Recent Post

Wednesday, January 25, 2012

विरोधाभास के बीच झूलती टीम अन्‍ना

    टीम अण्णा का दो दिन का उत्‍तराखण्ड दौरा विरोध, सवाल और शंकाओं से भरा रहा। टीम अण्णा ने हरिद्वार, देहरादून, हल्द्वानी और रूद्रपुर में सभाएं कर केन्द्र सरकार के लोकपाल बिल को कोसा। उत्‍तराखण्ड के लोकायुक्त विधेयक और मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खण्डूडी़ की खुद जमकर तारीफ की और लोगों से भी कराई। लगे हाथ कांग्रेस-भाजपा समेत सभी राजनीतिक दलों को भ्रष्ट करार दे दिया। टीम अण्णा ने केन्द्र के लोकपाल बिल की कमजोरियों और उत्‍तराखण्ड के लोकायुक्त विधेयक की खूबियों को लेकर उठे सवालों का जवाब देना गैर जरूरी समझा। उत्‍तराखण्ड के लोकायुक्त विधेयक की खुली हिमायत की वजह जानने की जुर्रत करने वालों का मुंह बन्द कर बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। गोकि सवाल करना सिर्फ टीम अण्णा का ही विशेषाधिकार हो। पूरे दौरे के दौरान केन्द्र के लोकपाल और उत्‍तराखण्ड के लोकायुक्त विधेयक को लेकर उठे सवालों से कन्नी काटती टीम अण्णा खुद विरोधाभासों में फॅसी नजर आई।

पहाड़ की जनता के साथ धोखा कर रहे हैं बीसी खडूड़ी


उत्तराखंड की बीजेपी सरकार को.. खंडूड़ी है जरूरी... का एक चुनावी नारा क्या मिला कि उसने इस पहाड़ी राज्य के जनहित के मुद्दों को ही जमीन में दफना दिया है. आज जहाँ पहाड़ी क्षेत्र में रहने वाली 60 प्रतिशत महिलायें खून की कमी के जूझ रही हों तथा 72 प्रतिशत महिलायें बिना इलाज के किसी न किसी बीमारी को ढोने को मजबूर हों, वहां करोड़ों रुपये के घोटाले हो जाने के बाबजूद मुख्यमंत्री खंडूड़ी ने उन पर एक जांच बैठानी भी जरूरी नहीं समझी. खंडूरी है जरूरी.. इसलिए उनसे कुछ सवाल करने जरूरी हैं.. खंडूड़ी जी ने मुख्यमंत्री काल के दौरान पूरे पहाड़ में घूम-घूमकर निशंक पर प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से भ्रष्टाचार के आरोप लगाए लगाए.. तथा इन आरोपों के समर्थन में बीजेपी हाई कमान से लेकर आरएसएस नेताओं तक अपनी बात पहुंचाई. खंडूड़ी द्वारा पेश सुबूतों के आधार पर दिल्ली के नेताओं को अपने चहेते निशंक की बलि देनी पड़ी.
राज्य की जनता को उम्मीद थी कि मुख्यमंत्री की कुर्सी मिलते ही खंडूड़ी, भ्रष्ट लोगों को सलाखों के पीछे पंहुचाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगें. पर कुर्सी मिलते ही खंडूड़ी ने एक रहस्यमय छुपी साध ली.. अब खंडूड़ी से एक सवाल पूछना लाजिमी है कि जिस निशंक को वे भ्रष्ट बताते थे उनके बारे में कुर्सी मिलते ही उन्होंने मौन क्यों साध लिया? इसका मतलब या तो या तो निशंक ईमानदार थे और खंडूड़ी ने हाई कमान को गुमराह कर उनकी बलि ली और या फिर उनका सारा खेल कुर्सी तक ही सीमित था. कम से कम उन्हें एक जांच तो बैठानी ही चाहिए थी. वैसे वे कांग्रेस राज के 56 घोटालों की जांच बैठाकर फ्लॉप हो चुके हैं, जिसकी जांच पर लाखों रुपये खर्च होने के बाबजूद पांच साल बाद भी कुछ नहीं निकल पाया. खंडूड़ी जैसे फ़ौजी अफसर पर मुझे भी आम उत्तराखंडी की तरह गर्व है और वहां की जनता ने उन्हें फ़ौज से सेवानिवृति के बाद उम्मीद से ज्यादा दिया है.. अब उनकी बारी थी जो वे नहीं दे पा रहे हैं.
दस साल में उत्तराखंड के पहाड़ों से पलायन बढ़ा है.... दुःख की बात है कि अभी तक पहाड़ों में बागवानी के लिए कोई ठोस रणनीति नहीं बनी है यहाँ तक कि किसानों के खेतों की मिट्टी की जांच की कोई व्यवस्था भी नहीं हो सकी है. महिलाओं के हेल्थ कार्ड की बात कोई नहीं करता. बेरोजगारी चरम पर है और दो हजार वेतन पर पहाड़ी लड़के शहरों में काम करने के लिए मजबूर हैं. वहां की जमीनों को औने पौने दामों पर दलाल लूट रहे हैं. जिसको रोकने की कोई व्यवस्था नहीं हो सकी है. खंडूड़ी जी के इर्द गिर्द भ्रष्ट नौकरशाही का कब्जा अब भी मौजूद है. और सबसे खतरनाक बात यह है कि पलायन के शिकार पहाड़ का युवा ही नहीं खुद खंडूड़ी व निशंक जैसे बड़े नेता भी हुए हैं और दोनों ने कठिन पहाड़ी क्षेत्र के बजाय कोटद्वार तथा डोईवाला जैसे मैदानी क्षेत्र को चुना. उन्हें अपने गिरेवान में झाँक कर देखना होगा कि क्या वे सच्चे अर्थ में पहाड़ की सेवा करना चाहते हैं या फिर पहाड़ की राजनीति करना चाहते है..   
लेखक विजेंद्र रावत उत्‍तराखंड के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.
Published on Tuesday, 24 January 2012 20:50
Written by विजेंद्र रावत

