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Wednesday, December 28, 2011

लोकसभा मा क्य काम-काज हूंद भै ?


(Garhwali Satire, Garhwal Humorous essays, Satire in Uttarakahndi Languages, Himalayan Languages Satire and Humour )
अच्काल पार्लियामेंट मा रोज इथगा हंगामा/घ्याळ होंद बल लोकसभा या राज्यसभा खुल्दा नीन अर दुसर दिनों बान मुल्तबी/ 'ऐडजौर्नड फॉर द डे' करे जान्दन. बस याँ से पारिलियामेंट सदस्य बिसरी गेन, भूलिगेन की लोकसभा या राज्यसभा मा काम काज क्य हूंद ? एम् पीयूँ तैं अब पता इ नी च बल लोक सभा या राज्य सभा सदस्यों मा क्वी कम बि होंद.
अब सी पर्स्या की त बात च. परसी मि अपुण एम्.पी (राज्य सभा सदस्य) दगड्या कु इख ग्यों बल मि बि ज़रा पार्लियामेंट देखूं अर उख क्य क्य होणु च वांको जायजा बि ल्हीयूँ. अब जन कि मेरो दगड्या बिना बातौ अहिंसक मनिख च

Tuesday, December 27, 2011

क्य मि बुढे गयों ?

फिर बि मै इन लगद मि बुढे गयों!
ना ना मि अबि बि दु दु सीढ़ी फळआंग लगैक चढदु. कुद्दी मारण मा अबि बि मिंडक में से जळदा छन.
फाळ मारण मा मि बांदरूं से कम नि छौं. काची मुंगरी मि अबि बि बुकै जान्दो अर रिक अपण नै साखी/न्यू जनिरेशन तैं बथान्दन बल काची मुंगरी कन बुकाण सिखणाइ त भीसम मांगन सीखो. कुखड़, मुर्गा हर समय खाण मा म्यार दगड क्या सकासौरी कारल धौं! बल्द जन बुसुड़ बिटेन भैर नि आण चांदो मि रुस्वड़ मा इ सेंदु जां से टैम कुटैम खाणो इ रौं. दंत ! बाघ का या कुत्ता का इन पैना दांत नि ह्वाल जन म्यार छन. इना गिच मा रान म्यार दान्तुं बीच मा आई ना कि रान को बुगचा बौणि जांद. अचकालौ जवान लौड़ उसयाँ खण/खाजा बि बुकावन त ऊँ तैं कचै, डीसेंटरी ह्व़े जांद. अर मि अबि बि अध्भड़यीं लुतकी, अध्काचू अंदड़-पिंदड़ पचै जांदू. म्यार अंदड़ अर जंदरौ पाट भै भुला लगदन. पण फिर बि मै इन लगद मि बुढे गयों!

Wednesday, December 14, 2011

गढवाली में गढवाली भाषा सम्बन्धी साहित्य

गढवाली में गढ़वाली भाषा, साहित्य सम्बन्धी लेख भी प्रचुर मात्र में मिलते हैं. इस विषय में कुछ मुख्य लेख इस प्रकार हैं-
गढवाली साहित्य की भूमिका पुस्तक : आचार्य गोपेश्वर कोठियाल के सम्पादकत्व में गढवाली साहित्य की भूमिका पुस्तक १९५४ में प्रकाशित हुई जो गढवाली भाषा साहित्य की जाँच पड़ताल की प्रथम पुस्तक है. इस पुस्तक में भगवती प्रसाद पांथरी, भगवती प्रसाद चंदोला, हरिदत्त भट्ट शैलेश, आचार्य गोपेश्वर कोठियाल, राधाकृष्ण शाश्त्री, श्यामचंद लाल नेगी, दामोदर थपलियाल के निबंध प्रकाशित हुए.
डा विनय डबराल के गढ़वाली साहित्यकार पुस्तक में रमाप्रसाद घिल्डियाल, श्यामचंद नेगी, चक्रधर बहुगुणा के भाषा सम्बन्धी लेखों का भी उल्लेख है.

Tuesday, December 13, 2011

भाषा संबंधी ऐतिहासिक वाद-विवाद के सार्थक सम्वाद


गढवाली भाषा में भाषा सम्बन्धी वाद-विवाद गढवाली भाषा हेतु विटामिन का काम करने वाले हैं.
जब भीष्म कुकरेती के 'गढ़ ऐना (मार्च १९९०), में 'गढवाली साहित्यकारुं तैं फ्यूचरेस्टिक साहित्य' लिखण चएंद' जैसे लेख प्रकाशित हुए तो अबोधबंधु बहुगुणा का प्रतिक्रिया सहित मौलिक लिखाण सम्बन्धी कतोळ-पतोळ' लेख गढ़ ऐना (अप्रैल १९९०) में प्रकाशित हुआ व यह सिलसिला लम्बा चला. भाषा सम्बन्धी कई सवाल भीष्म कुकरेती के लेख 'बौगुणा सवाल त उख्मी च' गढ़ ऐना मई १९९०), बहुगुणा के लेख 'खुत अर खपत' (गढ़ऐना, जूंन १९९० ), भीष्म कुकरेती का लेख 'बहुगुणाश्री ई त सियाँ छन' (गढ़ ऐना, १९९०) व 'बहुगुणाश्री बात या बि त च' व बहुगुणा का लेख 'गाड का हाल' (सभी गढ़ ऐना १९९०) गढवाली समालोचना इतिहास के मोती हैं. इस लेखों में गढवाली साहित्य के वर्तमान व भविष्य, गढवाली साहित्य में पाठकों के प्रति साहित्यकारों की जुमेवारियां, साहित्य में साहित्य वितरण की अहमियत, साहित्य कैसा हो जैसे ज्वलंत विषयों पर गहन विचार हुए.

Monday, December 12, 2011

मानकीकरण पर आलोचनात्मक लेख


मानकीकरण गढवाली भाषा हेतु एक चुनौतीपूर्ण कार्य है और मानकीकरण पर बहस होना लाजमी है. मानकीकरण के अतिरिक्त गढवाली में हिंदी का अन्वश्य्क प्रयोग भी अति चिंता का विषय रहा है जिस पर आज भी सार्थक बहस हो रहीं हैं.
रिकोर्ड या भीष्म कुकरेती की जानकारी अनुसार, गढवाली में मानकीकरण पर लेख भीष्म कुकरेती ने 'बीं बरोबर गढवाली' धाद १९८८, अबोधबंधु बहुगुणा का लेख 'भाषा मानकीकरण कि भूमिका' (धाद, जनवरी , १९८९ ) में छापे थे. जहां भीष्म कुकरेती ने लेखकों का ध्यान इस ओर खींचा कि गढवाली साहित्य गद्य में लेखक अनावश्यक रूप से हिंदी का प्रयोग कर रहे हैं. वहीं अबोधबंधु बहुगुणा ने भाषा मानकीकरण के भूमिका (धाद, १९८९) गढवाली म लेखकों द्वारा स्वमेव मानकीकरण पर जोर देने सम्बन्धित लेख है. तभी भीष्म कुकरेती के सम्वाद शैली में प्रयोगात्त्मक व्यंगात्मक लेख 'च छ थौ' (धाद, जलाई, १९९९, जो मानकीकरण पर चोट करता है)

वीरेन्द्र पंवार की गढवाली भाषा में समीक्षाएं


वीरेन्द्र पंवार गढवाली समालोचना का महान स्तम्भ है. पंवार के बिना गढवाली समालोचना के बारे में सोचा ही नहीं जा सकता है. पंवार ने अपनी एक शैली परिमार्जित की है जो गढवाली आलोचना को भाती भी है क्योंकि आम समालोचनात्मक मुहावरों के अतिरिक्त पंवार गढ़वाली मुहावरों को आलोचना में भी प्रयोग करने में दीक्षित हैं. वीरेंद्र पंवार की पुस्तक समीक्षा का संक्षिप्त ब्यौरा इस प्रकार है
आवाज- खबरसार (२००२)
लग्याँ छंवां - खबरसार (२००४)
दुन्‍या तरफ पीठ - खबरसार (२००५)
केर- खबसार (२००५)
घंगतोळ - खबरसार (२००८)

Sunday, December 11, 2011

गढवाली भाषा में पुस्तक समीक्षायें

ऐसा लगता है कि गढवाली भाषा की पुस्तकों की समीक्षा/समालोचना सं. १९८५ तक बिलकुल ही नही था, कारण गढवाली भाषा में पत्र-पत्रिकाओं का ना होना. यही कारण है कि अबोधबंधु बहुगुणा ने 'गाड म्यटेकि गंगा (१९७५) व डा अनिल डबराल ने 'गढवाली गद्य की परम्परा : इतिहास से आज तक' (२००७) में १९९० तक के गद्य इतिहास में दोनों विद्वानों ने समालोचना को कहीं भी स्थान नहीं दिया. इस लेख के लेखक ने धाद के सर्वेसर्वा लोकेश नवानी को भी सम्पर्क किया तो लोकेश ने कहा कि धाद प्रकाशन समय (१९९० तक) में भी गढवाली भाषा में पुस्तक समीक्षा का जन्म नहीं हुआ था. (सम्पर्क ४ दिसम्बर २०११, साँय १८.४२)

Saturday, December 10, 2011

पहाड़ के उजड़ते गाँव का सवाल विकास की चुनौतियाँ और संभावनाएं



उत्तराखंड की लगभग 70 प्रतिशत आबादी गाँव मैं निवास करती है 2011 की जनगणना के अनुसार हमारे देश मैं लगभग 6 लाख 41 हजार गाँव हैं उत्तराखंड मैं भी लगभग 16826 गाँव हैं लेकिन पहाड़ो का शायद ही कोई ऐसा गाँव होगा जिसमे 40 प्रतिशत से कम पलायन हुआ होगा पहाड़ के खासकर उत्तराखंड हिमालय मैं औपनिवेशिक काल से ही पलायन झेल रहे हैं इसलिए गाँव का कम से कम इतना उत्पादक होना जरुरी हैं की वहां के निवासी वहां रहकर अपना भरण पोषण करने के अलावा अपनी जरूरतें आराम से पूरी कर सकें लेकिन ज्यादातर पहाड़ अनुत्पादकता के संकट से जूझ रहे हैं जबकि कहा जाता है की पहाड़ (विशेषतः हिमालयी )संसाधनिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध हैं परन्तु विरोधाभास ये है की राज्य बनने के इतनी वर्षों बाद भी गाँव से पलायन नहीं रुका और यहाँ के गाँव की लगभग आधी आबादी रोजी-रोटी की तलाश मैं प्रवास कर रही है स्पष्ट है की गाँव का उत्पादन तंत्र कमजोर है अर्थशास्त्र की किताब मैं पहाड़ के गाँव का अर्थशास्त्र सदियों से एक जटिल चुनौती भरा और अनुत्तरित प्रश्न रहा है हम उसके बारे मैं सोच पाना तो दूर उसे लेकर घबराते रहे हैं और आज भी कमोबेश हमारी अर्थव्यवस्था लगभग सरकार आश्रित है.
आखिर पहाड़ के गाँव अनुत्पादक क्यूँ हैं दरअसल अभी तलक शासन के स्तर पर पहाड़ की संसधानिक संरचना तथा उत्पादन प्रवृति और बाजार की समझ एवं पहचान नहीं दिखाई पड़ती है जबकि पहाड़ों में आर्थिक संरचना के आधार की प्रवृति और क्षमता भिन्न है जिसे कभी पहाडो की दृष्टि से नहीं समझा गया. इसलिए पहाड़ों के विकास के उत्तर को खोजने के लिए पहाड़ों के आर्थिक /उत्पादन सिद्धांत को समझना होगा. दूसरी और यह विकास की नयी समझ और नए प्रयोगों का युग है, लेकिन पहाड़ो के विकास को लेकर नयी समझ का आभाव दिखता है इसलिए विकास की दृष्टि से आज भी गाँव हाशिये पर है पहाड़ के गाँव की उत्पादकता रोजगार सृजन और समृधि के सवाल आम आदमी से गहरे जुड़े हैं लेकिन ये आम आदमी के स्तर पर हल नहीं हो सकते क्यूंकि ये कहीं न कहीं राजनैतिक सवाल हैं और इसका जवाब भी राजनैतिक स्तर पर ही निहित है अतः हमने इस बार राज्य के प्रमुख राजनैतिक दलों के प्रतिनिधियों को इस सवाल पर अपना दृष्टिकोण रखने हेतु आमंत्रित किया है ताकि हम जान सकें की इस सवाल पर उनका विजन क्या है और उनके मेनिफेस्टो और अजेंडे मैं गाँव कहाँ पर है या वे गाँव के विकास को लेकर क्या सोचते है या गाँव के सवाल पर उनका उत्तर क्या है.
धरती का लगभग २७ प्रतिशत भाग पहाड़ों का है पहाड़ो के पास प्रकृति की संरचना के रूप में जहाँ एक और पारिस्थितिकी तंत्र,पर्यावरण संरचना, नदीतंत्र और ताजा पानी के स्रोत हैं तो दूसरी और मानव जीवन के रूप में उन पर बसे हुए अनेक समाज उनकी संस्कृतियाँ, परम्पराएं तथा भाषाओँ का धरातल है. दुनिया की लगभग 12 प्रतिशत आबादी पहाड़ों में निवास करती है और 22 प्रतिशत जनता पहाड़ों पर आश्रित है अधिकांश पहाड़ सदियों से गरीब लोगों के आवास रहे हैं आज दुनिया भर के पहाड़ों के सामने पर्यावरण पारिस्थितिकी के अलावा उत्पादक होने का संकट भी है इसलिए पहाड़ के लोगों के मन में अपने आर्थिक सवालों को लेकर हमेशा एक तड़प रही है ऐसे ही कुछ पहाड़ों की चिंताओं को लेकर विश्व खाद्य एवं कृषि संगठन ने 11 दिसम्बर 2002 को न्यूयोर्क में एक सम्मलेन आयोजित किया बाद में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रस्ताव संख्या 57/245 के द्वारा 2003 से इस दिन को विश्व पहाड़ दिवस मनाने की घोषणा की. इसका उद्देश्य दुनिया में पहाड़ों के स्थायी विकास तथा विश्व में पहाड़ों की भूमिका के प्रति जागरूकता के लिए कार्य करना है यूँ तो इस वर्ष पहाड़ दिवस की थीम भिन्न है लेकिन हमने अपनी मुख्य चिंता "पहाड़ के उजड़ते हुए गांवों का सवाल: विकास की चुनौतियाँ और उसकी संभावनाएं" विषय पर बहस आयोजित की है जिसमे निम्न वक्ताओं ने अपने विचार रखने हेतु सहमति दी है
द्वारा- धाद

रचना संग्रहों में भूमिका लेखन


पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित समीक्षा का जीवनकाल बहुत कम रहता है और फिर पत्र पत्रिकाओं के वितरण समस्या व रख रखाव के समस्या के कारण पत्र-पत्रिकाओं में छपी समीक्षाएं साहित्य इतिहासकारों के पास उपलब्ध नही होती हैं. अत: समीक्षा के इतिहास हेतु साहित्यिक इतिहासकारों को रचनाओं की भूमिका पर अधिक निर्भर करना होता है.
नागराजा महाकाव्य (कन्हैयालाल डंडरियाल, १९७७ व २००४ पाँच खंड) की भूमिका १९७७ में डा गोविन्द चातक ने कवि के भावपक्ष, विषयपक्ष व शैलीपक्षों का विश्लेष्ण विद्वतापूर्ण किया, तो २००४ में नत्थीलाल सुयाल ने डंडरियाल के असलियतवादी पक्ष की जांच पड़ताल की.

