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Wednesday, January 26, 2011

रैबार

सम्मान

नगरपालिका परिषद ऋषिकेश

द्वारा साहित्य के लिए समर्पित

स्व. डा. पार्थ सारथि (डबराल) सम्मान

26 जनबरी 2011


Friday, January 21, 2011

गैरसैंण जनता खुणि चुसणा च

जब बिटेन उत्तराखंड अन्दोलनै पवाण लग अर राज्यौ राजधनी छ्वीं लगी होली त गैरसैंण कु इ नाम गणेंगे। गैरसैंण राजधानी त नि बौण सौक। पण, कथगों खुणि गैरसैंण भौत कुछ च। म्यार दिखण मा त हैंको जलम तक गैरसैंण सब्युं खुणि कुछ ना कुछ त रालों इ।
उत्तराखंड क्रान्ति दलौ (उक्रांद) कुण त गैरसैंण बिजणै दवा च, दारु च, इंजेक्सन च। गैरसैंण उक्रान्दौ आँख उफर्ने पाणि छींटा च, गैरसैंण उक्रान्दौ की निंद बर्र से बिजाळणे बान कंडाल़ो झुप्पा च, घच्का च। कत्ति त बुल्दन बल गैरसैंण आईसीयू च। ज्यूंद रौणे एकी दवा च। गैरसैंण नामै या दवा नि ह्वाऊ त उक्रांद कि कै दिन डंड़ोळी सजी जांदी। गैरसैंण उक्राँदै खुणि कृत्रिम सांसौ बान ऑक्सीजन च। दिवाकर भट्ट जन  नेता कुण गैरसैंण अपण दगड्या, अपण बोटरूं,  जनता, तै बेळमाणो ढोल च, दमौ च, मुसक्बाज च। दिवाकर भट्ट जन नेतौं कुण सब्युं तैं बेवकूफ बणाणो माध्यम च गैरसैंण।

न्युतो

दगड्यों!
पैथ्राक दस सालों बटि नामी-गिरामी चिट्ठी-पतरी(गढ़वळी पत्रिका) कि गढ़वळी भाषै बढ़ोत्तरी मा भौत बड़ी मिळवाक च। यीं पतड़ीन्‌ गढ़वळी साहित्य संबन्धी कथगा इ ख़ास सोळी(विशेषांक) छापिन्‌। जनकि लोकगीत, लोककथा, स्वांग(नाटक), अबोधबंधु बहुगुणा, कन्हैयालाल डंडरियाल, भजनसिंह ’सिंह’, नामी स्वांग लिखनेर(लिख्वार) ललितमोहन थपलियाळ पर खास सोळी (विशेषांक) उल्लेखनीय छन। पत्रिका कू एक हौर पीठ थप थप्यौण्या पर्‌यास गढ़वळी कविता पर खास सोळी च। जैं सोळी मा १२३ कवियुं कि १४३ कविता छपेन्‌। दगड़ मा एक भौत बड़ी किताब बि छप्याणि च जख मा सन १७०० से लेकी २०११ तक का हरेक कवि की कविता त छपेली ई दगड़ मा गढ़वळी कविता कू पुराण इतियास बि शामिल होलू।

Friday, January 14, 2011

गढवाल में मकरैण (मकर संक्रांति) और गेंद का मेला

गंगासलाण याने लंगूर, ढांगु, डबरालस्युं, उदयपुर, अजमेर में मकरसंक्रांति का कुछ अधिक ही महत्व है। सेख या पूस के मासांत के दिन इस क्षेत्र में दोपहर से पहले कई गाँव वाले मिलकर एक स्थान पर हिंगोड़ खेलते हैं। हिंगोड़ हॉकी जैसा खेल है। खेल में बांस कि हॉकी जैसी स्टिक होती है तो गेंद कपड़े कि होती है। मेले के स्थान पर मेला अपने आप उमड़ जाता है। क्योंकि सैकड़ो लोग इसमें भाग लेते हैं। शाम को हथगिंदी (चमड़े की) की क्षेत्रीय प्रतियोगिता होती है और यह हथगिंदी का खेल रात तक चलता है हथगिंदी कुछ-कुछ रग्बी जैसा होता है। पूर्व में हर पट्टी में दसेक जगह ऐसे मेले सेख के दिन होते थे। सेख की रात को लोग स्वाळ पकोड़ी बनाते हैं और इसी के साथ मकर संक्रांति की शुरुआत हो जाती है। मकर संक्रांति की सुबह भी स्वाळ पकोड़ी बनाये जाते हैं। दिन में खिचड़ी बनाई जाती है व तिल गुड़ भी खाया जाता है। इस दिन स्नान का भी महत्व है।