Monday, January 23, 2012

मध्य हिमालयी भाषा का तुलनात्मक अध्ययन


मध्य हिमालयी कुमाउंनी, गढ़वाली एवं नेपाली भाषा-व्याकरण का तुलनात्मक अध्ययन भाग -6 
(गढ़वाली में सर्वनाम विधान)
इस लेखमाला का उद्देश्य मध्य हिमालयी कुमाउंनी, गढ़वाळी एवम नेपाली भाषाओँ के व्याकरण का शास्त्रीय पद्धति कृत अध्ययन नही है अपितु परदेश में बसे नेपालियों, कुमॉनियों व गढ़वालियों में अपनी भाषा के संरक्षण हेतु प्रेरित करना अधिक है. मैंने व्याकरण या व्याकरणीय शास्त्र का कक्षा बारहवीं तक को छोड़ कभी कोई औपचारिक शिक्षा ग्रहण नही की ना ही मेरा यह विषय/क्षेत्र रहा है. अत: यदि मेरे अध्ययन में शास्त्रीय त्रुटी मिले तो मुझे सूचित कर दीजियेगा जिससे मै उन त्रुटियों को समुचित ढंग से सुधार कर लूँगा. वास्तव में मैंने इस लेखमाला को अंग्रेजी में शुरू किया था किन्तु फिर अधिसंख्य पाठकों की दृष्टि से मुझे हिंदी में ही इस लेखमाला को लिखने का निश्चय करना पड़ा . आशा है यह लघु कदम मेरे उद्देश्य पूर्ति हेतु एक पहल माना जायेगा. मध्य हिमालय की सभी भाषाएँ ध्वन्यात्म्क हैं और कम्प्यूटर में प्रत्येक भाषा की विशिष्ठ लिपि न होने से कहीं कहीं सही अक्षर लिखने की दिक्कत अवश्य आती है

मध्य हिमालयी कुमाउंनी , गढ़वाली एवं नेपाली भाषा-व्याकरण का तुलनात्मक अध्ययन भाग -5