Friday, December 09, 2011

गढवाली भाषा में समालोचना/आलोचना/समीक्षा साहित्य


(गढवाली अकथात्मक गद्य-३)
(Criticism in Garhwali Literature)

यद्यपि आधिनिक गढवाली साहित्य उन्नीसवीं सदी के अंत व बीसवीं सदी के प्रथम वर्षों में प्रारम्भ हो चूका था और आलोचना भी शुरू हो गयी थी. किन्तु आलोचना का माध्यम कई दशाब्दी तक हिंदी ही रहा.
यही कारण है कि गढवाली कवितावली सरीखे कवि संग्रह (१९३२) में कविता पक्ष, कविओं की जीवनी व साहित्यकला पक्ष पर टिप्पणी हिंदी में ही थी. गढवाली सम्बन्धित भाषा विज्ञानं व अन्य भाषाई अन्वेषणात्मक, गवेषणात्मक साहित्य भी हिंदी में ही लिखा गया. वास्तव में गढवाली भाषा में समालोचना साहित्य की शुरुवात 'गढवाली साहित्य की भूमिका (१९५४) पुस्तक से हुयी.

पहाड़ के उजड़ते गाँव का सवाल विकास की चुनौतियाँ और संभावनाएं

उत्तराखंड की लगभग 70 प्रतिशत आबादी गाँव मैं निवास करती है 2011 की जनगणना के अनुसार हमारे देश मैं लगभग 6 लाख 41 हजार गाँव हैं उत्तराखंड मैं भी लगभग 16826 गाँव हैं लेकिन पहाड़ो का शायद ही कोई ऐसा गाँव होगा जिसमे 40 प्रतिशत से कम पलायन हुआ होगा पहाड़ के खासकर उत्तराखंड हिमालय मैं औपनिवेशिक काल से ही पलायन झेल रहे हैं इसलिए गाँव का कम से कम इतना उत्पादक होना जरुरी हैं की वहां के निवासी वहां रहकर अपना भरण पोषण करने के अलावा अपनी जरूरतें आराम से पूरी कर सकें लेकिन ज्यादातर पहाड़ अनुत्पादकता के संकट से जूझ रहे हैं जबकि कहा जाता है की पहाड़ (विशेषतः हिमालयी )संसाधनिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध हैं परन्तु विरोधाभास ये है की राज्य बनने के इतनी वर्षों बाद भी गाँव से पलायन नहीं रुका और यहाँ के गाँव की लगभग आधी आबादी रोजी-रोटी की तलाश मैं प्रवास कर रही है स्पष्ट है की गाँव का उत्पादन तंत्र कमजोर है

Saturday, December 03, 2011

गढवाली भाषा साहित्य में साक्षात्कार की परम्परा

Intervies in garhwali Literature
(गढवाली गद्य -भाग ३)


साक्षात्कार किसी भी भाषा साहित्य में एक महत्वपूर्ण विधा और अभिवक्ति की एक विधा है. साक्षात्कार कर्ता या कर्त्री के प्रश्नों के अलावा साक्षात्कार देने वाले व्यक्ति के उत्तर भी साहित्य हेतु या विषय हेतु महत्वूर्ण होते है. अंत में साक्षात्कार का असली उद्देश्य पाठकों को साक्षात्कारदाता से तादात्म्य कराना ही है, प्रसिद्ध व्यक्ति विशेष की विशेष बात पाठकों तक पंहुचाना होता है. अत: साहित्यिक साक्षात्कार समीक्षा में यह देखा जाता है कि साक्षात्कार से उदेश्य प्राप्ति होती है कि नही.

Friday, December 02, 2011

आधुनिक गढवाली भाषा कहानियों की विशेषतायें और कथाकार


(Characteristics of Modern Garhwali Fiction and its Story Tellers)

कथा कहना और कथा सुनना मनुष्य का एक अभिन्न मानवीय गुण है. कथा वर्णन करने का सरल व समझाने की सुन्दर कला है अथवा कथा प्रस्तुतीकरण का एक अबूझ नमूना है यही कारण है कि प्रत्येक बोली-भाषा में लोककथा एक आवश्यक विधा है. गढ़वाल में भी प्राचीन काल से ही लोक कथाओं का एक सशक्त भण्डार पाया जाता है. गढ़वाल में हर चूल्हे का, हर जात का, हर परिवार का, हर गाँव का, हर पट्टी का अपना विशिष्ठ लोक कथा भण्डार है. जहाँ तक लिखित आधुनिक गढ़वाली कथा साहित्य का प्रश्न है यह प्रिंटिंग व्यवस्था सुधरने व शिक्षा के साथ ही विकसित हुआ. संपादकाचार्य विश्वम्बर दत्त चंदोला के अनुसार गढ़वाली गद्य की शुरुवात बाइबल की कथाओं के अनुवाद (१८२० ई. के करीब) से हुयी (सन्दर्भ: गाड मटयेकि गंगा १९७५). गढ़वालियों में सर्वप्रथम डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर पद प्राप्तकर्ता गोविन्द प्रसाद घिल्डियाल ने (उन्नीसवीं सदी के अंत में) हितोपदेश कि कथाओं का अनुवाद पुस्तक छापी थी (सन्दर्भ :गाड म्यटेकि गंगा).

Thursday, October 20, 2011

छपेली नृत्य गीत


 गढवाल कुमाओं का एक प्रसिद्ध नृत्य गीत शैली









मदुली च बांद, हिराहिर मदुली

स्याळी :    बाखरो को सांको बल बाखरो को सांको
               मि बांद बणयूँ छौं मिन क्या कन यांको
               रे जीजा मैनेजर ल़े जीजा, मिन क्या कन यांको
               मदुली हिराहिर, मदुली च बांद

जीजा :    चखुली को बीट बल चखुली को बीट अ
        मेरी मोटर मा बैठ मदुली अगनाई का सीट अ
        मदुली हिराहिर मदुली अगनाई का सीट

स्याळी :    घोटी जाली हींग, घोटी जाली हींग अ
                मिन कनकैक बैठण रे जीजा मै उठद रींग अ
                रे जीजा मैनेजर मै उठद रींग अ
कोरस :    मदुली च बांद मदुली हिराहिर मदुली

जीजा :     घिंड्वा को बीट बल घिंडुडी को बीट अ
               नी उठदी रींग मदुली अगनाई क सीट अ
              मदुली हिराहिर अगनाई क सीट
कोरस :    मदुली च बांद मदुली हिराहिर मदुली

स्याळी:     बामण की पोथी बल बामण की पोथी  अ
                मिन कनकैक आण रे जीजा फटीं च धोती
                रे जीजा मैनेजर ल़े जीजा, मेरी फटीं च धोती अ

जीजा :    खेंडि जालो बाड़ी बल खेंडि जालो बाड़ी
              धोती तू फटण दे मी मंगौल़ू साड़ी
              मदुली हिराहिर मदुली मी मंगौल़ू साड़ी

कोरस :    मदुली च बांद मदुली हिराहिर मदुली
               बीडी को बंडल बीडी को बंडल अ
              साड़ी त तू लिली मीम नीन सैंडल
              रे जीजा मैनेजर ल़े जीजा मीम नीन सैडल अ

जीजा :    ग्युं बूतिन मुट्ठीन ग्युं बूतिन मुट्ठीन
              तू अगनाई चल रुंवाली खुटींन
              मदुली हिराहिर रुंवाली खुटींन
             मदुली हिराहिर बिगरैली खुटींन

कोरस :    मदुली च बांद मदुली हिराहिर मदुली
               मदुली हिराहिर मदुली मदुली च बांद मदुली     

स्रोत्र : गंगाराम भट्ट,
ग्राम : लीह, पट्टी कंडवालस्यूं,
देवप्रयाग, गढवाल   

Reference Dr Shiva Nand Nautiyal

The song creates agility, pleasure of union, happiness, smile, joy, anxiety types of emotion.
Bhishma Kukreti

(Garhwali Folk Dance Songs, Kumauni Folk Dance Songs, Himalayan Folk dance Songs)

Chhapeli is very popular dance song of Kumaun-Garhwal border region. The dance song is very popular among young generation. In this dance, a young female and young male take part. The song subject may be of relation between two lovers, jeeja-Sali, Bhauj-Devar, mother-son, song and father, brother –sister or so. Now, mostly, the songs pertaining Chhapeli are of active love between male and female lovers.
The dance is performed at any time depending upon the time and situation of the dancers. The Badi Badan dance and sing this dance song at various times and places.
The dance does not have any particular sequence and the dance sequence depend s on the capacity of dancers and the dance they know better. However, the dance is ful of drama and dancers have to act as per the song subject.
The following song is a love dance song and relation between a most beautiful girl (though poor) and rich brother in law. The song creates splendid images of love and love rapture.

Copyright @ Bhishma Kukreti

Sunday, October 16, 2011

चांचरी लोकगीत

चंदी गड़ी बंदी सुआ, चंदी गड़ी बंदी
कैकी सुआ होली इनी, लगुली सि लफन्दी,
दीवा जन जोतअ, दीवा जन जोतअ

चदरी की खांप सुआ चदरी की खांप
कैकी सुआ सुआ होली इनी, सेल़ू जन लांप, 
Whose lover would be as flexible as fiber (selu)
दीवा जन जोतअ  
Bright as earthen lamp

पाणी जन पथळी 
Thin  as water
रूंवां जन हंपळी 
Spongy as cotton
डाळी जन सुड़सुड़ी
straight as fine tree
कंठ कि सि बडुळी
memorable as hiccups of neck (it is Garhwali phrase)
बखरों कि तांद, सुआ बखरों कि तांद
कैकी सुआ होली इनी, अंछेरी जन बांद,  
Whose lover would be so beautiful as fairy
दीवा जन जोतअ
Bright as earthen lamp

धुवां जन धुपेळी 
Attractive as smoke of Dhupan
राजुला जन राणी
Queen as Rajula
केल़ा जन हतेळी
Whose hand are as banana
बाज़ी जालो भंकोर, सुआ बाजी जालो भंकोर,
कैकी सुआ होली इनी , टपरांदी चकोर, 
Whose lover would be as waiting Chakor (Chakor is symbol of lover)
दीवा जन जोतअ
Bright as earthen lamp

स्वीणा सि लिख्वार की 
Beautiful as the imagination of a writer
पिरथी कि सि मोल
Costly as globe 
बाळी सुरत बांकी
Beautiful face
सोना जनि तोल
Weight as gold
घास कि गुंडळी सुआ, घास कि गुंडळी,  
मिरग सि आंखी सुआ, घुन्घर्याळी लटुली,  
Eyes as deer, curly hair
दीवा जन जोतअ 
Bright a earthen lamp

नौसुर मुरली की, गितांग जन गौली
whose throat is as sweet as nine tunes of Nausuri fluit
बुरांस जनि फूल
Who is as rhododendron flower (red)
फ्यूंळी जनि रौंतेली
Splendid as Fyunli flower
लगुड़ी लचीली सुआ, लगुड़ी लचीली, 
Flexible as Lagudi (a type of Paratha)
कै चाल चल्दी सुआ, साज सि सजीली .
What a scenic (attractive) movement
दीवा जन जोतअ
Bright as earthen lamp


# मूल स्रोत्र : केशव ध्यानी
सन्दर्भ : डा शिवा  नन्द नौटियाल, श्याम छम घुंघरू बाजला

Chanchari : A Folk Dance-Song Style of Kumaun and Garhwal


(Folk dance-songs of Garhwal, Traditional Folk Dance songs of Kumaun, Customs of Uttarakhand)

