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Wednesday, December 23, 2015

देवतुल्य हैं ढोल दमौऊं



हाड़ी लोकवाद्य ढोल दमौऊं को देवतुल्य माना गया है। दुनिया का यही एकमात्र वाद्य है जिसमें देवताओं को भी अवतरित करने की शक्ति है। तांबे व पीतल से बने इस ढोल के दोनों छोर की पुड़ (मढ़ी हुई खाल) में दिन-रात के देवता सूर्य, चंद्रमा: डोर में गणेश भगवान के विराजित होने का उल्लेख पौराणिक संदर्भों में मिलता है। इसके साथ प्रयुक्त दमौऊ को काली के खप्पर के रूप में माना जाता है। इनके नाद स्वरों के वर्णन में शब्दकारों ने ढोलसागर रचा है, जिसमें ढोल-दमौऊ से गुंजित नादस्वरों व तालों को शब्दायित किया गया है।

Tuesday, December 22, 2015

किसे है सभ्‍य बने रहने की जरुरत


माने के साथ बदलते पहाड़ी संगीत के बहाने कई बार बहसें शुरू हुई। उनके अब तक भले ही पूरी तरह से फलितार्थ न निकले हों। मगर बहस समाज को निश्चित तौर पर चिंतन के लिए प्र‍ेरित करती है। यह आवश्यक भी है। दुनिया में दिखाने वाले तो ब्लू फिल्में भी परोस रहे हैं। लेकिन समझना तो समाज को है, कि सभ्य बने रहने की जरूरत किसको है। बाजारवाद में हर कोई बेचनेको उतावला है। मगर अच्छा-बुरा परखने की जिम्मेदारी तो हमारी है।

Wednesday, December 09, 2015

नई ऊर्जा, नई दिशा और नया आकाश


- धाद लोक वाद्य एवं लोककला संवर्धन स्वायत्त सहकारिता

तुंगनाथ मंदिर में नौबत बजाने वाले लोक-कलाकार मोलूदास के अंतिम क्षणों में हमें जो बात सबसे अधिक आहत कर गई थी, वो एक तरह की अघोषित सांस्कृतिक अश्‍पृश्‍यता थी। केवल 'कृपा' पर जीने की आदत ने उनके परिजनों और उन्‍हीं के समाज में मानवीय सम्‍मान की चाहत को भी कहीं गहरे दफना दिया था। ये सवाल उठा तो, मगर आगे नहीं बढ़ सका। यह भी एक कड़वा सच था कि बहुत फख्र से उन्‍हें लोक-कलाकार कहने वाला समाज मोलूदास को मानवीय संवेदनाओं के अनुसार भी विदाई देने में नाकाम दिखा।

Saturday, November 28, 2015

लोक स्‍वीकृत रचना बनती है लोकगीत

            लोकगीतों के संदर्भ में कहा जाता है, कि लोक जीवन से जुड़ी, लोक स्वीकृत गीत, कृति, रचना ही एक अवधि के बाद स्‍वयंमेव लोकगीत बन जाती है। जैसा कि बेडो पाको बारामासा’ ‘तू होली बीरा ऊंची डांड्यों मा क्योंकि वह लोक स्वीकार्य रहे हैं। इसी तरह पहाड़ में भी लिखित इतिहास से पूर्व और लगभग बीते तीन दशक पहले तक बादी-बादिणसामाजिक उतार-चढ़ावों, बदलावों, परम्पराओं इत्यादि पर पैनी नजर रखते थे, और इन्हीं को अपने अंदाज में सार्वजनिक तौर पर प्रस्तुत भी करते थे। इन्हें आशु कविभी माना जा सकता है।

Thursday, November 19, 2015

..और उम्‍मीद की रोशनी से भर गई जिंदगियां

तू जिन्दा है तो जिंदगी की जीत पर यकीन कर, अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला जमीन पर... दीपोत्सव दीवाली की शाम जब केदारघाटी के आकाश में वो आतिश पहुंची, तो साहित्‍यकार लोकेश नवानी सहसा ही माइक पर ये गीत गाने लगे। उनके भाव ने हमें जाने अनजाने में हमें यह यकीन दे दिया, कि 2 जुलाई 2013 को केदारनाथ आपदा के बाद प्रारंभ हुई हमारी (धाद की) आपदा प्रभावित छात्रों के पुनुरुत्थान के निमित्‍त यह यात्रा अपने संकल्प को पूरा कर पाने की राह में है। राहत कार्यों में जुटे हम लोगों को आपदा प्रभावित छात्रों की शिक्षा में सहयोग करने का ये विचार जिस बातचीत के दौरान आया, उसमें भी हम ये नहीं जानते थे कि ये यात्रा कितनी दूर तलक जा पायेगी, और ये परिस्थितिजन्य सम्बन्ध एक दिन हम सभी को एक गहरे दायित्वबोध से भर देगा।

Sunday, November 15, 2015

नई लोकभाषा का 'करतब' क्‍यों ?



       उत्तराखण्ड को एक नई भाषा की जरुरत की बात कई बार उठी। यह विचार कुछ वैसा ही है जैसे राज्य निर्माण के वक्त प्रदेश के पौराणिक व ऐतिहासिक नाम को ठेंगा दिखा,उत्तरांचल कर दिया गया था। देश में हर प्रांत की अपनी-अपनी भाषा है। इन्हीं भाषाओं की कई उपबोलियां भी हैं। तब भी गुजराती, मराठी, बांग्ला, डोगरी, तमिल, तेलगू, कन्नड, उड़िया, पंजाबी या अन्य ने खुद को समझाने के लिए या दुनिया के सामने खुद को परिभाषित करने के लिए किसी तीसरी भाषा अथवा बोली को ईजाद नहीं किया।

Friday, November 06, 2015

गैरसैंण राजधानी : जैंता इक दिन त आलु..