 इस लेखमाला का उद्देश्य मध्य हिमालयी कुमाउंनी, गढ़वाळी एवम नेपाली भाषाओँ के व्याकरण का शास्त्रीय पद्धति कृत अध्ययन नही है अपितु परदेश में बसे नेपालियों, कुमॉनियों व गढ़वालियों में अपनी भाषा के संरक्षण हेतु प्रेरित करना अधिक है. मैंने व्याकरण या व्याकरणीय शास्त्र का कक्षा बारहवीं तक को छोड़ कभी कोई औपचारिक शिक्षा ग्रहण नही की ना ही मेरा यह विषय/क्षेत्र रहा है. अत: यदि मेरे अध्ययन में शास्त्रीय त्रुटी मिले तो मुझे सूचित कर दीजियेगा जिससे मै उन त्रुटियों को समुचित ढंग से सुधार कर लूँगा. वास्तव में मैंने इस लेखमाला को अंग्रेजी में शुरू किया था किन्तु फिर अधिसंख्य पाठकों की दृष्टि से मुझे हिंदी में ही इस लेखमाला को लिखने का निश्चय करना पड़ा . आशा है यह लघु कदम मेरे उद्देश्य पूर्ति हेतु एक पहल माना जायेगा. मध्य हिमालय की सभी भाषाएँ ध्वन्यात्म्क हैं

मध्य हिमालयी कुमाउंनी , गढ़वाली एवं नेपाली भाषा-व्याकरण का तुलनात्मक अध्ययन भाग -4

(इस लेखमाला का उद्देश्य मध्य हिमालयी कुमाउंनी, गढ़वाळी एवम नेपाली भाषाओँ के व्याकरण का शास्त्रीय पद्धति कृत अध्ययन नही है अपितु परदेश में बसे नेपालियों, कुमॉनियों व गढ़वालियों में अपनी भाषा के संरक्षण हेतु प्रेरित करना अधिक है. मैंने व्याकरण या व्याकरणीय शास्त्र का कक्षा बारहवीं तक को छोड़ कभी कोई औपचारिक शिक्षा ग्रहण नही की ना ही मेरा यह विषय/क्षेत्र रहा है. अत: यदि मेरे अध्ययन में शास्त्रीय त्रुटी मिले तो मुझे सूचित कर दीजियेगा जिससे मै उन त्रुटियों को समुचित ढंग से सुधार कर लूँगा. वास्तव में मैंने इस लेखमाला को अंग्रेजी में शुरू किया था किन्तु फिर अधिसंख्य पाठकों की दृष्टि से मुझे हिंदी में ही इस लेखमाला को लिखने का निश्चय करना पड़ा . आशा है यह लघु कदम मेरे उद्देश्य पूर्ति हेतु एक पहल माना जायेगा. मध्य हिमालय की सभी भाषाएँ ध्वन्यात्म्क हैं और कम्प्यूटर में प्रत्येक भाषा की विशिष्ठ लिपि न होने से कहीं कहीं सही अक्षर लिखने की दिक्कत अवश्य आती है किन्तु हम कुमाउंनी , गढवालियों व नेपालियों को इस परेशानी को दूसरे ढंग से सुलझानी होगी ना की फोकट की विद्वतापूर्ण बात कर नई लिपि बनाने पर फोकटिया बहस करनी चाहिए. ---- भीष्म कुकरेती )
                                                                                                                                                                 
 नेपाली भाषा में संज्ञां विधान
                  
नेपाली में भी गढ़वाली, कुमाउंनी भाषाओँ की तरह ही संज्ञा बोध होता है . नेपाली में भी स्थान, व्यक्ति या दशा के नाम की अभिव्यक्ति को संज्ञा कहते हैं .