Chanchari folk dance-song is very famous traditional dance-song of borders of Kumaun and Garhwal regions of Uttarakhand (Mid Himalayan) state. Dr ShivaNand Nautiyal the prolific expert of Garhwali and Kumauni culture mentions that there is no difference between Jhoda and Chanchari dance in Kumaun region but there is slight difference between Jhoda and Chanchari folk dance in Garhwal.
The dance-song is a group dance wherein males and females dancers take part and dance in circle. The female dancers dance in half circle and males dance in rest of the circle. The Chanchari folk dance is a kind of spontaneous style.
The chancheri dance has been there in India from early age. Kalidas described Chanheri dance in Vikramovarsheeyam (Dr ShivaNand Nautiyal and Dr Shiv Prasad Dabral) as Charchari dance, game. Dr Nauityal provides references of Haribhadr suri’s Samraichchkahaa’ wherein Chanchri is described.
The dancers can dance Chanchari folk dance in any plain place and at any time depending upon the situation. In old time, the songs for Chanchari dance were of all kind as religious, inspirational subjects but now, mostly, the love songs are sung in Chanchari dance. The Hudkiya (small drum player) plays Hudka and sing the song in centre and around him the dancers  dance Chanchari, the dancers also become the chorus singers whenever needed. First the Hudkiya sing the song, the male dancers/singers repeat the song and females complete the song line. The sound of male singer is medium but the sound of female singers is always very melodious and low. As happened in Chhopti  dance-song, the first stanza of chanchari song is meaningless and second stanza should have same ending words (Patt milan).
The difference between Jhoda and chanchari  dances is that the speed in Chanchari dance is slower than Jhoda. There is performance of Kamar /kativinyas- waist, hip in Chanchari along with footstep. The waist is bent towards footstep too in Chanchari dance.
A Love Folk Song for Chanchari folk Dance of Kumaun -Garhwal

Copyright@ Bhishma Kukreti

Thursday, September 29, 2011

गढ़वाली बोलने, सीखने को प्रेरित करती किताब

गढ़वाली भाषा की शब्द-संपदा
इन दिनों रमाकांत बेंजवाल की गढ़वाली भाषा पर आधारित पुस्तक ‘गढ़वाली भाषा की शब्द-संपदा’ बेहद चर्चा में है। वह इसलिए क्योंकि उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद गढ़वाली भाषा पर आधारित पहली ऐसी पुस्तक प्रकाशित हुई है, जो आम पाठक को गढ़वाली बोलने एवं सीखने के लिए प्रेरित ही नहीं करती, वरन् गढ़वाली भाषा के सम्बन्ध में एक नए पाठक की हर आधारभूत जिज्ञासा को संतुष्ट करने में सक्षम दिखाई पड़ती है।
रमाकांत बेंजवाल पिछले ढाई दशक से भी अधिक समय से गढ़वाली भाषा और साहित्य के लिए एक मिशन के रूप में कार्य कर रहे हैं। उनके द्वारा इससे पूर्व पांच पुस्तकें सम्पादित अथवा प्रकाशित की गई हैं।

Thursday, September 15, 2011

बारिश में भीगता दिन

बीती रात से ही मूसलाधार बारिश रुक रुककर हो रही थी. सुबह काम पर निकला तो शहरभर में आम दिनों जैसी हलचल नहीं थी. मित्रों के साथ त्रिवेणीघाट निकला. गंगा के पानी का रंग गाढ़ा मटमैला होने के कारण हम मान रहे थे कि जलस्तर में कुछ बढ़ोतरी हुई है. लेकिन जब वाटर लेवल पोल को देखा तो और दिनों के मुकाबिल १०-१२ सेमी की वृद्धि ही नजर आयी. सो बाढ़ के कयास धरे रह गए. साथी बता रहे थे कि पिछले साल इसी दिन से गंगा अपना रौद्र रूप दिखाने लगी थी. १८-१९ सितम्बर आते-आते गंगा २०१० के सबसे उच्चतर स्तर ३४१.५२ मीटर पर खतरे के निशान से करीब एक मीटर ऊपर बह रही थी. सो हम अनुमान लगा रहे थे कि क्या इस बार भी गंगा में बाढ़ के हालात पैदा होंगे. हालांकि अभी तक टिहरी झील भले ही लबालब यानि ८२० आरएल से ऊपर भर चुकी है. लेकिन बाढ़ के संकेत वहां से भी नहीं मिल रहे.

Saturday, August 13, 2011

हाल

दाऽ
स्यु बीति
आजादी कु
पचासुं साल
ऊंड फुंड्वा
खादी झाड़िक
बणिगेन मालामाल/ अर
हम स्यु छवां
आज बि
थेकळौं पर थेकळा धारि
कुगत, कुहाल/ अर
कंगाल
Source : Jyundal (A Collection of Garhwali Poems)
Copyright@ Dhanesh Kothari

Monday, July 11, 2011

गौं तलक

सड़क पौंछिगे मेरा गौं
मोटर, कार, गाड़ी
फैशन, नै रौ रिवाज
फास्‍ट फूड, बर्गर
हिन्दी, अंग्रेजी
ज्यांकू ब्वल्दन् बल कि
सौब धाणि
पौंछिगे मेरा गौं

नि पौंछी सकी त्.....
पाणि, धाणि
टीबी कू इलाज
जौ-जंगळूं कू हक
सर्‌करी इस्कूला मास्साब
हौळ-बळ्द, लाट-जू, जुड़ू
अर हौरि बि
जू मैं बिसरिग्यों,
तुम याद होलू
क्य बिगास यांकू ई ब्वलदन...?

सर्वाधिकार-: धनेश कोठारी

Sunday, July 10, 2011

सहकार से बचेंगी लोकभाषायें

उत्तराखण्ड भाषा संस्थान ने पिछले दिनों राजधानी देहरादून में लोकभाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए तीन दिवसीय सम्मेलन आयोजित किया। सरकार ने जिस मंशा से इसे किया था, उसे समझने में किसी को ज्यादा दिमागी जमाखर्च करने की जरूरत नहीं है। लोकभाषाओं पर सरकार की चिंता से सभी वाकिफ हैं। वैसे भी लोकभाषायें सरकार से नहीं, सहकार से बचेंगी। उसके लिए ओएनजीसी के हॉल में सम्मान समारोह नहीं, बल्कि जौनसार और अस्कोट के उस लोक को बचाने की जरूरत है जो अब समाप्त हो रहा है।
इन भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए सरकारी प्रोत्साहन का जहां तक सवाल है, इसी सरकार ने विधानसभा में पारित लोकभाषा बिल को कुछ लोगों के हडक़ाने पर वापिस ले लिया था। पिछले साल सरकार ने स्थानीय भाषा-बोलियों को समूह ‘ग’ की सेवाओं में शामिल करने का मसौदा तैयार किया था। लेकिन बाद में कुछ मंत्रियों और विधायकों के दबाव में इसे वापस लेना पड़ा। अफसोसजनक बात यह है कि जिस मंत्री ने इस विधेयक का सबसे ज्यादा विरोध किया, वही इस सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। इतने बड़े सम्मेलन में किसी की हिम्मत नहीं हुई कि वह मदन कौशिक से पूछ सके कि वह किस मुंह से लोकभाषा की बात कर रहे हैं। सवाल तो मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ और प्रकाश पंत से भी किया जाना चाहिए था, लेकिन यह लोकभाषा पर सवाल करने का नहीं, इसी बहाने सम्मान पाने का समारोह था। मुख्यमंत्री से और भी काम पड़ते रहते हैं। इसलिए यह मान लेना चाहिए कि कुछ तो अच्छा हो रहा है।

उत्तराखण्ड में लोकभाषाओं पर बहस की बात नई नहीं है। संविधान की आठवीं अनुसूची में इसे शामिल करने के लिए लंबे समय से मांग की जा रही है। विभिन्न संगठनों और क्षेत्रीय समाचार माध्यमों ने इसे एक अभियान के रूप में चलाया। जब भी यह बातें आगे बढ़ीं, सरकार और राष्ट्रीय स्तर के ‘पहाड़ी’ साहित्यकारों ने अपनी टांग अड़ा दी। इस सम्मेलन में एक प्रतिष्ठित हिंदी के साहित्यकार ने तो ‘उत्तराखण्ड’ शब्द पर ही एतराज जता दिया। उन्होंने कहा कि उन्हें ‘उत्तरांचल’ शब्द ही अच्छा लगता है। उत्तराखण्ड के सरोकारों से दूर इन साहित्यकारों से प्रमाणपत्र की आवश्यकता न होते हुए भी सार्वजनिक तौर पर दिये गये उनके इस बयान को इसलिए गंभीरता से लिया जाना चाहिए क्योंकि वो भी पुरस्कार बांटने वालों में से एक थे। उनसे यह भी सवाल किया जाना चाहिए कि उनकी बात मान भी ली जाये तो क्या उत्तरांचल शब्द से कुमाऊनी, गढ़वाली या जौनसारी भाषा का उद्धार हो जायेगा? असल में वे हमेशा लोकभाषाओं को हिंदी के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते रहे हैं। लोकभाषाओं को खतरा बताने वाले लोग लोकभाषा सम्मेलन के अतिथि के रूप में शामिल होंगे तो समझा जा सकता है कि हम किस दिशा में जा रहे हैं। एक और प्रतिष्ठित साहित्यकार इस सम्मेलन को धन्य कर गये। उन्होंने माफी मांगी कि वह तैयारी करके नहीं आये हैं। तैयारी करके भी आते तो क्या हो जाता। वे अपनी समझ या लोकभाषाओं के प्रति दृष्टिकोण तो नहीं बदलते। राष्ट्रीय स्तर पर ख्यातिप्राप्त होने के बाद वे कुमाऊनी, गढ़वाली या जौनसारी की वकालत कर अपने को छोटा क्यों करते। बाद में जैसा उन्हें समझ में आया बोले भी। उन्होंने कहा कि हमें कुमाऊनी-गढ़वाली के चक्कर में पडऩे की बजाय एक विश्व भाषा पर बात करनी चाहिए।

लोकभाषा पर आयोजित इस सम्मेलन के ये कुछ फुटकर उदाहरण हैं। इसके अलावा भी बहुत कुछ हुआ। ऐसा होना कोई अनहोनी नहीं है। सरकार इस तरह के आयोजन अपनी उपलब्धियों में शामिल होने के लिए करती है। जो असल सवाल है वह लोकभाषाओं के प्रति हमारे पक्ष का है। उस पक्ष को तय न करने का संकट हम सबके बीच है। कुछ लोगों ने इस सम्मेलन में बहुत तरीके से भाषा के संवर्धन और संरक्षण के सवाल भी उठाये। कुमाऊं विश्वविद्यालय के प्रो. देवसिंह पोखरिया ने जिस सवाल को उठाया, वह लोकभाषाओं-बोलियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। अस्कोट में वनरावतों के बीच बोली जाने वाली राजी भाषा को बोलने वाले कुल ३५० लोग बचे हैं। यह भाषा एक पूरी संस्कृति की वाहक है। उसका लिखित साहित्य भी नहीं है। इसी तरह लगभग आधा दर्जन बोलियां हैं, जो धीरे-धीरे समाप्त हो रही हैं। कुमाऊनी, गढ़वाली और जौनसारी के कई शब्द समाप्त हो रहे हैं। इसके पीछे के कारणों और उस लोक को बचाने के बारे में भी सोचना होगा जहां भाषा और संस्कृति पुष्पित-पल्लवित होती है। लोकभाषा के साथ कुछ जुडऩा और छूटना अलग बात है, लेकिन उसे संरक्षित करने की ईमानदार पहल होनी चाहिए। अधिकतर विद्वानों का मानना है कि लोकभाषाओं को पाठ्यक्रम में लागू किया जाना चाहिए। इस तरह की मांग का स्वागत किया जाना चाहिए। जब हम इस तरह की बातें करते हैं तो हमें वस्तुस्थिति से भी अवगत होना चाहिए। मौजूदा समय में उत्तराखण्ड में सरकारी स्कूलों की हालत खस्ताहाल है। पिछले दिनों सरकार ने छह सौ से अधिक प्राइमरी स्कूलों को बंद किया है। जिन गांवों के इन स्कूलों को छात्रविहीन बताया गया है, वहीं खुले पब्लिक स्कूलों में बच्चों की भारी संख्या है। इन पब्लिक स्कूलों में स्थानीय भाषाओं के लिए कोई स्थान नहीं है, इसलिए लोकभाषा के सवालों पर बात करते समय पुरस्कारों और सरकारी आयोजनों का मोह छोडऩा जरूरी है। मौजूदा सरकार लोकभाषा विरोधी है, जिन लोगों से संघर्ष है, उन्हीं से दोस्ती खतरनाक होती है। लोकभाषा की चिंता करने वाले विद्वान अगर प्रतीकात्मक रूप से भी लोकभाषा विधेयक को वापस लेने वाली सरकार के सम्मान को वापस कर देते तो आधी लड़ाई हम जीत लेते। आखिर हम कौन होते हैं बोलने वाले। बोलेंगे विद्वान, सुनेंगे विद्वान, चिंता करेंगे विद्वान और उन्हें प्रोत्साहन देगी सरकार।             
आमीन!
चारु तिवारी
कार्यकारी सम्पादक
जनपक्ष आजकल

सौजन्य -: http://charutiwari.merapahad.in/how-to-save-uttarakhandi-local-languages/

Friday, July 01, 2011

ब्योली नवांद दैन्कू मांगळ गीत

Bathing after   Haldi Hath by Bride : A Garhwali Wedding Folk Songs                

( Nayand Dain ku  Mangal )
(Garhwali Wedding Folk Songs, Himalayan Wedding Folk Songs)

Wedding Folk Songs are very important aspects of Garhwali culture. There is folk song for each stage of Garhwali wedding.

However, marriage or singing, dancing in wedding ceremony is common in most of the community all over world.

Take the example of Palestine, there are many folk songs sung at the wedding time in groom’s house and bride’s house as well. The Henna application on Bride’s face and on other part is very essential aspect of Palestine community, On that occasion the community members sing  various types of Wedding folk Songs . N.Azam provides the example of Henna application in Palestine.

