, हालिया रिलीज गढ़वाली फीचर फिल्मसुबेरौ घामकीगौराको देखकर जरुर समझ जाएगा। वह पेड़ों को बचाने वालीचिपकोआंदोलन की गौरा तो नहीं। मगर, शराब के प्रचलन से उजड़ते गांवों को देख माफिया के विरूद्धइंकलाबकी धाद (आवाज) लगाती गौरा जरुर है। फिल्म में गौरा के अलग-अलग शेडस् पहाड़ी महिलाओं को समझने और समझाने की निश्चित ही एक अच्छी कोशिश है। बचपन कीछुनकानिडर गौरा बनकर गांवों में सुबेरौ घाम (सुबह की धूप) की आस जगाती है। वह पहाड़ों केभितरखदबदाती स्थितियों पर भी सोये हुए मनों मेंचेताळारखती है।

हे मेरी गढ़भूमि