Wednesday, January 12, 2011

क्या नपुंसकों की फ़ौज गढ़वाली साहित्य रच रही है ?

जो जीवविज्ञान की थोड़ी बहुत जानकारी रखते हैं वे जानते हैं कि, जीव-जंतुओं में पुरुष कि भूमिका एकांस ही होती है, और वास्तव में पुरुष सभी बनस्पतियों, जानवरों व मनुष्यों में नपुंसक के निकटतम होता है। एक पुरुष व सोलह हजार स्त्रियों से मानव सभ्यता आगे बढ़ सकती है। किन्तु दस स्त्रियाँ व हजार पुरुष से मानव सभ्यता आगे नहीं बढ़ सकती है। पुरुष वास्तव में नपुंसक ही होता है, और यही कारण है कि, उसने अपनी नपुंसकता छुपाने हेतु अहम का सहारा लिया और देश, धर्म(पंथ), जातीय, रंगों, प्रान्त, जिला, भाषाई रेखाओं से मनुष्य को बाँट दिया है। यदि हम आधुनिक गढ़वाली साहित्य कि बात करें तो पायेंगे कि आधुनिक साहित्य गढ़वाली समाज को किंचित भी प्रभावित नहीं कर पाया है। गढ़वालियों को आधुनिक साहित्य की आवश्यकता ही नहीं पड़ रही है। तो इसका एक मुख्य करण साहित्यकार ही है। जो ऐसा साहित्य सर्जन ही नहीं कर पाया की गढ़वाल में बसने वाले और प्रवासी गढ़वाली उस साहित्य को पढने को मजबूर हो जाय। वास्तव में यदि हम मूल में जाएँ तो पाएंगे कि गढवाली साहित्य रचनाकारों ने पौरुषीय रचनायें पाठकों को दी और पौरुषीय रचना हमेशा ही नपुंसकता के निकट ही होती है। एक उदारहण ले लीजिये कि जब गढ़वाल में "ए ज्योरू मीन दिल्ली जाण" जैसा लोकगीत जनमानस में बैठ रहा था। तो हमारे गढ़वाली भाषा के साहित्यकार पलायन कि विभीषिका का रोना रो रहे थे। "ए ज्योरू मीन दिल्ली जाण" का रचनाकार स्त्री या शिल्पकार थे। जोकि जनमानस को समझते थे। किन्तु उस समय के गढवाली साहित्यकार उलटी गंगा बहा रहे थे।

स्व. कन्हैयालाल डंडरियाल जी को महाकवि का दर्जा दिया गया है। यदि उनके साहित्य को ठीक से पढ़ा जाय तो पाएंगे कि जिस साहित्य कि रचना उन्होंने स्त्रेन्य अंतर्मन से लिखा वह कालजयी है। किन्तु जो डंडरियाल जी ने पौरुषीय अंतर्मन से लिखा वह कालजय नहीं है। तुलसीदास, सूरदास को यदि सामान्य जन पढ़ता है या गुनता है तो उसका मुख्य कारण है कि उन्होंने स्त्रेन्य अंतर्मन से साहित्य रचा। बलदेव प्रसाद शर्मा ’दीन’ जी क़ी "रामी बौराणी" या जीतसिंह नेगी जी कि "तू होली बीरा" गीतों का आज लोकगीतों में सुमार होता है तो उसका एकमेव कारण है कि, ये गीत स्त्रेन्य अंतर्मन से लिखे गए हैं।