Wedding Folk Songs of Palestine

“They put henna on the brides but left out my hands”
“How wonderful it is to sleep among the girls”
“They put henna on the brides but left out my fingers”
“How wonderful it is to sleep among the little girls”

(Reference : Na’ela Azzam Libbes, The Palestine Wedding Practices and Rituals; This Week in Palestine, Issue 105, 2007)

Wedding Folk Song and Dance in Anatolia

 In Anatolia , the bride sits on cushion , the Henna is put in silver bowl and The   unmarried women applies Henna on left hand of the bride and married woman applies Henna on bride’s right hand. The guest, family members sing, dance with enthusiasm. Havalar Ayaz song is very popular wedding folk songs of Turkey

Wedding songs of Baluchistan

In Baluchistan, there is festive occasion while Henna application (decoration of Henna on Bride’s body) is there win wedding performances. The women sing various types of songs related to Henna application

Wedding Folk Songs of Bulgaria , Europe

In Bulgaria marriage ceremony is very important and there is folk song, dances in wedding performances and rituals are also sung  Astargya , Blacha, Buchimish, BavnaMelodija are a couple of famous titles of wedding songs of Bulgaria.

Chinese Wedding Folk Songs (Feng )  and Dance

Chinese have philosophical wedding culture and is full of traditions and rituals. The wedding songs, music is primary music in China. Chinese wedding folk music is very diverse, and songs provide joyful feeling, slow, at times sad feelings an d romantic at other times as also happens in Garhwali wedding performances. In this occasion, there is always wedding music tune which is different than funeral music tune or dragon boat race.

Wedding Folk Music in Africa 

As in Garhwal, Kumaun of Uttarakhand (India) the wedding marriage is not the relationship between the bride and groom but is seen more like a combining two families together. Therefore, in most of regions, there are wedding folk songs, dances in Africa.

Famous Irish Wedding Folk Songs

In Irish wedding is a social ceremony. The family member s sing song and dance with joy . the following folk song is very popular song of Irish wedding tradition

“She wears my ring to show the world
That she belongs to me
She wears my ring to tell the world
She’s mine eternally”…………….

…………………….. “She swears to wear it…….
“With eternal devo-otion
“That’s why I sing”
“Because she wears my ri-i-ing”

Garhwali Wedding Folk Songs at the time of Bride Ttaking Bath 

( Nayand Dain ku  Mangal )

As mentioned above that there are songs in each dtage of Garhwali wedding . When there is Haldi Hath (Ban Deen) then there is bathing (Nayan) of bride or groom at their respective home. When bride takes bath by water (no soap is allowed) with the help of her friends inside the room and outside on the country yard   , the singers sing folk song and the Das play drums etc. The music is slow but very soothing to ear.

The song is symbolic and the song narrates about goddess Parvati taking bath in the pond.          

क्यान कुण्डी कौज्याळ ह्वाए s s s
क्यान कुण्डी कौज्याळ ह्वाए s s s

मथि देश द्यो नि बरखो s s s
मथि देश द्यो नि बरखो s s s

क्यान कुण्डी कौज्याळ ह्वाए s s s
क्यान कुण्डी कौज्याळ ह्वाए s s s

सुरया धुमेलो ह्वाई s s s
सुरया धुमेला ह्वाए s s s

मथि कुण्डी पारबती नयाए s s s
मुडी कुण्डी कौज्याळ ह्वाए s s s

ईं ब्योली रंग चढ़ावा ए s s s
ईं ब्योली रंग चढ़ावा ए s s s

सबि कनियों दगड्या बुलावा ए s s s
सबि कनियों दगड्या बुलावा ए s s s


Reference:
Totaram Dhoundiyal, Mangal, Dhad Prakashan, Dehradun
Copyright @ Bhishma Kukreti,

हल्दी लगाण दें मांगळ गीत

Garhwali Wedding Folk Song at the time of Turmeric Past Application
(Garhwali Folk Songs, Himalayan Folk Songs, Indian Folk Songs )
Online Presentation : Bhishma Kukreti
Offline Presentation: Tota Ram Dhoundiyal ,Shrimati Shalija Thapliyal  'Mangal' published by Dhad Prakashan , Dehradun

After Ban Deen performance the women apply the turmeric paste on each part of bride or groom. Other women and the professional singer sing the Mangal Song or auspicious song
In this song. there is description of growing the turmeric or hwo the turmeric is grown in the field .However, the deities are in involved agricultural activities in the song. The song show the attachment of Garhwalis to the agricultural activities and the importance of agriculture.


कैन हल्दी साए ह्वेलि कैन हल्दी बाए ह्वेलि  s s s
कैन हल्दी साए ह्वेलि कैन हल्दी बाए ह्वेलि  s s s

मादेव जीन सायो छौ बायो छौ s s s
मादेव जीन सायो छौ बायो छौ s s s

पारबती जीन न्युलो छौ ग्वाड़ो छौ s s s
पारबती जीन न्युलो छौ ग्वाड़ो छौ s s s

कैन हल्दी त्वे रंग चढायो s s s
कैन हल्दी त्वे रंग चढायो s s s

पंचनाम दिव्तौन मैं रंग चढायो s s s
पंचनाम दिव्तौन मैं रंग चढायो  s s s

Regards
B. C. Kukreti

Thursday, June 30, 2011

ब्योली तैं बान दीण कु मांगळ गीत

Byoli Tain  Ban Deend Dainku Mangal : Mangal geet (Auspicious Song) of Pasting the Bride
(Garhwali Wedding Folk Songs, Himalayan Wedding folk Songs )

Presented on Internet medium  by Bhishma Kukreti

Offline Presentation by Totaram Dhoundiyal , Mangal, Dhad Prakashan , Dehradun

In Garhwali wedding , there are folk songs at each and every stage . HaldiHath or ban deen is a very important stage of wedding ceremony.  After females prepared the Turmeric and herbal paste by grinding various tubes of herbs and turmeric, the stage of ban Den comes for Bride at her home and for Groom at his home. The ban deen performance is performed in country yard (Chauk) . The Pundit jee tells the auspicious time and ask bride to sit on the flat stool of Sandan wood on which he set pooja of lord Ganesh (Ganesh sthapana) . Two girls will catch a chadar (bed sheet) above the bride and on that Chadar rice, linen seeds, juggry , pakodi, Poori ar put in a Thali (plate . Pundit jee put turmeric paste into five leave vessels  (Pudkee) with barley, linen seeds .

Then start ban den  process . ban deen means to put  the turmeric paste on the foot, on knee, on elbow, shoulders, and on head with the help of a bunch of doob leaves. First Pundit jee do Ban deen performance, then five unmarried girls (who grinded  turmeric tubes and made paste)  , the mother , then father and then the relative’s women and men do the same performance that is ban deen performance

Pundit jee  sing the chants in Sanskrit and the auspicious singers sing the following Mangal. Side by side the das play Damau and Dhol with slow a specific rhythm .

After ban deen Process, the bride takes bath without soap.


बैठ मेरी लाड़ी बैठ मेरी लाड़ी सांदणा चौकली
बैठ मेरी लाड़ी सांदणा चौकली ए

पूजा पूजा बरमा जी पूजा पूजा बरमा जी सान्दंणऐ चौकली
पूजा पूजा बरमा जी सान्दंणऐ चौकली ए

कै द्यावा बरमा जी कै द्यावा बरमा जी रक्छा बंधन
कै द्यावा बरमा जी रक्छा बंधन ए
पैलू क बांदा  पैलू क बांदा बरमा सुबाला
पैलू क बांदा बरमा सुबाला ए
बरमा सुबाला बरमा सुबाला आशीष द्याला
बरमा सुबाला आशीष द्याला ए

न्यडु आई जावा न्यडु आई जावा पांच कनियाँ
न्यडु आई जावा पांच कनियाँ ए

पांच कनियाँ  पांच कनियाँ तिलक लगाली
पांच कनियाँ तिलक लगाली ए

तिलक लगाली तिलक लगाली रक्षा बांधली
तिलक लगाली रक्षा बांधली ए
के केका कनियाँ के केका कनियाँ बांदा सुबैली
के केका कनियाँ बांदा सुबैली ए
पायूँ का बांदा पायूँ का बांदा सिर मा सुबैली
पायूँ का बांदा सिर मा सुबैली ए

हळीद म्न्जीठा का हळीद म्न्जीठा का बांदा सुबौला
हळीद म्न्जीठा का बांदा सुबौला ए

जी रयाँ कनियाँ जी रयाँ कनियाँ सदा रैं अमर
जी रयाँ कनियाँ सदा रैं अमर ए

न्यडु आई जावा न्यडु आई जावा जाजमती नारी
न्यडु आई जावा जाजमती नारी  ए

जाजमती नारी जाजमती नारी तिलक लगाली
जाजमती नारी तिलक लगाली ए

तिलक लगाली तिलक लगाली रक्षा बांधली
तिलक लगाली रक्षा बांधली ए

पायूँ का बांदा पायूँ का बांदा सिर मा सुबैली
पायूँ का बांदा सिर मा सुबैली  ए
जाजमती नारी जाजमती नारी सदा रैं स्वागीण
जाजमती नारी सदा रैं स्वागीण ए

न्यडु आई जावा न्यडु आई जावा माजी सुनैना
न्यडु आई जावा माजी सुनैना ए

मा जी सुनैना मा जी सुनैना तिलक लगाली
मा जी सुनैना तिलक लगाली ए

बेटी सीता की बेटी सीता की रक्षा बांधली
बेटी सीता की रक्षा बांधली ए

दे द्यावा मांजी दे द्यावा माजी दै दुबला बांन्द
दे द्यावा माजी दै दुबला बांन्द ए
पंचांगी बांदा पंचांगी बांदा शिरमा सुबाली
पंचांगी बांदा शिरमा सुबाली  ए

जी रयाँ मांजी जी रयाँ मांजी सदा स्वागीण
जी रयाँ मांजी सदा स्वागीण  ए

जौन तुमन जौन तुमन जलम सुधारी
जौन तुमन जलम सुधारी  ए

तू मेरी कनिया तू मेरी कनिया सदा रै स्वागीण
तू मेरी कनिया सदा रै स्वागीण  ए

सदा रै स्वागीण सदा रै स्वागीण सदा रै अमर
सदा रै स्वागीण सदा रै अमर  ए

न्यडु आई जावा  न्यडु आई जावा पितैजी जनक
न्यडु आई जावा पितैजी जनक  ए

पितैजी जनक पितैजी जनक तिलक लगाला
पितैजी जनक तिलक लगाला  ए

तिलक लगाला तिलक लगाला रक्षा बांधला
तिलक लगाला रक्षा बांधला ए

दे द्यावा पितैजी दे द्यावा पितैजी हळदि का बान
दे द्यावा पितैजी हळदि का बान ए

जी रयाँ पितैजी जी रयाँ पितैजी सदा अमर
जी रयाँ पितैजी सदा अमर ए

जौन तुमन जौन तुमन जनम सुधार
जौन तुमन जनम सुधार ए

दे द्यावा ममा जी दे द्यावा ममा जी पंचरंगी बांदा
दे द्यावा ममा जी पंचरंगी बांदा  ए

जी रयाँ ममाजी जी रयाँ ममाजी लाख बरस
जी रयाँ ममाजी लाख बरस ए

दे द्यावा मामिजी दे द्यावा मामिजी स्वाग्वन्ती बान
दे द्यावा मामिजी स्वाग्वन्ती बान ए

दे द्यावा बोडिजी दे द्यावा बोडि जी हळदि का बान
दे द्यावा बोडि जी हळदि का बान ए

बोडिजी हमारि बोडि जी हमारि बांदा सुबाली
बोडि जी हमारि बांदा सुबाली ए

दे द्यावा बड़ा जी दे द्यावा बड़ा जी दै दुबला बान
दे द्यावा बड़ा जी दै दुबला बान ए

दे द्यावा चची जी दे द्यावा चची जी दै दुबला बान
दे द्यावा चची जी दै दुबला बान ए

दे द्यावा काका जी दे द्यावा काका जी हळदि का बान
दे द्यावा काका जी हळदि का बान ए

न्यडु आवा न्यडु आवा पीठी क भाई
न्यडु आवा पीठी क भाई ए

पीठि क भाई पीठि क भाई तिलक लगाल़ा
पीठि क भाई तिलक लगाल़ा ए

पीठि क बैणि पीठि क बैणि तिलक लगाली
पीठि क बैणि  तिलक लगाली ए

तिलक लगाली तिलक लगाली रक्षा बांधली
तिलक लगाली रक्षा बांधली ए

जी रयाँ अमर जी रयाँ अमर भै बैणयूँ जोड़ी
जी रयाँ अमर भै बैणयूँ जोड़ी ए

हल्दी हाथ के वक्त पंचदेव आदि पूज़ा मांगळ

Panchdev Pooja : An Auspicious Garhwali Wedding Folk Song
Presented by Bhishma Kukreti
( Curtsy : Totaram Dhoundiyal , Mangal , book published by Dhad Prakashan  Dehradun )
(Garhwali Wedding Folk songs, Himalayan Wedding Folk Songs, Wedding Folk Songs)
This song is sung by village women and professional singer together or separately. the song is sung when Pundit jee is also performing Gaesh poojan for haldi hath or Ban Deen ceremony and calling all deities  . In this auspicious folk songs the manglers (who sing Mangal) requesting Barma jee (the creator of this Galaxy) for performing the pooja odf lord Ganesh, Bhoomi (the earth), Pitars (forefathers) , and all Nine Grahsa and deities. The singers also do offer respect  of Vedas created by Barma jee
There is mention of how the pooja will be performed, what are the requirement for Pooja performance .
The songs enhance the joy of wedding ceremony and is capable bringing very powerful  positive energy at the Haldi Hath ceremony (pasting turmeric and herbal paste on bride and/or groom at their respective home )  , The das use to play Dhol and Damau in very slow rhythm  along side of the ceremony . The Das or Aujee pair (Drum players ) play a special tune for the ceremony. If the bagpiper wala is also their the bagpiper player will play bagpiper in the same tune of singer making the atmosphere very specia