नेपाली संज्ञा प्रकार

नेपाली में संज्ञाएँ तीन तरह की होती हैं
व्यक्ति वाचक संज्ञाएँ :

किसी व्यक्ति, स्थान के विशेष नाम को व्यक्तिवाचक संज्ञा कहते हैं . जैसे
काठमांडु , जंग बहदुर सिंग , आदि

सामान्य वाचक संज्ञाएँ :
नेपाली व्याकरण विशेषग्य पराजुली के अनुसार जो संज्ञा ना तो व्यक्तिवाचक हो और ना ही भाव वाचक संज्ञा हो उसे सामान्य वाचक संज्ञा कहते हैं जैसे

कलम, घर फूल , मनिस (मनुष्य) आदि
भाववाचक संज्ञा :
भाव वाचक संज्ञाएँ किसी गुण, दशा या कृत्तव का नाम बताती हैं. जैसे

दया, केटोपन, भनाई, चाकरी, अग्लाई, नीलोपन आदि
नेपाली में भाव वाचक संज्ञा बनाने के सिद्धांत

१- जातिवाचक संज्ञा से भाव वाचक संज्ञा बनाने का विधान
जातिवाचक संज्ञा ----------------------------------------भाव वाचक संज्ञा

केटो (बच्चा , लडका ) ------------------------------------केटोपन ( बचपन,लड़कपन )
चाकर ------------------------------------------------------चाकरी

चोर --------------------------------------------------------चोरी
२- मूल क्रिया से भाव वाचक संज्ञा बनाने का विधान

मूल क्रिया -----------------------------------------------भाव वाचक संज्ञा
पढ़-------------------------------------------------------पढे (ढ पर ऐ की मात्रा ) (पढ़ाई )

भन (कहना )-------------------------------------------भनाऊ (कथन )
हांस-----------------------------------------------------हाँसाई ( हंसी )
- विशेषणों से भाववाचक संज्ञा बनाने के नियम
विशेषण -----------------------------------------------भाव वाचक संज्ञा

नौलो-----------------------------------------------------नौलोपन (नयापन)
रातो ----------------------------------------------------रातोपन (ललाई )

अग्लो -------------------------------------------------अग्लाई (उंचाई )
नेपाली भाषा में लिंग विधान

नेपाली व्याकरणाचार्यों जैसे पराजुली के मतानुसार नेपाली में चार प्रकार के लिंग पाए जाते हैं.


१- पुल्लिंग

२- स्त्रीलिंग
३- नपुसंक लिंग ; अप्रानी वाचक पदार्थ, भाव, विचार नपुंसक लिंग में आते हैं यथा:
घर, पुस्तक, रुख, विचार आदि
कवि, कीरा (कीड़ा) , चरा (चिड़िया) , देवता आदि
३- सामान्य लिंग : जिस किसी में दोनों लिंगों की संभावनाएं होती है . यथा
जब कि व्याकरण शास्त्री जय राज आचार्य मानते हैं कि दो ही लिंग होते हैं .

जय आचार्य के अनुसार संज्ञा में लिंग क्रिया अनुसार अभिव्यक्त होता है णा कि संज्ञा से , जैसे
शारदा जान्छा (शारदा जाता है )

शारदा जान्छे (शारदा जाती है )
दुर्गा गयो (दुर्गा गया )
दुर्गा गई (दुर्गा गई)

१- शब्द से पहले लिंग सूचक शब्द जोड़ने से
पुल्लिंग ---------------------------------------स्त्रीलिंग

लोग्ने मान्छे---------------------------------स्वास्नी मान्छे
पुरुष देवता ----------------------------------स्त्री देवता

भाले कमिला-------------------------------पोथी कमिला (चींटी )
२- आनी, इनी, इ, एनी प्रत्यय लगाकर पुल्लिंग से स्त्रीलिंग बदलना

पुल्लिंग ---------------------------------------स्त्रीलिंग
ऊँट --------------------------------------------ऊंटनी
कुकुर -----------------------------------------कुकुर्नी (कुत्ती )

घर्ती-----------------------------------------घर्तीनि
डाक्टर --------------------------------------डाक्टरनी

३- नेपाली के पृथक पृथक पुल्लिंग व स्त्रीलिंग शब्द
नेपाली में भी अन्य भाषाओँ कि तरह पृथक पुल्लिंग शब्द व पृथक स्त्रीलिंग का विधान मिलता है

पुल्लिंग ---------------------------------------स्त्रीलिंग
बुवा (पिता) ----------------------------------आमा (मां )
दाजू (भाई)-----------------------------------बहिनी (बहिन)

सांढे गोरु (बैल) -----------------------------------गाई (गाय)
नेपाली में वचन विधान