नरेन्द्र सिंह नेगी के वही गीत प्रसिद्ध हुए जिन्हें उन्होंने स्त्रेन्य अंतर्मन से रचा। जो भी गीत नेगी ने पौरुषीय अंतर्मन से रचे /गाये वे कम प्रसिद्ध हुए। उसका मुख्य कारण है कि, पौरुषीय अंतर्मन नपुन्सकीय ही होता है। जहाँ अभिमान आ जाता है वह पौरुषीय नहीं नपुंसकीय ही होता है। जहाँ गढ़वाल में "मैकू पाड़ नि दीण पिताजी" जैसे लोकगीत स्त्रियाँ या शिल्पकार रच रहे थे। वहीं हमारे साहित्यकार अहम के वशीभूत पहाड़ प्रेम आदि के गीत/कविता रच रहे थे। स्त्री अन्तर्मन से न रची जाने वाल़ी रचनायें जनमानस को उद्वेलित कर ही नहीं सकती हैं।

गढ़वाली में दसियों महिला साहित्यकार हुए हैं। किन्तु उन्होंने भी पौरुषीय अंतर्मन से गढ़वाली में रचनाये रचीं और वे भी गढ़वाली जनमानस को उद्वेलित कर पाने सर्वथा विफल रही हैं। मेरा मानना है कि जब तक आधुनिक गढ़वाली साहित्य लोक साहित्य को जनमानस से दूर करने में सफल नहीं होगा तब तक यह साहित्य पढ़ा ही नहीं जाएगा। इसके लिए रचनाकारों में स्त्री/ हरिजन/ शिल्पकार अंतर्मन होना आवश्यक है। न कि पौरुषीय अंतर्मन या नपुंसकीय अंतर्मन। स्त्रीय/ हरिजन/ शिल्पकार अंतर्मन जनमानस की सही भावनाओं को पहचानने में पूरा कामयाब होता है। किन्तु पौरुषीय अंतर्मन (जो कि वास्तव में नपुंसक ही होता है) जनमानस की भावनाओं को पहचानना तो दूर जन भावनाओं कि अवहेलना ही करता है।

जब कोई भी किसी भी प्रकार की रचना स्त्रेन्य अंतर्मन से रची जाय वह रचना पाठकों में ऊर्जा संप्रेषण करने में सफल होती है। वह रचना संभावनाओं को जन्म देती है। अतः गढ़वाली साहित्यकारों को चाहिए की अपनी स्त्रेन्य/ शिल्पकारी/ हरिजनी अंतर्मन की तलाश करें और उसी अंतर्मन से रचना रचें। हमारे गढ़वाली साहित्यकारों को ध्यान देना चाहिए कि सैकड़ों सालों से पंडित श्लोको से पूजा करते आये हैं और जनमानस इस साहित्य से किंचित भी प्रभावित नहीं हुआ। किन्तु शिल्पकारों/ हरिजनों/ दासों/ बादी/ ड़ळयों (जो बिट्ट नहीं थे) क़ी रचनाओं को जनमानस सहज ही अपनाता आया है। उसका एक ही कारण है, पंडिताई साहित्य पौरुषीय साहित्य है। किन्तु शिल्पकारों/ बादियों/ ड़लयों/ दासों का साहित्य स्त्रेन्य अंतर्मन से रचा गया है।