सागसी ह्वेजावा  सागसी ह्वेजावा गौरी गणेश
सागसी ह्वेजावा गौरी गणेश ए s s s

गौरी गणेश गौरी गणेश विश्णु महेश
गौरी गणेश विश्णु महेश ए s s s

पैलि पूजा पैलि पूजा गणेश माराज
पैलि पूजा गणेश माराज ए
गणेश माराज गणेश माराज द्याला आशीष
गणेश माराज द्याला आशीष ए
ह्त्युं जोड़ीक ह्त्युं जोड़ीक सीस नवैक
ह्त्युं जोड़ीक सीस नवैक ए
केकेन बरमा जी केकेन बरमा जी गणेश बणयू च
केकेन बरमा जी गणेश बणयूँ च ए
गाई गोबरा को गाई गोबरा को गणेश बणयूँ  च
गाई गोबरा को गणेश बणयूँ  च ए
केकेन बरमा जी केकेन बरमा जी गणेश पुर्युं च
केकेन बरमा जी गणेश पुर्युं च
पिस्युं पीठ क पिस्युं पीठ कु गणेश पुर्युं च
पिस्युं पीठ कु गणेश पुर्युं च ए
कै घsर होलो  कै घsर होलो शंख शबद
कै घsर होलो शंख शबद ए
कै घsर होलो कै घsर होलो घांडी शबद
कै घsर होलो कै घsर होलो ए
पितर लोक पितर लोक तकम को लालो 
पितर लोक तकम  को  लालो ए
ऐजावा पितरो ऐ जावा पितरो मैं मात लोक
ऐ जावा पितरो मैं मात लोक ए
मै मात लोक, मैं मात लोक पाथ्युं कारिय
मैं  मात लोक पाथ्युं  कारिय ए
के केन बरमा जी गणेश पुजला केकेन बरमा जी
के केन बरमा जी गणेश पुजला ए
फुलून धूपुंन फुलून धूपुंन गणेश पुजला
फुलून धूपुंन गणेश पुजला ए
अखंड मोत्यूंन अखंड मोत्यूंन गणेश की पूजा
अखंड मोत्यूंन  गणेश की पूजा ए
कारा कारा बरमा जी कारा कारा बरमा जी भूमि की पूजा
कारा कारा बरमा जी भूमि की पूजा ए
भूमि की पूजा भूमि की पूजा सूर्य की पूजा
भूमि की पूजा सूर्य की पूजा ए
सूरया की पूजा सूरया की पूजा चंदरमा की पूजा
 सूरया की पूजा चंदरमा की पूजा  ए
कारा कारा बरमा जी कारा बरमा जी विष्णु की पूजा
विष्णु की पूजा विष्णु की पूजा ए
खोली द्यावा खोली द्यावा बरमा जी पोस्तु का वेद
खोली द्यावा बरमा जी पोस्तु का वेद  ए
तुमर वेदूंन तुमर वेदूंन जग उदंकार
तुमर  वेदूंन जग उदंकार

Copyright for commentary @
Bhishma Kukreti

Saturday, June 25, 2011

विलेन बनना चाहता है आज का आदमी

गढ़वाली लोक कलाकार रामरतन काला किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। उन्होंने बहुत से नुक्कड़ नाटकों और मंचीय कार्यक्रमों में भाग लिया। कई गढ़वाली फिल्मों और एलबमों में वह अभिनय का लोहा मनवा चुके हैं। स्यांणी, नौछमी नारेणा, सुर्मा सुरेला, हल्दी हात, तेरी जग्वाल, बसंत अगे आदि उनकी चर्चित एलबम हैं। उनसे बातचीत के अंश-

आपका बचपन कहां बीता और शिक्षा-दीक्षा कहां हुई?
मैं बचपन में बहुत शैतान था। पदमपुर, कोटद्वार में जन्म हुआ। यहीं बचपन बीता और शिक्षा-दीक्षा हुई। पिताजी आर्मी में थे। मुझे भी आर्मी में जाना ही था, लेकिन पता नहीं क्या कारण थे कि मैं फौजी की बजाए कलाकार बन गया। विद्यालय से ही कलाकार के लक्षण पैदा होने लगे थे। अध्यापक मानने लगे थे कि यह आर्टिस्ट है। विद्यार्थी जीवन में ही मैं स्टेबलिश आर्टिस्ट हो गया था। मैंने हास्य-व्यंग्य वाले गीत भी गाए हैं, लेकिन मूलरूप से मैं रंगकर्मी हूं। नाट्य विद्या का आदमी हूं।

Sunday, June 19, 2011

हल्दी कुटणो सगुनो गीत (हल्दी कूटते वक्त का मांगल्य गीत )

Haldi Kutano Saguno Geet : The Auspicious Song at the Time of Grinding Turmeric and other Bulbs-Tubers
( Garhwali Wedding Auspicious Folk Song (Mangal)

Presented on Internet medium by Bhishma Kukreti

Curtsey : Totaram Dhaundiyal ‘Jigyasu’ , Garhwali Mangal , 
There are all types of folk songs in Garhwal (India) barring sea shore related songs or abhorrence songs .
In auspicious ritual folk songs Haldi Hath (pasting turmeric on bride or groom)  songs are very important aspects of Garhwali (Indian) society.

Before one day of marriage procession , the paste of turmeric, herbs,  and other tubers as Majethi, silpada, jirhaldi, bach, Samay are painted on bride and groom at  Haldi Hath ceremony. The Haldi Kutno Saguno geet means the auspicious song at the time of grinding unripe bulbs (roots) of turmeric . the paste of various bulbs, tubers and herbs is made by grinding them in stone mortar .the job is done by five unmarried girls.  The following song is sung by professional Manglic singer of das caste and by women folks of the village

 The song  prays various deities as Bhumyal (The earth deity) , The protector deity, Brahma (creator) etc. In this song a very interesting instance to be noted that Crow is made the messenger to take the prayer to Brahma . the crow is also requested to speak auspicious language and wordings.


ब्वाला ब्वाला सगुनो ब्वालै
ब्वाला ब्वाला सगुनो ब्वालै s s  s s s

दैणा हुयाँ खोळी का गणेश ए  
दैणा हुयाँ खोळी का गणेश ए s s s s
दैणा हुयाँ मोरी का नारेणेए 
दैणा हुयाँ मोरी का नारेणेए  s s s s
दैणा हुयाँ पंचनाम दिवता ए
दैणा हुयाँ पंचनाम दिवता ए s s s
दैणा हुयाँ गाँव को भुम्या   ए
दैणा हुयाँ गाँव को भुम्या   ए s s  s

जोंकी भूमि होली उंकी होली रक्छा
जोंकी भूमि होली उंकी होली रक्छा s s s

दैणा हुयाँ  यो द्यो पितर  ए
दैणा हुयाँ  यो द्यो पितर  ए s s s
दैणा हुयाँ  यो घडी को लगन ए
दैणा हुयाँ  यो घडी को लगन ए s s s
दैणा हुयाँ  भूमि को भुम्याळ  ए
दैणा हुयाँ  भूमि को भुम्याळ  ए s s s

तुमारी थाती मा -मा कारिज उर्युंच ए
तुमारी थाती मा -मा कारिज उर्युंच ए s s s
यो कारिज तुमुं तैं सुफल कर्याँ ए
यो कारिज तुमुं तैं सुफल कर्याँ ए s s s

बैठी जा कागा हरिया बिरछ ए
बैठी जा कागा हरिया बिरछ ए s s s

बोल बोल कागा, बोल बोल कागा चौदिशुं सगुनो  ए
बोल बोल कागा चौदिशुं सगुनो  ए s s s
सगुनो बोलिलो, सगुनो बोलिलो बिघन टाळील़ो
सगुनो बोलिलो, बिघन टाळील़ो ए s s s

बोल मेरा कागा बोल , मेरा कागा सगुनो बचन ए
बोल मेरा कागा,  बोल मेरा कागा सगुनो बचन ए s s s

त्वै द्युंला कागा त्वै द्युंला कागा सोना ठुंटणि
त्वै द्युंला कागा त्वै द्युंला कागा सोना ठुंटणि  ए s s s
त्वै द्युंला कागा त्वै द्युंला कागा दूद भति पूड़ी
त्वै द्युंला कागा त्वै द्युंला कागा दूद भति पूड़ी ए s s s

बिचारा बरमा जी बिचारा बरमा तैं कागा बोली ए
बिचारा बरमा जी बिचारा बरमा तैं कागा बोली ए s s s
सगुनी कागा सगुनी कागा सगुनी च बोली
सगुनी कागा सगुनी कागा सगुनी च बोली s s s

ब्वाला ब्वालै सगुनो  ब्वालै ए
ब्वाला ब्वालै सगुनो  ब्वालै ए s s s


Regards
B. C. Kukreti

Tuesday, June 14, 2011

रणरौत : एक धार्मिक लोक जागर (गीत)

In Garhwal , people worship Ghosts, Bhoot by several ways and means . One way is to worship Brave family legends or community legends by arranging Mandan . In Mandan the Das play drums and sing the Jagar of particular Brave Soul or legends and Pashwas or people dance according to rhythm and song contents
RanRaut is very famous Legendary  Song of Rawat Community . As poem, the poem contains all raptures except Adhorence in ful sense . The readers will enjoy the figures of speeches, proverbs, and many old -new phrases


सिरीनगर रंद छयो राजा प्रीताम शाही
कुलावली कोट मा रंद रौतु औलाद
हिंवां रौत को छयो भिंवा  रौत
भिंवा रौत को छयो रणु रौत 
रणु रौत होलू मालू मा को माल
जैको डबराळया माथो छ , खंखराल्य़ा जोंखा
घूंडों पौंछदी  भुजा छन जोधा की
मुन्गर्याळी फीलि छन मेरा मरदो
माल मा दूण रांजड़ा ऐन
तौन कांगली सिरीनगर भेज्याली
रूखा रुखा बोल लेख्या तीखा लेख्या स्वाल 
बोला बोला मेरा कछडि का ज्वानू
मेरा राज पर कैन त यो धावा बोले
मेरा गढवाल मा कु इनु माल होलू
जु भैर का मालू तै जीतिक लालू
तबरेक उठीक बोलदू छीलू भिम्ल्या
यी तरैं  को माल होलू कुलवाली कोट
हिंवां रौत न तलवार मारे
रणु रौत मी तलवार मारलो
रणु रौत होलू तलवार्या जवान
जैका मारख्वल्य़ा छन बेला
जैका चौसिंग्या खाडू होला, खोळया होला कुत्ता
कुलवाली कोट को वो रणुरौत 
मेरो भाणजा मालू साधिक लालो
प्रीतम साही मराज तब कांगली लेखद
हे बुबा रणु रौत तू होल्यु बांको भड़
भात खाई तख हात धोई यख   
जामो पैरी तख तणि बाँधी यख  
कागली पौंचीगे रौत का पास
तब बांचद कांगली रौत
शेर  जसा मोछ छ्या रौत का
तैका मणि का मान धड़कन लै गेन
तैकू हात की मुसळी बबल़ाण लै गेन
कंड़ीळ  बंश का कांडो जजराँद
 निरकुलो पाणि डाली सि हिरांद
तब धाई लगान्द रणु राणी भिमला
मै त जान्दो राणी सैणि माल दूण    
मेरा वास्ता पकौ निरपाणि खीर
 राणी भिमला तब कुमजुल्या ह्व़ेगे
नई नई मया छे ऊंकी जवानी की ,
नयो नयो ब्यो छो
राणी भीमला ड़ाळी सि अळस्येगे
छोड़दी पयणा नेतर रांग सा बुंद
मै जोडिक स्वामी तुम जुद्ध को  पैटयां
सुमरदो तब रौत देवी झाली माली
ढेबरा लुक्दा बखरा लुक्दा
मर्द कबि नि रुकदा शेर कबि नि डरदा
लुवा  जंगी जामा पैरण लैग्या
सैणा सिरीनगर ऐ गे रणु
जैदेऊ माल्यान गरदनी मालिक
हे रौर आज जैदेऊ त्वेक च  बुबा
तू छे  मेरा रणु मालू मा को माल
त्वेन मारणान  ल्वे चटा माल
राजा क आज्ञा लेक रौत चलीगे
माल को दूण कुई माल बोदा
ये त ऐ चखुनी  चूंडला आंगुळी मारला
तब छेत्रो को हंकार चढ़े रौत
मारे तैंन मछुली सी उफाट
छोड़े उडाल तलवार
तैंन मुंडू का चौंरा लगै न
तैंन  खूनन घट रिंगेन मरदो
तै माई मरदु  का चेलान मरदो
सि  केल़ा सि कचेन गिदुडु सि फाडिन 
बैरी को नौ रखे ऋणना 


For Part II , Please refer Dr Govind Chatak , Gahdwal Ki Lok Kathayen pg 209
Or Dr Shivanand Nautiyal, garhwal ke Loknrity Geet , pg 171
Copyright @ Bhishma Kukreti, bckukreti@gmail.com