नेपाली में गढ़वाली व कुमाउंनी भाषाओँ के बनिस्पत वचन विधान सरल है
१- हरु प्रत्यय जोड़ कर बहुवचन बनना :

संज्ञा के अंत में हरु जोड़ने से संज्ञा बहुवचन हो जात है , जैसे
एकवचन ---------------------------------------बहुवचन

राजा -------------------------------------------राजाहरू
मान्छे (एक व्यक्ति ) ------------------------- मान्छेहरु (कई व्यक्ति )

किताब -----------------------------------------किताबहरु
देस ----------------------------------------------देसहरू
२- सूचनार्थ शब्दों से वचन सूचना

यो एवम त्यो 'यी' और 'ती' में बदल जाते हैं
एकवचन ---------------------------------------बहुवचन
यो मान्छे ---------------------------------------यी मान्छेहरु

३- संख्या को संज्ञा से पहले लगाने से वचन बादल जाता है
एकवचन ---------------------------------------बहुवचन

एक दिन ----------------------------------------दुई दिन , पांच दिन
४- कुछ संज्ञाओं में संज्ञा शब्द (जो जाती वाचक संज्ञाएँ बहुत सा, बहुत से बिबोधित हो पाती हैं ) से पहले धेरै लगाने से भी एकवचन बहुवचन बन जाता है

एकवचन ---------------------------------------बहुवचन
किताब ----------------------------------------धेरै किताब
यद्यपि धेरै किताबहरु भी प्रयोग किया जाता है

५- कारक को शब्द बहुवचन में का में बदल जाता है
एकवचन ---------------------------------------बहुवचन
नेवार को मान्छे -----------------------------नेवार का मान्छेहरु (नेवार के (कई) मनुष्य )

छोरा को किताब -----------------------------छोरा का किताबहरु (पुत्र की किताबें )


संदर्भ् :
१- अबोध बंधु बहुगुणा , १९६० , गढ़वाली व्याकरण की रूप रेखा, गढ़वाल साहित्य मंडल , दिल्ली
२- बाल कृष्ण बाल , स्ट्रक्चर ऑफ़ नेपाली ग्रैमर , मदन पुरूस्कार, पुस्तकालय , नेपाल

३- भवानी दत्त उप्रेती , १९७६, कुमाउंनी भाषा अध्ययन, कुमाउंनी समिति, इलाहाबाद
४- रजनी कुकरेती, २०१०, गढ़वाली भाषा का व्याकरण, विनसर पब्लिशिंग कं. देहरादून

५- कन्हयालाल डंड़रियाल , गढ़वाली शब्दकोश, २०११-२०१२ , शैलवाणी साप्ताहिक, कोटद्वार, में लम्बी लेखमाला
६- अरविन्द पुरोहित , बीना बेंजवाल , २००७, गढ़वाली -हिंदी शब्दकोश , विनसर प्रकाशन, देहरादून

७- श्री एम्'एस. मेहता (मेरा पहाड़ ) से बातचीत
८- श्रीमती हीरा देवी नयाल (पालूड़ी, बेलधार , अल्मोड़ा) , मुंबई से कुमाउंनी शब्दों के बारे में बातचीत

९- श्रीमती शकुंतला देवी , अछ्ब, पन्द्र-बीस क्षेत्र, , नेपाल, नेपाली भाषा सम्बन्धित पूछताछ
१० - भूपति ढकाल , १९८७ , नेपाली व्याकरण को संक्षिप्त दिग्दर्शन , रत्न पुस्तक , भण्डार, नेपाल

११- कृष्ण प्रसाद पराजुली , १९८४, राम्रो रचना , मीठो नेपाली, सहयोगी प्रेस, नेपाल

( Comparative Study of Grammar of Kumauni, Garhwali and Nepali, Mid Himalayan Languages-Part-4 )