भीष्म कुकरेती

टिहरी बादशाहत का आखिरी दिन

      टिहरी आज भले ही अपने भूगोल के साथ उन तमाम किस्सों को भी जलमग्न कर समाधिस्थ हो चुकी है। जिनमें टिहरी रियासत की क्रुर सत्ता की दास्तानें भी शामिल थीं। जिनमें राजाको जिंदा रखने के लिए दमन की कई कहानियां बुनी और गढ़ी गई। वहीं जिंदादिल अवाम का जनसंघर्ष भी जिसने भारतीय आजादी के 148 दिन बाद ही बादशाहत को टिहरी से खदेड़ दिया था। इतिहास गवाह है भड़इसी माटी में जन्में थे।
टिहरी की आजादी के अतीत में 30 मई 1930 के दिन तिलाड़ी (बड़कोट) में वनों से जुड़े हकूकों को संघर्षरत हजारों किसानों पर राजा की गोलियां चली तो जलियांवाला बाग की यादें ताजा हो उठी। इसी वक्त टिहरी की मासूम जनता में तीखा आक्रोश फैला और राज्य में सत्याग्रही संघर्ष का अभ्युदय हुआ। जिसकी बदौलत जनतांत्रिक मूल्यों की नींव पर प्रजामण्डल की स्थापना हुई और पहला नेतृत्व जनसंघर्षों से जन्में युवा श्रीदेव सुमन को मिला। यह राजतंत्र के जुल्मों के खिलाफ समान्तर खड़े होने जैसा ही था। हालांकि, राजा की क्रूरता ने 25 जुलाई 1944 के दिन सुमन की जान ले ली थी। 84 दिनों की ऐतिहासिक भूख हड़तालके बाद क्रांतिकारी श्रीदेव सुमन बेड़ियोंसे हमेशा के लिए रिहा हो गये। जनसंघर्ष यहां भी न रुका। तब तक अवाम लोकशाही व राजशाही के फर्क को जान चुकी थी। फिर जुल्मों से जन्मीं जनक्रांति का झण्डा कामरेड नागेन्द्र सकलानी ने संभाला। यह नागेन्द्र और साथियों का ही मादा था कि, उन्होंने आखिरी सांसों तक 1200 साला हकूमत से टिहरी को रिहाई दिलाई।
सामन्ती जंक-जोड़ को पिघलाने वाले इस जांबाज का जन्म टिहरी की सकलाना पट्टी के पुजारगांव में हुआ था। 16 की उम्र में ही सामाजिक सरोकारों को समझने वाला नागेन्द्र सक्रिय साम्यवादी कार्यकर्ता बन चुका था। इसी बीच रियासत अकाल के दैवीय प्रकोप से गुजरी तो राजकोष को पोषित करने व आयस्रोतों की मजबूती के लिए भू-व्यवस्था एंव पुनरीक्षण के नाम पर जनता को ढेरों करों से लाद दिया गया। नागेन्द्र ने गांव-गांव अलख जगा आंदोलन को धार दी। इसी दौर में उनकी कार्यशैली व वैचारिकता के करीब एक और योद्धा दादा दौलतराम भी उनके हमकदम हुए। नतीजा, राजा का बंदोबस्त कानून क्रियान्वित नहीं हो सका।
राजशाही से क्षुब्ध लोगों ने सकलानी व दौलतराम की अगुवाई में लामगद्ध होकर कड़ाकोट (डांगचौरा) से बगावत का श्रीगणेश किया। और करों का भुगतान न करने का ऐलान कर डाला। किसानों व राजशाही फौज के बीच संघर्ष का दौर चला। नागेन्द्र को राजद्रोह में 12 साल की सजा सुनाई गई। जिसे ठुकरा सुमन के नक्शेकदम पर चलते हुए नागेन्द्र ने 10 फरवरी 1947 से आमरण अनशन शुरू किया। मजबूरन राजा को अनचाही हार स्वीकारते हुए सकलानी को साथियों सहित रिहा करना पड़ा। राजा जानता था कि सुमन के बाद सकलानी की शहादत अंजाम क्या हो सकता है। तभी जनता ने वनाधिकार कानून संशोधन, बराबेगार, पौंणटोंटी जैसी कराधान व्यवस्था को समाप्त करने की मांग की। मगर राजा ने इसे अनसुना कर दिया। इसी दौर में प्रजामण्डल को राज्य से मान्यता मिली। पहले अधिवेशन में कम्युनिस्टों के साथ अन्य वैचारिक धाराओं ने भी शिरकत की। यह अधिवेशन आजादी के मतवालों के लिए संजीवनी साबित हुआ।