Monday, June 06, 2011

कैंतुरा रणभूत जागर

होलू कालू भंडारी मालू मा कु माल
अनं का कोठारा छया वैका , बसती का भंडारा
गाडू घटडे छई , धारु मरूडे
धनमातो छौ , छौ अन्न्मातो
जीवनमातो छौ कालू स्यौ भंडारी
आदि रात मा तै  सुपिनो होयो
सुपिना मा देखी विनी स्या ध्यानमाला 
देखी वैन बरफानी कांठा
बरफानी कांठा देखे ध्यानमाला को डेरा
चांदी का सेज देखे , सोना का फूल
आग जसी आँख  देखी , जिया जसी जोत
बाण सी अरेंडी देखी , दई सि तरेंडी
नौंण  सी गळखी देखी , फूल सि कुठखी
 हिया सूरज देखे , पीठ मा चंदरमा
मुखडी को हास  देखे , मणियों का परकास
कुमाळी  सि ठाण देखे , सोवन की लटा
तब चचडैक  उठे , भिभडैक  बैठे
तब जिया बोदे क्या  ह्वेलो मेरा त्वाई
आज को सुपिनो जिया , बोलणि आंदो 
ना ल़े बेटा कालू सुपिना को बामो
सुपिना मा मा बेटा , क्या नि देखेंदु
कख नि जयेन्दु , क्या नि खायेंदु
मैन ज्यूण मरणा जिया हिन्वाला ह्वेक औण
तख रौंद माता, वा बांद ध्यानमाला
कालू भंडारी मोनीन मोयाले
तब पैटी गे वो तै नवलीगढ़
भैर को रखो छौ कालू भीतर को भूखो
कथी समजाई जियान वो
चली आयो वो ध्यानमाला को गढ़
ध्यान माला औणी छै पाणी का पन्द्यारा
देखी  औंद कालू  भंडारीन वो
हे मेरा प्रभू वा बिजली कखन छूटे
सुपिना मा देखी छै जनी , तनी छा  नौनि या
आन्छरी सि सच्ची , सरप की सि बची
अर देखे ध्यानमालान कालू भंडारी वो
बांको जावन छौ वो बुरांस को सी फूल
तू मेरी जिकुड़ी छे बांकी ध्यानमाला
त्वे मा मेरो ज्यू छ
सुपिनो मा देखी तू तब यख आयूँ
आज तू मै तैं  प्रेम की भीख दे
तब ल्ही गे वो ध्यानमाला  अपडो दगड
कुछ दिन इनि रेन वो गुप्ती रूप मा
तब बोल्दो कालू भंडारी
कब तैं रौण रौतेली इनु लूकी लूकिक
तब ध्यानमाला का बुबा धरम देव
 कालू भंडारी मिलण ऐगे
सुण सूण धर्मदेव धरमदेव
मै आया डांडा टपीक, गाडू बौगीक
मैं जिउण   मोरण राजा
तेरी नौनि ध्यानमाला ल़ाण
ऐलान्दो बैलोंदो तब राजा धरमदेव
मेरा राज मा अयाँ होला
हैंका राज से पांच भड
साधी लौलो ऊँ तैं जु कालू भंडारी
ब्यावोलो त्वे ध्यानमाला
कालू भंडारी का जोंगा बबरैन
वैका छाती का बाळ जजरैन
उठाए वैन तब नंगी शमशीर
चली गये हैंका हैर भड़ू साधण
इतना मा गंगाडी हाट का रूपु
आयो ध्यानमाला हाथ मांगण
ब्यौ को दिन तब नीछे    ह्व़े गये
पकोड़ा पकीन, हल्दी रंगीन
नवलीगढ़ मा कनो उच्छौ छायो
कालू भंडारी लड़दू रेगे भड़ू  सात
तै के कानू मा खबर नी पौंची
पिता की मर्जी , अपणी नी छें वींकी
बरांडी छे किरांदी छे वा नौनि ध्यानमाला
तब सुमरिण करदी वा कालू भंडारी
तेरी मेरी प्रीत दूजा जनम ताई
किस्मत फूटे मेरी बिधाता
जोड़ी को मलेऊ फंट्याओ  
तब देखे वैन ध्यानमाला रोणी बराणी
जाणि याले वैन होई गे कुछ ख्ट्गो
रौड़दो -दौड्दो आयो माला का भौन
हे मेरी माला क्या सोची छै मैन
अर क्या करी गये दैव
कालू भंडारी , हे कालू भंडारी
मेरा पराणु को प्यारो होलो कालू भंडारी
मेरा सब कुछ तू छ मैं छौं तेरी नारी
देखे वीं कालू भंडारी क्वांसी आन्ख्युन
हात बुर्याँ छा वैका , खुटा छा फुक्यां
कांडो सि होयुं छौ वो सुकीक
मेरा बाबा यें कतना तरास सहे
गला लगाये वीन तब कालू भंडारी
मरण जिउण ही जाण
तब बोल्दु कालू भंडारी
तेरी माया ध्यानमाला मैकू सोराग समान
कु जाणो क्या होंद बिधाता को लेख
पर मैं औंलू ब्योऊ का दिन
तू मेरी माला आखिरें फेरा ना फेरी
तब वखन चलिगे वो कालू भंडारी
कुछ दिन बाद आये ब्यो का दिन
गंगाडी हाट मा तब बारात सजे
ब्यौ का ढोल दमौं घारू गाडू गजीन
नवलीगढ़ राज मा भी बजदे बडई
मंगल स्नान होंदु माला लैरंदी पैरंदी
धार मा की गैणा सि दिखेंदी माला
बोलदी तब वींको जिया मुलमुल हंसी
ध्यानमाला होली राजौं का लेख
गंगाडीहाट का रूपु गंगसारा की
तब नवलिगढ़ बारात चढ़े
मंगल पिठाई हुए षटरस भोजन
तब ब्यौ को लग्न आये , फेरों का बगत
छै फेरा फेरीं मालान , सातों नी फेरे
मै अपण गुरु देखण देवा
तबरेक ऐयीगे तख साधू एक
कालू भंडारी छ कालू भंडारी
पछाणी मुखडी वैकी मालान
वींको आंख्यी मा तब आस खिलगे
प्रफुल ह्व़े गे तब वा ध्यानमाला
मेरा गुरुआ होला तलवारी नाच का गुरु
मै देखणु चांदु जरा नाच ऊंको
तब गुरु स्सधू बेदी का ध्वार आइगे
नंगी शमशीर चमकाई वैन
एक फरकणा फुन्ड़ो मारी एक मारी उन्डो
पिंडालू सि काटिन वैन गोद्डा सी फाडींन
कुछ भागिन , कुछ मारे गेन
मारये गे वू रूपु गन्गसारो भी
तब बल मु ध्यानमाला ही छुटी गये
लौट आन्दु तब वीमुं कालू भंडारी
ओ मेरी माला आज जनम सुफल ह्व़े गे
अगास की ज़ोन पायी मैं फूलूं की सि डाळी
तब जिकुड़ा लगैले हातून मा धरिले वा
आज मेरो मन क मुराद पुरी होए
तबरे लुक्युं उठै रूपु का भाई
लूला गंगोला वैकु नाम छायो
मारी दिने वैन कालू भंडारी धोखा मा
रोये बराए तब राणी ध्यानमाला
पटके जन उखड़ सि माछी
मैं क तैं पायूँ सुहाग हरचे
मैंक तैं मांगी भीख खतेणे
कं मैकू तैं दैव रूठे
रखे दैणी जंगा पर वीन कालू को सिर
बाएँ जंग पर धरे वो रूपु गंगसारी
रोंदी बरांदी चढ़े चिता ऐंच
सती होई गे तब ध्यानमाला

References:
Shambhu Prasad Bahuguna in Virat Hriday
Dr Govind Chatak : Garhwali Lok gathayen
Dr Shiva Nand Nautiyal Garhwal ke Lok Nrity Geet
Copyright Bhishma Kukreti for commentarty

Monday, May 02, 2011

उत्तराखण्ड : ऐतिहासिक घटनायें

१७२४: कुमाऊं रेजिमेंट की स्थापना.
१८१५: पवांर नरेश द्वारा टिहरी की स्थापना.
१८१६: सिंगोली संधि के अनुसार आधा गढ़वाल अंग्रेजों को दिया गया.
१८३४: अंग्रेज अधिकारी ट्रेल ने हल्द्वानी नगर बसाया.
१८४०: देहरादून में चाय के बगान का प्रारम्भ.
१८४१: नैनीताल नगर की खोज.
१८४७: रूड़की इन्जीनियरिंग कालेज की स्थापना.
१८५०: नैनीताल में प्रथम मिशनरी स्कूल खुला.
१८५२: रूड़की मे सैनिक छावनी का निर्माण.
१८५४: रूड़की गंग नहर में सिंचाई हेतु जल छोडा गया.
१८५७: टिहरी नरेश सुदर्शन शाह ने काशी बिश्वनाथ मंदिर का जीर्णोंद्धार किया गया.
१८६० : देहरादून में अशोक शिलालेख की खोज. ओर नैनीताल बनी ग्रीष्मकालीन राजधानी.
१८६१ : देहरादून, सर्वे आफ़ इंडिया की स्थापना.
१८६५ : देहरादून में तार सेवा प्रारम्भ.
१८७४ : अल्मोडा नगर में पेयजल ब्यवस्था का प्रारम्भ.
१८७७ : महाराजा द्वारा प्रतापनगर की स्थापना.
१८७८ : गढ़वाल के बीर सैनिक बलभद्र सिंह को ’आर्डर आफ़ मेरिट’ प्रदान किया गया.
१८८७ : लैन्सडाउन में गढवाल राइफ़ल रेजिमेंट का गठन.
१८८८ : नैनीताल में सेंट जोजेफ़ कालेज की स्थापना.
१८९१ : हरिद्वार - देहरादून रेल मार्ग का निर्माण.
१८९४ : गोहना ताल टूटने से श्रीनगर में क्षति.
१८९६ : महाराजा कीर्ति शाह ने कीर्तिनगर का निर्माण.
१८९७ : कोटद्वार - नजीबाबाद रेल सेवा प्रारम्भ.
१८९९ : काठगोदाम रेलसेवा से जुडा.
१९०० : हरिद्वार - देहरादून रेलसेवा प्रारम्भ.
१९०३ : टिहरी नगर में बिद्युत ब्यवस्था.
१९०५ : देहरादून एयरफ़ोर्स आफ़िस में एक्स-रे संस्थान की स्थापना.
१९१२ : भवाली में क्षय रोग अस्पताल की स्थापना और मंसूरी में बिद्युत योजना.
१९१४ : गढवाली बीर, दरवान सिंह नेगी को बिक्टोरिया क्रास प्रदान किया गया.
१९१८ : सेठ सूरजमल द्वारा ऋषिकेश में ’लक्षमण झूला’ का निर्माण.
१९२२ : गढवाल राइफ़ल्स को ’रायल’ से सम्मानित किया गया और नैनीताल बिद्युत प्रकाश में नहाया.
१९२६ : हेमकुन्ट साहब की खोज.
१९३० : चन्द्रशेखर आजाद का दुगड्डा में अपने साथियों के साथ शस्त्र प्रशिक्षण हेतु आगमन और देहरादून में नमक सत्याग्रह और मंसूरी मोटर मार्ग प्रारम्भ.
१९३२ : देहरादून मे "इंडियन मिलिटरी एकेडमी" की स्थापना.
१९३५ : ऋषिकेश - देवप्रायाग मोटर मार्ग का निर्माण.
१९३८ : हरिद्वार - गोचर हवाई यात्रा ’हिमालयन एयरवेज कम्पनी’ ने शुरू की.
१९४२ : ७वीं गढवाल रेजिमेंट की स्थापना.
१९४५ : हैदराबाद रेजिमेंट का नाम बदलकर "कुमाऊं रेजिमेंट" रखा गया.
१९४६ : डी. ए. वी. कालेज देहरादून में कक्षाएं शुरू हुई.
१९४८ : रूडकी इन्जीनियरिंग कालेज - विश्वविद्यालय में रूपांतरित किया गया.
१९४९ : टिहरी रियासत का उ.प्र. में बिलय और अल्मोडा कालेज की स्थापना.
१९५३ : बंगाल सैपर्स की स्थापना रूड़की में की गई.
१९५४ : हैली नेशनल पार्क का नाम बदलकर जिम कार्बेट नेशनल पार्क रखा गया.
१९५८ : मंसूरी में डिग्री कालेज की स्थापना.
१९६० : पंतनगर में कृषि एवम प्राद्यौगिकी विश्वबिद्यालय की आधारशिला रखी गई.
१९७३ : गढवाल एवम कुमांऊ विश्वबिद्यालय की घोषणा की गई.
१९७५ : देहरादून प्रशाशनिक रूप से गढ़वाल में सम्मिल्लित किया गया.
१९८२ : चमोली जनपद में ८७ कि.मी. में फ़ैली फ़ूलों की घाटी को राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया.
१९८६ : पिथौरगढ जनपद के ६०० वर्ग कि.मी. में फ़ैले अस्कोट वन्य जीव बिहार की घोषणा की गई.
१९८७ : पौडी गढ़वाल में ३०१ वर्ग कि.मी. में फ़ैले सोना-चांदी वन्य जीव बिहार की घोषणा की गई.
१९८८ : अल्मोडा बनभूमि के क्षेत्र बिनसर वन्य जीव बिहार की घोषणा की गई.
१९९१ : २० अक्तूबर को भूकम्प में १५०० ब्यक्तियों की मौत.
१९९२ : उत्तरकाशी में गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान तथा गोविंद राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना.
१९९४ : उत्तराखण्ड प्रथक राज्य के मांग - खटीमा में गोली चली. अनेक ब्यक्तियों की मौत और मुजफ़्फ़रनगर काण्ड.
१९९५ : श्रीनगर में आंदोलनकारियों पर गोली चली.
१९९६ : रूद्रप्रयाग, चम्पावत, बागेश्वर व उधमसिंह नगर, चार नये जनपद बनाये गये.
१९९९ : चमोली में भूकम्प. ११० ब्यक्तियों की मौत.
२००० : ९ नबम्बर - उत्तरांचल राज्य की स्थापना हुई.