@ मध्य हिमालयी भाषा संरक्षण समिति


सम्पादन : भीष्म कुकरेती

Wednesday, January 18, 2012

मध्य हिमालयी कुमाउंनी , गढ़वाली एवं नेपाली भाषा-व्याकरण तुलनात्मक अध्ययन


(इस लेखमाला का उद्देश्य मध्य हिमालयी कुमाउंनी, गढ़वाळी एवम नेपाली भाषाओँ के व्याकरण का शास्त्रीय पद्धति कृत अध्ययन नही है अपितु परदेश में बसे नेपालियों, कुमॉनियों व गढ़वालियों में अपनी भाषा के संरक्षण हेतु प्रेरित करना अधिक है. मैंने व्याकरण या व्याकरणीय शास्त्र का कक्षा बारहवीं तक को छोड़ कभी कोई औपचारिक शिक्षा ग्रहण नही की ना ही मेरा यह विषय/क्षेत्र रहा है. अत: यदि मेरे अध्ययन में शास्त्रीय त्रुटी मिले तो मुझे सूचित कर दीजियेगा जिससे मै उन त्रुटियों को समुचित ढंग से सुधार कर लूँगा. वास्तव में मैंने इस लेखमाला को अंग्रेजी में शुरू किया था किन्तु फिर अधिसंख्य पाठकों की दृष्टि से मुझे हिंदी में ही इस लेखमाला को लिखने का निश्चय करना पड़ा . आशा है यह लघु कदम मेरे उद्देश्य पूर्ति हेतु एक पहल माना जायेगा. मध्य हिमालय की सभी भाषाएँ ध्वन्यात्म्क हैं और कम्प्यूटर में प्रत्येक भाषा की विशिष्ठ लिपि न होने से कहीं कहीं सही अक्षर लिखने की दिक्कत अवश्य आती है

Sunday, January 15, 2012

मध्य हिमालयी कुमाउनी , गढ़वाली एवं नेपाली भाषा-व्याकरण का तुलानाम्त्क अध्ययन



(इस लेखमाला का उद्देश्य मध्य हिमालयी कुमाउनी, गढ़वाळी एवम नेपाली भाषाओँ के व्याकरण का शास्त्रीय पद्धति कृत अध्ययन नही है अपितु परदेश में बसे नेपालियों, कुमॉनियों व गढ़वालियों में अपनी भाषा के संरक्षण हेतु प्रेरित करना अधिक है. मैंने व्याकरण या व्याकरणीय शास्त्र का कक्षा बारहवीं तक को छोड़ कभी कोई औपचारिक शिक्षा ग्रहण नही की ना ही मेरा यह विषय/क्षेत्र रहा है. अत: यदि मेरे अध्ययन में शास्त्रीय त्रुटी मिले तो मुझे सूचित कर दीजियेगा जिससे मै उन त्रुटियों को समुचित ढंग से सुधार कर लूँगा. वास्तव में मैंने इस लेखमाला को अंग्रेजी में शुरू किया था किन्तु फिर अधिसंख्य पाठकों की दृष्टि से मुझे हिंदी में ही इस लेखमाला को लिखने का निश्चय करना पड़ा . आशा है यह लघु कदम मेरे उद्देश्य पूर्ति हेतु एक पहल माना जायेगा. मध्य हिमालय की सभी भाषाएँ ध्वन्यात्म्क हैं और कम्प्यूटर में प्रत्येक भाषा की विशिष्ठ लिपि न होने से कहीं कहीं सही अक्षर लिखने की दिक्कत अवश्य आती है

Wednesday, January 11, 2012

छन्नी, छन्ना अर मट्यंळ


अच्काल श्याम ह्व़े ना अर दरेक/प्रत्येक टी.वी. चैनेलुं मा दिन भर की खबरूं छांच छुल़े जांद.क्वी चैनेल नाम दींदु हाई डिबेट, क्वी बुलद न्यूज़ हावर, क्वी कुछ. पण जन हम तैं बीडी -तमाखू ढब पड़ी जांद अर फिर तमाखू पीण बन्द नि होंद, उनि मी तैं टीवी चैनेलुं पोलिटिकल डिबेट दिखणो ढब बि पोड़ीगे. ब्याळी श्याम घरवाळी न ब्वाल, "पोलिटिकल डिबेट दिखण से बढिया तुम चै चिन्नी क प्याला धून्दा त मी कन्नी क्वी' 'कब जाएग ए साला 'के' सीरियल' दिखदु". मीन जबाब दे "अरे भै ! दिन मा जब मी त्यार अर अपण बांठो जुठ भांड धूंदो त तू 'कब तक बन्द होगा ए 'के' सीरियल' नि दिखदी छे की ना?" घरवाळी क बुलण छौ, "दिनु अर श्याम दें क 'के' सीरियल' मा भौत फरक हूंद. दिनक 'के' सीरियल लाइट ड्रामा होन्दन. जब की रातू 'के' सिरियलूं मा हाई इमोशनल ड्रामा होंद" म्यरो जबाब छौ, "हाँ !