सकलाना की जनता ने स्कूलों, सड़कों, चिकित्सालयों की मौलिक मांगों के साथ ही राजस्व अदायगी को भी रोक डाला। विद्रोह को दबाने के लिए विशेष जज के साथ फौज सकलाना पहुंची। यहां उत्पीड़न और घरों की नीलामी के साथ निर्दोंष जेलों में ठूंस जाने लगे। ऐसे में राजतंत्रीय दमन की ढाल को सत्याग्रहियों की भर्ती शुरू हुई। मुआफीदारों ने आजाद पंचायत की स्थापना की तो इसका असर कीर्तिनगर परगना तक हुआ। क्रांति के इस बढ़ते दौर में बडियार में भी आजाद पंचायत की स्थापना हुई।
10 जनवरी 1948 को कीर्तिनगर में बंधनों से मुक्ति को जनसैलाब उमड़ पड़ा। राजा के चंद सिपाहियों ने जनाक्रोश के भय से अपनी हिफाजत की एवज में बंदूकें जनता को सौंप दी। इसी बीच सत्याग्रहियों की जनसभा में कचहरी पर कब्जा करने का फैसला हुआ। पहले ही एक्शन में कचहरी पर तिरंगाफहराने लगा। खबर जैसे ही नरेन्द्रनगर पहुंची तो वहां से फौज के साथ मेजर जगदीश, पुलिस अधीक्षक लालता प्रसाद व स्पेशल मजिस्टेªट बलदेव सिंह 11 जनवरी को कीर्तिनगर पहुंचे। राज्य प्रशासन ने कचहरी को वापस हासिल करने की पुरजोर कोशिश की। लेकिन जनाक्रोश के चलते उन्हें मुंह की खानी पड़ी। फौज ने आंसू गैस के गोले फेंके तो भीड़ ने कचहरी को ही आग के हवाले कर दिया।
उधर, प्रजामण्डल ने राज्यकर्मियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर इन्हें पकड़ने का जिम्मा सत्याग्रहियों को सौंपा। हालातों को हदों से बाहर होता देख अधिकारी जंगल की तरफ भागने लगे। आंदोलनकारियों के साथ जब यह खबर नागेन्द्र को लगी तो उन्होंने साथी भोलू भरदारी के साथ पीछा करते हुए दो अधिकारियों को दबोच लिया। सकलानी बलदेव के सीने पर चढ़ गये। खतरा भांपकर मेजर जगदीश ने फायरिंग का आदेश दिया। जिसमें दो गोलियां नागेन्द्र व भरदारी को लगी, और इस जनसंघर्ष में दोनों क्रांतिकारियों शहीद हो गये। शहादत के गमगीन माहौल में राजतंत्र एक बार फिर हावी होता कि, तब ही पेशावर कांड के वीर योद्धा चन्द्रसिंह गढ़वाली ने नेतृत्व अपने हाथ में लिया था।
12 जनवरी 1948 के दिन शहीद नागेन्द्र सकलानी व भोलू भरदारी की पार्थिव देहों को लेकर आंदोलनकारी टिहरी रवाना हुए। अवाम ने पूरे रास्ते अमर बलिदानियों को भावपूर्ण श्रद्धांजलियां दी। 15 जनवरी को शहीद यात्रा के टिहरी पहुंचने से पहले ही वहां भारी आक्रोश फैल चुका था। जिससे डरकर राजा मय लश्कर नरेन्द्रनगर भाग खड़ा हुआ। ऐसे में सत्ता जनता के हाथों में आ चुकी थी। और फिर आखिरकार 1 अगस्त 1949 को टिहरी के इतिहास में वह भी दिन आ पहुंचा जब भारत सरकार ने उसे उत्तर प्रदेश में शामिल कर पृथक जिला बनाया। निश्चित ही नया राज्य ऐसे ही जनसंघर्षों का फलित है। जोकि एक बेहतर आदमी की सुनिश्चिताके बगैर आज भी अधूरी हैं।