साभार

Monday, April 25, 2011

नदी क्यों सिखाया मुझे

नदी !
तुने क्यों सिखा दिया मुझे
अपनी तरह बहने का पाठ
सब कुछ बहाने की आदत

क्यों ? प्रश्रय दिया
पहाड़ों से निकल
मैदानों में समतल होने को
अब, उतर आने के बाद

क्यों नहीं सिखा सकी
कहीं पत्थरों, गंगल्वाड़ों की ओट में
ठहरने का हुनर
हां
मुझे सिखाने से पहले भी तो
बन सकते थे बांध
जहां ठहरकर मैं वापस लौटता
चिन्यालीसौड़ या पीछे तक

समतल में तो तेरी तरह
गंदला गया हूं
न अर्घ्य के और न आचमन लायक

नदी !
मैं अपने दोष
मढ़ रहा हूं तुझ पर
क्योंकि, जी हलका करना है
यद्यपि
तुने तो सिर्फ
रास्ता भर दिखाया था
सच ही तो है कि
सिखने का उतावलापन तो
मेरा ही था

सर्वाधिकार- धनेश कोठारी

Saturday, March 26, 2011

जायें तो जायें कहां

जिस जंगल के रिश्ते से आदि-मानव अपनी गाथा लिखते आया है, वो जंगल आज उदास है. उसके अपने ही रैन-बसेरे से आज वन्य-जीव आबादी की ओर तेजी से रुख करने लगे हैं. वो खाली है, दरसल उसने हमसे जितना लिया उससे ज्यादा हमें लौटा दिया. लेन-देन के इस रिश्ते में हम आज उसे धोखा दिये जा रहे है, हमें आज भी उससे सब कुछ की उम्मीद है लेकिन हाशिल जब हमने ही सिफ़र कर दिया हो तो जंगल बेचारा क्या करे-? हाथी हो या गुलदार वो जंगल से निकल कर आबादी की ओर क्यों बढ रहा है, ये एक बडा सवाल है.

बदलौअ

जंगळ् बाघूं कु
अब जंगळ् ह्वेगेन
जब बिटि जंगळ् हम खुणि
पर्यटक स्थल ह्वेगेन

बंदुक लेक हम जंगळ् गयां
बाग/गौं मा ऐगे
हम घ्वीड़-काखड़ मारिक लयां
त वु/दुधेळ् नौन्याळ् लिगे

वेन् कबि हमरु नौ नि धर्रि
हमुन त वे मनस्वाग बांचि

बाबु-दादै जागिर कु हक त
सोरा-भारों मा बटेंद
हम त
वेका सोरा-भारा बि नि
वेका हक पर
हमरि धाकना किलै

जब बि
कखि ओडा सर्कयेंदन्
लुछेंदि आजादी त
जल्मदू वर्ग संघर्ष

हमरि देल्यों मा
बाघै घात
वर्ग संघर्ष से उपज्यूं
बस्स
हमरु ही स्वाळ्-द्वारु च

सौजन्य-- ज्यूंदाळ (गढ़वाली कविता सग्रह)
Copyright@ Dhanesh Kothari

Tuesday, March 22, 2011

‘लोक’ संग ‘पॉप’ का फ्यूजन अंदाज है ‘हे रमिए’

इसे लोकगीतों की ही तासीर कहेंगे कि उन्हें जब भी सुना/गुनगुनाया जाय वे भरपूर ताजगी का अहसास कराते हैं। इसलिए भी कि वे हमारे मर्म, प्रेम द्वन्द और खुशी से उपजते हैं। युवा गायक रजनीकांत सेमवाल ने बाजार के रूझान से बेपरवाह होकर विस्मृति की हद तक पहुंचे ‘लोक’ को आवाज दी है। जिसका परिणाम है उनकी ‘टिकुलिया मामा’ व ‘हे रमिए’ संकलन। जिनमें हमारा ही समाज अपने ‘पहाड़ीपन’ की बेलाग पहचान के साथ गहरे तक जुड़ा हुआ है।
रामा कैसेटस् की हालिया प्रस्तुति ‘हे रमिए’ में रजनीकांत सेमवाल लोकजीवन के भीतर तक पहुंचकर एक बार फिर लाते हैं ‘पोस्तु का छुम्मा’ को। जिसे दो दशक पहले हमने लोकगायक कमलनयन डबराल के स्वरों के साथ ठेठ जौनपुरी अंदाज में सुना था।

Wednesday, March 02, 2011

उदास न हो

आज अबि उदास न हो
भोळ त्‌ अबि औण च
आस न तोड़ मन न झुरौ
पाळान्‌ त्‌ उबौण ई च

Tuesday, February 08, 2011

वेलेन्टाइन

हे वीं
तू बि अदान छैं
त्वेखुणि बि
क्य ब्वन्न
हैप्पी वेलेन्टाइन!!

Copyright@ Dhanesh Kothari

Wednesday, January 26, 2011

रैबार

सम्मान

नगरपालिका परिषद ऋषिकेश

द्वारा साहित्य के लिए समर्पित

स्व. डा. पार्थ सारथि (डबराल) सम्मान

26 जनबरी 2011


Friday, January 21, 2011

गैरसैंण जनता खुणि चुसणा च

जब बिटेन उत्तराखंड अन्दोलनै पवाण लग अर राज्यौ राजधनी छ्वीं लगी होली त गैरसैंण कु इ नाम गणेंगे। गैरसैंण राजधानी त नि बौण सौक। पण, कथगों खुणि गैरसैंण भौत कुछ च। म्यार दिखण मा त हैंको जलम तक गैरसैंण सब्युं खुणि कुछ ना कुछ त रालों इ।
उत्तराखंड क्रान्ति दलौ (उक्रांद) कुण त गैरसैंण बिजणै दवा च, दारु च, इंजेक्सन च। गैरसैंण उक्रान्दौ आँख उफर्ने पाणि छींटा च, गैरसैंण उक्रान्दौ की निंद बर्र से बिजाळणे बान कंडाल़ो झुप्पा च, घच्का च। कत्ति त बुल्दन बल गैरसैंण आईसीयू च। ज्यूंद रौणे एकी दवा च। गैरसैंण नामै या दवा नि ह्वाऊ त उक्रांद कि कै दिन डंड़ोळी सजी जांदी। गैरसैंण उक्राँदै खुणि कृत्रिम सांसौ बान ऑक्सीजन च। दिवाकर भट्ट जन  नेता कुण गैरसैंण अपण दगड्या, अपण बोटरूं,  जनता, तै बेळमाणो ढोल च, दमौ च, मुसक्बाज च। दिवाकर भट्ट जन नेतौं कुण सब्युं तैं बेवकूफ बणाणो माध्यम च गैरसैंण।

न्युतो

दगड्यों!
पैथ्राक दस सालों बटि नामी-गिरामी चिट्ठी-पतरी(गढ़वळी पत्रिका) कि गढ़वळी भाषै बढ़ोत्तरी मा भौत बड़ी मिळवाक च। यीं पतड़ीन्‌ गढ़वळी साहित्य संबन्धी कथगा इ ख़ास सोळी(विशेषांक) छापिन्‌। जनकि लोकगीत, लोककथा, स्वांग(नाटक), अबोधबंधु बहुगुणा, कन्हैयालाल डंडरियाल, भजनसिंह ’सिंह’, नामी स्वांग लिखनेर(लिख्वार) ललितमोहन थपलियाळ पर खास सोळी (विशेषांक) उल्लेखनीय छन। पत्रिका कू एक हौर पीठ थप थप्यौण्या पर्‌यास गढ़वळी कविता पर खास सोळी च। जैं सोळी मा १२३ कवियुं कि १४३ कविता छपेन्‌। दगड़ मा एक भौत बड़ी किताब बि छप्याणि च जख मा सन १७०० से लेकी २०११ तक का हरेक कवि की कविता त छपेली ई दगड़ मा गढ़वळी कविता कू पुराण इतियास बि शामिल होलू।

Friday, January 14, 2011

गढवाल में मकरैण (मकर संक्रांति) और गेंद का मेला

गंगासलाण याने लंगूर, ढांगु, डबरालस्युं, उदयपुर, अजमेर में मकरसंक्रांति का कुछ अधिक ही महत्व है। सेख या पूस के मासांत के दिन इस क्षेत्र में दोपहर से पहले कई गाँव वाले मिलकर एक स्थान पर हिंगोड़ खेलते हैं। हिंगोड़ हॉकी जैसा खेल है। खेल में बांस कि हॉकी जैसी स्टिक होती है तो गेंद कपड़े कि होती है। मेले के स्थान पर मेला अपने आप उमड़ जाता है। क्योंकि सैकड़ो लोग इसमें भाग लेते हैं। शाम को हथगिंदी (चमड़े की) की क्षेत्रीय प्रतियोगिता होती है और यह हथगिंदी का खेल रात तक चलता है हथगिंदी कुछ-कुछ रग्बी जैसा होता है। पूर्व में हर पट्टी में दसेक जगह ऐसे मेले सेख के दिन होते थे। सेख की रात को लोग स्वाळ पकोड़ी बनाते हैं और इसी के साथ मकर संक्रांति की शुरुआत हो जाती है। मकर संक्रांति की सुबह भी स्वाळ पकोड़ी बनाये जाते हैं। दिन में खिचड़ी बनाई जाती है व तिल गुड़ भी खाया जाता है। इस दिन स्नान का भी महत्व है।

Wednesday, January 12, 2011

क्या नपुंसकों की फ़ौज गढ़वाली साहित्य रच रही है ?

जो जीवविज्ञान की थोड़ी बहुत जानकारी रखते हैं वे जानते हैं कि, जीव-जंतुओं में पुरुष कि भूमिका एकांस ही होती है, और वास्तव में पुरुष सभी बनस्पतियों, जानवरों व मनुष्यों में नपुंसक के निकटतम होता है। एक पुरुष व सोलह हजार स्त्रियों से मानव सभ्यता आगे बढ़ सकती है। किन्तु दस स्त्रियाँ व हजार पुरुष से मानव सभ्यता आगे नहीं बढ़ सकती है। पुरुष वास्तव में नपुंसक ही होता है, और यही कारण है कि, उसने अपनी नपुंसकता छुपाने हेतु अहम का सहारा लिया और देश, धर्म(पंथ), जातीय, रंगों, प्रान्त, जिला, भाषाई रेखाओं से मनुष्य को बाँट दिया है। यदि हम आधुनिक गढ़वाली साहित्य कि बात करें तो पायेंगे कि आधुनिक साहित्य गढ़वाली समाज को किंचित भी प्रभावित नहीं कर पाया है। गढ़वालियों को आधुनिक साहित्य की आवश्यकता ही नहीं पड़ रही है। तो इसका एक मुख्य करण साहित्यकार ही है। जो ऐसा साहित्य सर्जन ही नहीं कर पाया की गढ़वाल में बसने वाले और प्रवासी गढ़वाली उस साहित्य को पढने को मजबूर हो जाय। वास्तव में यदि हम मूल में जाएँ तो पाएंगे कि गढवाली साहित्य रचनाकारों ने पौरुषीय रचनायें पाठकों को दी और पौरुषीय रचना हमेशा ही नपुंसकता के निकट ही होती है। एक उदारहण ले लीजिये कि जब गढ़वाल में "ए ज्योरू मीन दिल्ली जाण" जैसा लोकगीत जनमानस में बैठ रहा था। तो हमारे गढ़वाली भाषा के साहित्यकार पलायन कि विभीषिका का रोना रो रहे थे। "ए ज्योरू मीन दिल्ली जाण" का रचनाकार स्त्री या शिल्पकार थे। जोकि जनमानस को समझते थे। किन्तु उस समय के गढवाली साहित्यकार उलटी गंगा बहा रहे थे।

स्व. कन्हैयालाल डंडरियाल जी को महाकवि का दर्जा दिया गया है। यदि उनके साहित्य को ठीक से पढ़ा जाय तो पाएंगे कि जिस साहित्य कि रचना उन्होंने स्त्रेन्य अंतर्मन से लिखा वह कालजयी है। किन्तु जो डंडरियाल जी ने पौरुषीय अंतर्मन से लिखा वह कालजय नहीं है। तुलसीदास, सूरदास को यदि सामान्य जन पढ़ता है या गुनता है तो उसका मुख्य कारण है कि उन्होंने स्त्रेन्य अंतर्मन से साहित्य रचा। बलदेव प्रसाद शर्मा ’दीन’ जी क़ी "रामी बौराणी" या जीतसिंह नेगी जी कि "तू होली बीरा" गीतों का आज लोकगीतों में सुमार होता है तो उसका एकमेव कारण है कि, ये गीत स्त्रेन्य अंतर्मन से लिखे गए हैं।

नरेन्द्र सिंह नेगी के वही गीत प्रसिद्ध हुए जिन्हें उन्होंने स्त्रेन्य अंतर्मन से रचा। जो भी गीत नेगी ने पौरुषीय अंतर्मन से रचे /गाये वे कम प्रसिद्ध हुए। उसका मुख्य कारण है कि, पौरुषीय अंतर्मन नपुन्सकीय ही होता है। जहाँ अभिमान आ जाता है वह पौरुषीय नहीं नपुंसकीय ही होता है। जहाँ गढ़वाल में "मैकू पाड़ नि दीण पिताजी" जैसे लोकगीत स्त्रियाँ या शिल्पकार रच रहे थे। वहीं हमारे साहित्यकार अहम के वशीभूत पहाड़ प्रेम आदि के गीत/कविता रच रहे थे। स्त्री अन्तर्मन से न रची जाने वाल़ी रचनायें जनमानस को उद्वेलित कर ही नहीं सकती हैं।

गढ़वाली में दसियों महिला साहित्यकार हुए हैं। किन्तु उन्होंने भी पौरुषीय अंतर्मन से गढ़वाली में रचनाये रचीं और वे भी गढ़वाली जनमानस को उद्वेलित कर पाने सर्वथा विफल रही हैं। मेरा मानना है कि जब तक आधुनिक गढ़वाली साहित्य लोक साहित्य को जनमानस से दूर करने में सफल नहीं होगा तब तक यह साहित्य पढ़ा ही नहीं जाएगा। इसके लिए रचनाकारों में स्त्री/ हरिजन/ शिल्पकार अंतर्मन होना आवश्यक है। न कि पौरुषीय अंतर्मन या नपुंसकीय अंतर्मन। स्त्रीय/ हरिजन/ शिल्पकार अंतर्मन जनमानस की सही भावनाओं को पहचानने में पूरा कामयाब होता है। किन्तु पौरुषीय अंतर्मन (जो कि वास्तव में नपुंसक ही होता है) जनमानस की भावनाओं को पहचानना तो दूर जन भावनाओं कि अवहेलना ही करता है।