Thursday, January 05, 2012

उफ ! ये बेशर्मी

 प्रदेश का लोकायुक्त कानून भाजपा के मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खण्डूडी के गले की फाँस बनता जा रहा है। लोकायुक्त विधेयक बनाने और उसे विधानसभा में पारित करवाने के बाद प्रदेश सरकार और उसके मुखिया भुवन चन्द्र खण्डूड़ी ने इस बात का जोर-शोर से प्रचार किया कि अब राज्य का कोई भी नागरिक प्रदेश के मुख्यमंत्री, मंत्रियों और विधायकों के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायत लोकायुक्त से कर सकेगा और लोकायुक्त स्वतंत्र रूप से जाँच कर भ्रष्टाचार में लिप्त मुख्यमंत्री, मंत्री और विधायकों को सजा दे सकेंगे। लोकायुक्त विधेयक पर छीछालेदारी होने  लगी तो मुख्यमंत्री खण्डूड़ी को विधानसभा चुनाव का अपना ब्रह्मास्त्र हाथ से जाता दिखाई देने लगा तो उन्होंने मीडिया के माध्यम से लोकायुक्त विधेयक के प्रावधानों को लेकर झूठ बोलना शुरू कर दिया और विपक्ष पर यह तक आरोप लगा डाले कि वे लोग बिना विधेयक को पढ़े ही उसका विरोध कर रहे हैं। नई दिल्ली में 6 दिसम्बर 2011 को पत्रकारों से बातचीत में मुख्यमंत्री खण्डूड़ी ने यह तक कह डाला कि मुख्यमंत्री के विरुद्ध कार्रवाई के मामले में लोकायुक्त पूरी तरह से सक्षम, समर्थ और स्वतंत्र होगा। किसी मुख्यमंत्री के पक्षपात, मदद या बचाने का कोई प्रावधान विधेयक में नहीं है। मुख्यमंत्री, मंत्रियों तथा विधायकों के विरुद्ध लोकायुक्त की कार्रवाई में पीठ के सभी सदस्यों के सहमत होने, वोटिंग और सर्वसम्मति जैसी कोई शर्त कहीं नहीं रखी गई है। लोकायुक्त व पीठ की नियुक्तियाँ राष्ट्रीय स्तर पर साफ छवि वाले लोगों की सर्च कमेटी द्वारा की जाएगी। लोकायुक्त के अध्यक्ष और पीठ के सदस्यों की नियुक्ति में मुख्यमंत्री या प्रदेश सरकार की कोई भूमिका नहीं होगी।
यहीं पर लोकायुक्त विधेयक को लेकर मुख्यमंत्री खण्डूड़ी का झूठ सामने आता है। विधेयक के अध्याय छह धारा-18 में ‘उच्च कृत्यकारियों के विरुद्ध अन्वेषण और अभियोजन’ के अन्तर्गत स्पष्ट लिखा गया है कि मुख्यमंत्री, मंत्री परिषद के कोई अन्य सदस्य और उत्तराखण्ड विधानसभा के किसी सदस्य के विरुद्ध कोई अन्वेषण या अभियोजन लोकायुक्त के सभी सदस्यों की अध्यक्ष के साथ पीठ से अनुमति प्राप्त किए बिना प्रारम्भ नहीं की जायेगी।’ अब प्रावधान का अर्थ लोकायुक्त के अध्यक्ष और पूरी पीठ के सर्व सम्मत होने से नहीं है तो और क्या है। मुख्यमंत्री जी? लगता है आपने ही अपने लोकायुक्त विधेयक को ठीक से नहीं पढ़ा है। आपने केवल इतना ही पढ़ा है कि लोकायुक्त विधेयक के दायरे में मुख्यमंत्री और विधायकों को भी शामिल कर लिया गया है। अन्यथा आप विधेयक की कमजोरियाँ गिनाने वालों को यह नहीं कहते कि उन्होंने विधेयक नहीं पढ़ा है।
विधेयक के बारे में मुख्यमंत्री ने एक और झूठ बोला है कि लोकायुक्त और पीठ के सदस्यों की नियुक्ति में मुख्यमंत्री और राज्य सरकार की कोई भूमिका किसी भी रूप में नहीं होगी, जबकि विधेयक के धारा-4 अध्याय-2 में ‘लोकायुक्त की स्थापना’ में धारा 4 (6) में स्पष्ट लिखा गया है कि लोकायुक्त के अध्यक्ष और सदस्य की नियुक्ति चयन समिति की संस्तुति पर राज्यपाल द्वारा की जाएगी। धारा-4 (9-एक) में स्पष्ट लिखा गया है कि उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री चयन समिति का अध्यक्ष होगा और नेता प्रतिपक्ष सहित 6 सदस्य होंगे। अन्य पाँच सदस्यों में दो उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय के दो न्यायाधीश, एक पूर्व लोकायुक्त और दो सर्वोच्च न्यायालय और दूसरी संस्थाओं से चुने जाएँगे। इस तरह देखें तो चयन समिति के बाकी 5 सदस्यों का चुनाव भी प्रदेश सरकार ही करेगी। और जब पूरी चयन समिति के निर्धारण में प्रदेश के मुख्यमंत्री की महत्वपूर्ण भूमिका है तो लोकायुक्त के चयन में कैसे राजनीति नहीं होगी? ऐसा लोकायुक्त कैसे मुख्यमत्री, मंत्री और विधायकों के खिलाफ कारगर कार्यवाही कर पाएगा जो पूरी तरह से राजनैतिक लाभ-हानि को देखकर चुना गया हो? खण्डूड़ी जी! अब जब कानून में कमियाँ हैं तो उसे स्वीकार करने में कोई हर्ज है क्या?
लेखक जगमोहन रौतेला उत्तराखण्ड के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