Monday, January 10, 2011

संघर्ष की प्रतीक रही टिहरी की कुंजणी पट्टी

देवभूमि उत्तराखंड वीरों को जन्म देने वाली भूमि के नाम पर भी जानी जाती है। इसी राज्य में टिहरी जनपद की हेंवलघाटी के लोगों की खास पहचान इतिहास रहा है। इतिहास के पन्नों पर घाटी के लोगों की वीरता के किस्से कुछ इस तरह बयां हैं कि उन्होंने कभी अन्याय अत्याचार सहन नहीं किया और अपने अधिकारों संसाधनों की लड़ाई को लेकर हमेशा मुखर रहे।
राजशाही के खिलाफ विद्रोह जनता के हितों के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले अमर शहीद श्रीदेव सुमन का नाम आज हर किसी की जुबां पर है, लेकिन सचाई यह है कि हेंवलघाटी के लोग उनसे भी पहले टिहरी रियासत के खिलाफ बगावत का बिगुल बजा चुके थे। श्रीदेव सुमन से 30 वर्ष पूर्व तक हेंवलघाटी के नागणी के नीचे ऋषिकेश तक कुंजणी पट्टी कहलाती थी। वर्ष 1904 में टिहरी गढ़वाल रियासत में जंगलात कर्मचारियों का आतंक बेतहाशा बढ़ गया था। रियासत के अन्य इलाकों में जहां उनके अन्याय बढ़ते गए तो कुंजणी पट्टी के लोगों ने इसके खिलाफ आवाज बुलंद की। उनके इस अभियान को इतिहास में 'कुंजणी की ढंडक' के नाम से जाना जाता है। 
जुलाई 1904 में नरेन्द्रनगर के मौण, खत्याण के भैंस पालकों के डेरे थे। तब भैंसपालकों से पुच्छी वसूला जाता था। तत्कालीन कंजर्वेटर केशवानंद रतूड़ी समेत जंगलात के कर्मचारी मौके पर गए मौण, खत्याड़ के भैंसपालकों से मनमाने ढंग से पुच्छी मांगी। मना करने पर कर्मचारियों ने उनके दूध-दही के बर्तन फोड़ दिए। इस पर भैंसपालक भड़क गए। भैंसपालकों के मुखिया रणजोर सिंह ने कंजर्वेटर के गाल पर चाटे जड़ दिए। इस पर रणजोर उसके छह साथी गिरफ्तार कर लिए गए। रास्ते में फर्त गांव के भीम सिंह नेगी, जो उस समय मुल्की पंच प्रतिष्ठित व्यक्ति थे, ने कंजर्वेटर को रोका रणजोर को छोड़ने को कहा, लेकिन कंजर्वेटर नहीं माना। इस पर भीम सिंह ने बेमर गांव के अमर सिंह को बुलावा भेजा। अमर सिंह की गिनती तब क्षेत्र के दबंग लोगों में होती थी। अमर सिंह मौके पर पहुंचे, हालात की जानकारी ली और भैंसपालकों से विरोध करने को कहा। इस पर राणजोर सिंह सहित दूसरे लोगों ने हथकड़ियां पत्थर पर मारकर तोड़ दी। सबने मिलकर जंगलात के लोगों की धुनाई की और कंजर्वेटर को घोड़े से गिराकर कमरे में बंद कर दिया।  
इसके बाद अमर सिंह ने तमाम मुल्की पंचों को बुलाकर बैठक की, जिसमें कखील के ज्ञान सिंह, स्यूड़ के मान सिंह, आगर के नैन सिंह, कुड़ी के मान गोपाल सहित दर्जन भर लोग बुलाए गए। लोगों को इकट्ठा कर आगराखाल, हाडीसेरा, भैंस्यारौ, बादशाहीथौल में विशाल सभाएं की गई। उसके बाद लोग जुलूस लेकर टिहरी पहुंचे। पंचों ने ऐलान कर दिया था कि जो व्यक्ति और गांव इस ढंडक में शामिल नहीं होगा, उसे बिरादरी से अलग कर दिया जाएगा। कंजर्वेटर ने पंचों सहित दूसरे लोगों पर मारपीट सहित कई आरोप लगाए। राजमाता गुलेरिया के कहने पर कीर्तिशाह ने लोगों की मांगों पर गंभीरता से विचार किया तथा देवगिरी नामक साध्वी, जो क्षेत्र में वर्षो से रह रही थीं, के कहने पर लोगों को आरोपों से बरी कर दिया। इसके अलावा पुच्छीकर भी समाप्त कर दिया। लोगों की वन में चरान-चुगान खुला रखने की मांग भी मान ली गई। 
साभार 