अगर ये सोच जा रहा हैं कि गैरसैंण में कुछ सरकारी कार्यालयों को खोल देने से. कुछ नई सड़कें बना दिये जाने से, कुछ क्लास टू अधिकारियों को मार जबरदस्ती गैरसैंण भेज देने से राजधानी के पक्षधर लोग चुप्पी साध लेंगे। शायद नहीं....। आज भावातिरेक में यह भी मान लेना कि उत्तराखण्ड में जनमत गैरसैंण के पक्ष में है। तो शायद यह भी अतिश्‍योक्ति से ज्यादा कुछ नहीं है। भाजपा ने जब राज्य की सीमायें हरिद्वार-उधमसिंहनगर तक बढ़ाई थीं तो तब ही अलग पहाड़ी राज्य का सपना बिखर गया था, और फिर परिसीमन ने तो मानो खूंन ही निचोड़ दिया। इसके बाद भी गैरसैंण की मांग जारी है। क्यों है न आश्‍चर्य....

Wednesday, November 04, 2015

झड़ने लगे हैं गांव


सूखे पत्तों की तरह झड़ने लगे हैं यहाँ के गाँव
उजड़ने लगी है मनुष्यों की एक अच्छी स्थापना
महामारी और बमबारी के बिना
मनुष्यों से रिक्‍त हो जाने के बाद
बचे रह जाएँगे यहाँ केवल
पेड़, पत्थर, पहाड़, नदियां
बदरी-केदार के वीरान रास्ते
अतीत की स्मृतियाँ
पूर्वजों की आत्माओं को भटकाने के लिए
भग्नावशेषों के थुपड़े

Wednesday, October 21, 2015

हे रावण


रावण
तुम अब तक जिंदा हो,
तुम्हें तो मार दिया गया था त्रेता में. ...
उसके बाद भी
सदियों से तुम्हें जलाते आ रहे हैं हम....
तब भी जिंदा हो...
रावण आखिर बताओ तो,
कब और कैसे मरोगे तुम. ...


सर्वाधिकार@धनेश कोठारी
08/09/2014

Saturday, October 17, 2015

जै दिन

जै दिन

जै दिन
मेरा गोरू
तेरि सग्वाड़यों, तेरि पुंगड़यों
उजाड़ खै जाला
जै दिन
झालू कि काखड़ी
चोरे जालि

Tuesday, October 06, 2015

जब प्रेम में जोगी बन गया एक राजा

राजुला-मालूशाही पहाड़ की सबसे प्रसिद्ध अमर प्रेम कहानी है। यह दो प्रेमियों के मिलन में आने वाले कष्‍टों, दो जातियों, दो देशों, दो अलग परिवेश में रहने वाले प्रेमियों का कथानक है। तब सामाजिक बंधनों में जकड़े समाज के सामने यह चुनौती भी थी। यहां एक तरफ बैराठ का संपन्‍न राजघराना रहा, वहीं दूसरी ओर एक साधारण व्‍यापारी परिवार। तब इन दो संस्कृतियों का मिलन आसान नहीं था। लेकिन एक प्रेमिका की चाह और प्रेमी के समर्पण ने प्रेम की ऐसी इबारत लिखी, जो तत्‍कालीन सामाजिक ढांचे को तोड़ते हुए नया इतिहास रच गई।

Monday, October 05, 2015

वुं मा बोली दे

गणेश खुगसाल 'गणी' गढ़वाली भाषा के लोकप्रिय और सशक्त कवि हैं। 'वुं मा बोली दे' उनकी प्रकाशित पहली काव्यकृति है। शीर्षक का अर्थ है उनसे कह देना। किस से कहना है और क्या कहना है, ये पाठक स्वयं तय करें। संग्रह की कविताएँ पहाड़ के गांव की माटी की सौंधी महक से लबरेज हैं। सांस्कृतिक क्षरण को प्रतिबिंबित करती ये कविताएँ, सोचने पर विवश करती हैं।

बकौल कवि वे वर्ष 1983-87 से कविता लिख रहे हैं, परन्तु उनका पहला काव्य संग्रह अब प्रकाशित हो रहा है।

Friday, September 18, 2015

नई सुबह की आस बंधाती है ‘सुबेरौ घाम’

फिल्म समीक्षा
    ‘महिला की पीठ पर टिका है पहाड़यह सच, हालिया रिलीज गढ़वाली फीचर फिल्मसुबेरौ घामकीगौराको देखकर जरुर समझ जाएगा। वह पेड़ों को बचाने वालीचिपकोआंदोलन की गौरा तो नहीं। मगर, शराब के प्रचलन से उजड़ते गांवों को देख माफिया के विरूद्धइंकलाबकी धाद (आवाज) लगाती गौरा जरुर है। फिल्म में गौरा के अलग-अलग शेडस् पहाड़ी महिलाओं को समझने और समझाने की निश्चित ही एक अच्छी कोशिश है। बचपन कीछुनकानिडर गौरा बनकर गांवों में सुबेरौ घाम (सुबह की धूप) की आस जगाती है। वह पहाड़ों केभितरखदबदाती स्थितियों पर भी सोये हुए मनों मेंचेताळारखती है।

हे मेरी गढ़भूमि


Thursday, August 13, 2015

ये जो निजाम है


ये जो निजाम है तुझको माफ़ कर देगा
खुद सोच क्या तू खुद को माफ़ कर देगा

बारिशों में भीग रहा क्यों इस कदर
यकीं है तुझे खुद को साफ कर देगा