जब कोई भी किसी भी प्रकार की रचना स्त्रेन्य अंतर्मन से रची जाय वह रचना पाठकों में ऊर्जा संप्रेषण करने में सफल होती है। वह रचना संभावनाओं को जन्म देती है। अतः गढ़वाली साहित्यकारों को चाहिए की अपनी स्त्रेन्य/ शिल्पकारी/ हरिजनी अंतर्मन की तलाश करें और उसी अंतर्मन से रचना रचें। हमारे गढ़वाली साहित्यकारों को ध्यान देना चाहिए कि सैकड़ों सालों से पंडित श्लोको से पूजा करते आये हैं और जनमानस इस साहित्य से किंचित भी प्रभावित नहीं हुआ। किन्तु शिल्पकारों/ हरिजनों/ दासों/ बादी/ ड़ळयों (जो बिट्ट नहीं थे) क़ी रचनाओं को जनमानस सहज ही अपनाता आया है। उसका एक ही कारण है, पंडिताई साहित्य पौरुषीय साहित्य है। किन्तु शिल्पकारों/ बादियों/ ड़लयों/ दासों का साहित्य स्त्रेन्य अंतर्मन से रचा गया है।

भीष्म कुकरेती

टिहरी बादशाहत का आखिरी दिन

      टिहरी आज भले ही अपने भूगोल के साथ उन तमाम किस्सों को भी जलमग्न कर समाधिस्थ हो चुकी है। जिनमें टिहरी रियासत की क्रुर सत्ता की दास्तानें भी शामिल थीं। जिनमें राजाको जिंदा रखने के लिए दमन की कई कहानियां बुनी और गढ़ी गई। वहीं जिंदादिल अवाम का जनसंघर्ष भी जिसने भारतीय आजादी के 148 दिन बाद ही बादशाहत को टिहरी से खदेड़ दिया था। इतिहास गवाह है भड़इसी माटी में जन्में थे।
टिहरी की आजादी के अतीत में 30 मई 1930 के दिन तिलाड़ी (बड़कोट) में वनों से जुड़े हकूकों को संघर्षरत हजारों किसानों पर राजा की गोलियां चली तो जलियांवाला बाग की यादें ताजा हो उठी। इसी वक्त टिहरी की मासूम जनता में तीखा आक्रोश फैला और राज्य में सत्याग्रही संघर्ष का अभ्युदय हुआ। जिसकी बदौलत जनतांत्रिक मूल्यों की नींव पर प्रजामण्डल की स्थापना हुई और पहला नेतृत्व जनसंघर्षों से जन्में युवा श्रीदेव सुमन को मिला। यह राजतंत्र के जुल्मों के खिलाफ समान्तर खड़े होने जैसा ही था। हालांकि, राजा की क्रूरता ने 25 जुलाई 1944 के दिन सुमन की जान ले ली थी। 84 दिनों की ऐतिहासिक भूख हड़तालके बाद क्रांतिकारी श्रीदेव सुमन बेड़ियोंसे हमेशा के लिए रिहा हो गये। जनसंघर्ष यहां भी न रुका। तब तक अवाम लोकशाही व राजशाही के फर्क को जान चुकी थी। फिर जुल्मों से जन्मीं जनक्रांति का झण्डा कामरेड नागेन्द्र सकलानी ने संभाला। यह नागेन्द्र और साथियों का ही मादा था कि, उन्होंने आखिरी सांसों तक 1200 साला हकूमत से टिहरी को रिहाई दिलाई।
सामन्ती जंक-जोड़ को पिघलाने वाले इस जांबाज का जन्म टिहरी की सकलाना पट्टी के पुजारगांव में हुआ था। 16 की उम्र में ही सामाजिक सरोकारों को समझने वाला नागेन्द्र सक्रिय साम्यवादी कार्यकर्ता बन चुका था। इसी बीच रियासत अकाल के दैवीय प्रकोप से गुजरी तो राजकोष को पोषित करने व आयस्रोतों की मजबूती के लिए भू-व्यवस्था एंव पुनरीक्षण के नाम पर जनता को ढेरों करों से लाद दिया गया। नागेन्द्र ने गांव-गांव अलख जगा आंदोलन को धार दी। इसी दौर में उनकी कार्यशैली व वैचारिकता के करीब एक और योद्धा दादा दौलतराम भी उनके हमकदम हुए। नतीजा, राजा का बंदोबस्त कानून क्रियान्वित नहीं हो सका।
राजशाही से क्षुब्ध लोगों ने सकलानी व दौलतराम की अगुवाई में लामगद्ध होकर कड़ाकोट (डांगचौरा) से बगावत का श्रीगणेश किया। और करों का भुगतान न करने का ऐलान कर डाला। किसानों व राजशाही फौज के बीच संघर्ष का दौर चला। नागेन्द्र को राजद्रोह में 12 साल की सजा सुनाई गई। जिसे ठुकरा सुमन के नक्शेकदम पर चलते हुए नागेन्द्र ने 10 फरवरी 1947 से आमरण अनशन शुरू किया। मजबूरन राजा को अनचाही हार स्वीकारते हुए सकलानी को साथियों सहित रिहा करना पड़ा। राजा जानता था कि सुमन के बाद सकलानी की शहादत अंजाम क्या हो सकता है। तभी जनता ने वनाधिकार कानून संशोधन, बराबेगार, पौंणटोंटी जैसी कराधान व्यवस्था को समाप्त करने की मांग की। मगर राजा ने इसे अनसुना कर दिया। इसी दौर में प्रजामण्डल को राज्य से मान्यता मिली। पहले अधिवेशन में कम्युनिस्टों के साथ अन्य वैचारिक धाराओं ने भी शिरकत की। यह अधिवेशन आजादी के मतवालों के लिए संजीवनी साबित हुआ।
सकलाना की जनता ने स्कूलों, सड़कों, चिकित्सालयों की मौलिक मांगों के साथ ही राजस्व अदायगी को भी रोक डाला। विद्रोह को दबाने के लिए विशेष जज के साथ फौज सकलाना पहुंची। यहां उत्पीड़न और घरों की नीलामी के साथ निर्दोंष जेलों में ठूंस जाने लगे। ऐसे में राजतंत्रीय दमन की ढाल को सत्याग्रहियों की भर्ती शुरू हुई। मुआफीदारों ने आजाद पंचायत की स्थापना की तो इसका असर कीर्तिनगर परगना तक हुआ। क्रांति के इस बढ़ते दौर में बडियार में भी आजाद पंचायत की स्थापना हुई।
10 जनवरी 1948 को कीर्तिनगर में बंधनों से मुक्ति को जनसैलाब उमड़ पड़ा। राजा के चंद सिपाहियों ने जनाक्रोश के भय से अपनी हिफाजत की एवज में बंदूकें जनता को सौंप दी। इसी बीच सत्याग्रहियों की जनसभा में कचहरी पर कब्जा करने का फैसला हुआ। पहले ही एक्शन में कचहरी पर तिरंगाफहराने लगा। खबर जैसे ही नरेन्द्रनगर पहुंची तो वहां से फौज के साथ मेजर जगदीश, पुलिस अधीक्षक लालता प्रसाद व स्पेशल मजिस्टेªट बलदेव सिंह 11 जनवरी को कीर्तिनगर पहुंचे। राज्य प्रशासन ने कचहरी को वापस हासिल करने की पुरजोर कोशिश की। लेकिन जनाक्रोश के चलते उन्हें मुंह की खानी पड़ी। फौज ने आंसू गैस के गोले फेंके तो भीड़ ने कचहरी को ही आग के हवाले कर दिया।
उधर, प्रजामण्डल ने राज्यकर्मियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर इन्हें पकड़ने का जिम्मा सत्याग्रहियों को सौंपा। हालातों को हदों से बाहर होता देख अधिकारी जंगल की तरफ भागने लगे। आंदोलनकारियों के साथ जब यह खबर नागेन्द्र को लगी तो उन्होंने साथी भोलू भरदारी के साथ पीछा करते हुए दो अधिकारियों को दबोच लिया। सकलानी बलदेव के सीने पर चढ़ गये। खतरा भांपकर मेजर जगदीश ने फायरिंग का आदेश दिया। जिसमें दो गोलियां नागेन्द्र व भरदारी को लगी, और इस जनसंघर्ष में दोनों क्रांतिकारियों शहीद हो गये। शहादत के गमगीन माहौल में राजतंत्र एक बार फिर हावी होता कि, तब ही पेशावर कांड के वीर योद्धा चन्द्रसिंह गढ़वाली ने नेतृत्व अपने हाथ में लिया था।
12 जनवरी 1948 के दिन शहीद नागेन्द्र सकलानी व भोलू भरदारी की पार्थिव देहों को लेकर आंदोलनकारी टिहरी रवाना हुए। अवाम ने पूरे रास्ते अमर बलिदानियों को भावपूर्ण श्रद्धांजलियां दी। 15 जनवरी को शहीद यात्रा के टिहरी पहुंचने से पहले ही वहां भारी आक्रोश फैल चुका था। जिससे डरकर राजा मय लश्कर नरेन्द्रनगर भाग खड़ा हुआ। ऐसे में सत्ता जनता के हाथों में आ चुकी थी। और फिर आखिरकार 1 अगस्त 1949 को टिहरी के इतिहास में वह भी दिन आ पहुंचा जब भारत सरकार ने उसे उत्तर प्रदेश में शामिल कर पृथक जिला बनाया। निश्चित ही नया राज्य ऐसे ही जनसंघर्षों का फलित है। जोकि एक बेहतर आदमी की सुनिश्चिताके बगैर आज भी अधूरी हैं।

Monday, January 10, 2011

संघर्ष की प्रतीक रही टिहरी की कुंजणी पट्टी

देवभूमि उत्तराखंड वीरों को जन्म देने वाली भूमि के नाम पर भी जानी जाती है। इसी राज्य में टिहरी जनपद की हेंवलघाटी के लोगों की खास पहचान इतिहास रहा है। इतिहास के पन्नों पर घाटी के लोगों की वीरता के किस्से कुछ इस तरह बयां हैं कि उन्होंने कभी अन्याय अत्याचार सहन नहीं किया और अपने अधिकारों संसाधनों की लड़ाई को लेकर हमेशा मुखर रहे।
राजशाही के खिलाफ विद्रोह जनता के हितों के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले अमर शहीद श्रीदेव सुमन का नाम आज हर किसी की जुबां पर है, लेकिन सचाई यह है कि हेंवलघाटी के लोग उनसे भी पहले टिहरी रियासत के खिलाफ बगावत का बिगुल बजा चुके थे। श्रीदेव सुमन से 30 वर्ष पूर्व तक हेंवलघाटी के नागणी के नीचे ऋषिकेश तक कुंजणी पट्टी कहलाती थी। वर्ष 1904 में टिहरी गढ़वाल रियासत में जंगलात कर्मचारियों का आतंक बेतहाशा बढ़ गया था। रियासत के अन्य इलाकों में जहां उनके अन्याय बढ़ते गए तो कुंजणी पट्टी के लोगों ने इसके खिलाफ आवाज बुलंद की। उनके इस अभियान को इतिहास में 'कुंजणी की ढंडक' के नाम से जाना जाता है। 
जुलाई 1904 में नरेन्द्रनगर के मौण, खत्याण के भैंस पालकों के डेरे थे। तब भैंसपालकों से पुच्छी वसूला जाता था। तत्कालीन कंजर्वेटर केशवानंद रतूड़ी समेत जंगलात के कर्मचारी मौके पर गए मौण, खत्याड़ के भैंसपालकों से मनमाने ढंग से पुच्छी मांगी। मना करने पर कर्मचारियों ने उनके दूध-दही के बर्तन फोड़ दिए। इस पर भैंसपालक भड़क गए। भैंसपालकों के मुखिया रणजोर सिंह ने कंजर्वेटर के गाल पर चाटे जड़ दिए। इस पर रणजोर उसके छह साथी गिरफ्तार कर लिए गए। रास्ते में फर्त गांव के भीम सिंह नेगी, जो उस समय मुल्की पंच प्रतिष्ठित व्यक्ति थे, ने कंजर्वेटर को रोका रणजोर को छोड़ने को कहा, लेकिन कंजर्वेटर नहीं माना। इस पर भीम सिंह ने बेमर गांव के अमर सिंह को बुलावा भेजा। अमर सिंह की गिनती तब क्षेत्र के दबंग लोगों में होती थी। अमर सिंह मौके पर पहुंचे, हालात की जानकारी ली और भैंसपालकों से विरोध करने को कहा। इस पर राणजोर सिंह सहित दूसरे लोगों ने हथकड़ियां पत्थर पर मारकर तोड़ दी। सबने मिलकर जंगलात के लोगों की धुनाई की और कंजर्वेटर को घोड़े से गिराकर कमरे में बंद कर दिया।  
इसके बाद अमर सिंह ने तमाम मुल्की पंचों को बुलाकर बैठक की, जिसमें कखील के ज्ञान सिंह, स्यूड़ के मान सिंह, आगर के नैन सिंह, कुड़ी के मान गोपाल सहित दर्जन भर लोग बुलाए गए। लोगों को इकट्ठा कर आगराखाल, हाडीसेरा, भैंस्यारौ, बादशाहीथौल में विशाल सभाएं की गई। उसके बाद लोग जुलूस लेकर टिहरी पहुंचे। पंचों ने ऐलान कर दिया था कि जो व्यक्ति और गांव इस ढंडक में शामिल नहीं होगा, उसे बिरादरी से अलग कर दिया जाएगा। कंजर्वेटर ने पंचों सहित दूसरे लोगों पर मारपीट सहित कई आरोप लगाए। राजमाता गुलेरिया के कहने पर कीर्तिशाह ने लोगों की मांगों पर गंभीरता से विचार किया तथा देवगिरी नामक साध्वी, जो क्षेत्र में वर्षो से रह रही थीं, के कहने पर लोगों को आरोपों से बरी कर दिया। इसके अलावा पुच्छीकर भी समाप्त कर दिया। लोगों की वन में चरान-चुगान खुला रखने की मांग भी मान ली गई। 
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