Friday, January 07, 2011

वरिष्ट साहित्याकार श्री भीष्म कुकरेती का दगड़ वीरेंद्र पंवार कि छ्वीं-बत्थ

वीरेन्द्र पंवार : तुमारा दिखण मा अच्काल गढवाळी साहित्य कि हालात कनि च ?
भीष्म : मी माणदो गढवाळी साहित्य कु हाळ क्वी ख़ास भलु नि च। थ्वाड़ा कविता अर गीतुं बटें आश छ बि च। स्वांगूं बटें उम्मेद छै पण, जब स्वांग इ नि खिल्येणा छन त क्य बोले सक्यांद। बकै गद्य मा त जख्या भन्गलु जम्युं च। जु साहित्यऔ छपण तैं कैंड़ो/मानदंड मानिल्या त बोले सक्यांद बल कुछ होणु च। पण, साहित्य छपण से जादा हमथैं यू दिखण चयांद कि बंचनेरूं तैं गढवाळी साहित्य औ भूक कथगा च। कथगा बंचनेर गढवाळी साहित्य अर लिख्नदेरुं छ्वीं गौं गौळौं (समाज) मा लगाणा छन। कथगा बन्चनेर अपण गेड़ीन्‌ गढवाळी साहित्य थैं बरोबर खरीदणा छन? बंचनेरुं

Sunday, January 02, 2011

स्वागत सत्कार

नयि सदी नया बरस
तेरु स्वागत तेरु सत्कार

हमरा मुल्क कि
मोरी मा नारेंण
खोळी मा गणेश
चौंरौं कि शक्ति
द्यब्तौं कि भक्ति
कर्दी जग्वाळ्
तेरु त्यौहार

हमरि गाणि
बस्स इतगा स्याणि
पछाण कि च लपस्या
साक्यूं कि च तपस्या
हमरा बाग हमरा बग्वान
पसर्यूं बसंत
गुणमुणौंद भौंर सी
उलार्या बगच्छट बणिं
घड़ेक थौ बिसौ
हमरा गुठ्यार

ऐंसू धारि दे
हळ्या का कांद मा हौळ्
बळ्दुं दग्ड़ि
बारामासी टुटीं वीं कुल बटै
हमरि डोखरी पुंगड़्यों मा
लगैदे धाण कि पवांण
सेरा उखड़ उपजै नयिं नवांण
कर कुछ यन सुयार

औजि तैं पकड़ै लांकुड़
गौळा उंद डाळी दे ढोल
गुंजैदे डांडी कांठ्यों मा
पंडौं अर जैंति का बोल
अणसाळ् गड़्वै छुणक्याळी दाथुड़ी
बुंणि दे दाबला अर पैलुड़ी
अपणा ठक्करूं दिशा कि खातिर
मिली जैलि
त्वै बि ड्डवार

कुळैं देवदारुं बिटि छिर्की
पैटैदे पौन बणैक रैबार
वे मुल्क हपार
जखन बौडिक नि ऐनि
हमरा बैख
बैण्यों कि रखड़ी
ब्वै कु उलार

जग्वाळ् च
बादिण बौ का ठुमकौं थैं
अर पठाळ्यों का घार
हे चुचा
अब त बणिजा
हमरा ब्यौ कु मंगल्यार।

Source- Jyundal (A Collection of Garhwali Poems)
Copyright@ Dhanesh Kothari