Category: यूपी-यूके इलेक्शन 2012
Published on Thursday, 05 January 2012 16:43
Written by जगमोहन रौतेला
 साभार;   http://bhadas4media.com/vividh/1621-2012-01-05-07-43-07.html

Sunday, January 01, 2012

तबादला उद्योग


तबादला उद्योग उद्योग बि उनि उद्योग च जन हौर कंसल्टिंग उद्योग होंदन.
जी! हाँ पैल दलाल/बिचौलिया जौंकू बोल्दा छा ऊन अब अपण बिजनेस्सौ नाम बदली दे जन विदेशों मा काल़ो धन भिजण वाळ अर विदेस बिटेन बगैर एक्साइज भर्याँ सामान ल़ाण वाळ अब खुलेआम गबरमेंट अप्प्रूबड मनी ट्रांस्फ्रिंग अजेंसिज अर एक्सपोर्टर-इम्पोर्टर ह्व़ेगेन. वैश्याओं क दलाल अब अफुं तैं रांडों दल्ला नि बुल्दन बल्कण मा अफु तैं इवेंट मनेजमेंट कन्सल्टेंट, इंटरटेनमेंट कन्सल्टेंट या यंग मॉडल सप्लायर बुल्दन. पैल रांडू दल्ला कखी बि नि बोल्दु थौ वु क्य काम करदो अब य़ी दल्ला विजिटिंग कार्ड लेकी यंग मॉडल माने 'यंग माल' मतबल जवान रांड सप्लाई की बात खुलेआम दिन मा इ करदन. मनमोहन सिंग को रिफार्म इकोनोमी को इ कमाल च बल रांडू दल्ला अब यंग मॉडल सप्लायर ह्व़ेगेन. इन बि सुणेगे बल विदेसुं मा वैश्याऊँ तैं भिजण वाळ अफुं तैं कल्‍चरल एक्सचेंज एजेंसी का मालक या मैनेजर बुल्दन.