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Wednesday, December 01, 2010

चौंठी भुक्कि

छौं मि ये ही मुल्क कु,
भुलिग्यों यख कि माया
भुलिग्यों वा चौंठी भुक्कि,
कोख जैंन मि खिलाया

कन नचदा रांसौं मण्डाण,
चड़दा कन युं ऊंचा डांडौं
क्या च कौंणि कंडाळी कु स्वाद,
हिसर खिलदा कन बीच कांडौं
भुलिग्यों दानों कु मान,
सेवा पैलगु शिमान्या

कैन बंटाई पुंगड़्यों कि धाण,
द्याई कैन गौं मेळ्वाक
कख च बगणि धौळी गंगा,
गैन कख सी काख कांद
याद नि च रिंगदा घट्ट,
चुलखांदों कि आग खर्याया

रुड़्यों धर मा फफरांदी पौन,
ह्‍युंदै कि निवाति कुणेटी
मौ कि पंचमी, भैला बग्वाळ्,
दंग-दंगि सि पैडुल्या सिलोटी
बणिग्यों मि इत्यास अफ्वू मा,
बगदिग्यों थमण नि पाया

Source : Jyundal (A Collection of Garhwali Poems)
Copyright@ Dhanesh Kothari

Monday, November 29, 2010

दारु

दारु !
पगळीं च बगणि च
डांडी कांठ्यों धरु-धरु
पीड़ बिसरौण कु
माथमि, द्यब्तौं सि सारु

गंगा उंद बगदी
दारु उबां-उबां टपदी
पैलि अंज्वाळ् अदुड़ि/
फेर, पव्वा सेर
जै नि खपदी
हे राम! दअ बिचारु

गबळान्दि बाच
ढगड्यांदि खुट्टी
अंगोठा का मुखारा
अंग्रेजी फुकदी गिच्ची
कुठार रीता शरेल् पीता
ठुंगार मा लोण कु गारु

पौंणै बरात
मड़्वयों कु सात
बग्त कि बात
दारु नि हात
त क्य च औकात
छौंदि मा कु खारु

नाज मैंगु काज मैंगु
आज मैंगु रिवाज मैंगु
दारु बोदा त
दअ बै क्य च फारु

Source : Jyundal (A Collection of Garhwali Poems)
Copyright@ Dhanesh Kothari

Sunday, November 28, 2010

सौदेर

माया का सौदेर छां हम
इन्कलाब जिन्दाबाद
बैर्यों बग्तौ चेति जावा
निथर होण मुर्दाबाद

कथगै अंधेरू होलु
हम उज्याळु कैद्योंला
भाना कि बिंदुलि मा
गैणौं तैं सजै द्योंला
हम सणि अळ्झाण कु
कत्तै करा न घेरबाड़

हत्तकड़ी मा जकड़ि पकड़ी
जेल भेजा चा डरा
बणिगेन हथगुळी मुट्ट
इंतजार अब जरा
लांकि मा च प्रण प्रण
लौटा छोड़ा हमरी धद्द

क्रांतिकारी भौंण गुंजणी
हिमाला कु सजायुं ताज
मौळ्यार कि टक्क धरिं च
घाम बि जग्वाळ् आज
हम सणिं बिराण कु
जम्मै न कर्यान् उछ्याद

Source : Jyundal (A Collection of Garhwali Poems)
Copyright@ Dhanesh Kothari

Friday, November 26, 2010

फेक्वाळ्

भुयां खुट्ट धन्नौ जगा नि
अंरोंगु कखि छोड़युं नि
संगति फैल्यान्
सेमा सि फेक्वाळ्

धुर्पळा कि पठाळी उठा
चौक का तीर जा
तिबारि मा
ह्‌यूंदौ घाम तपदु
रात्यों हुंगरा लगान्द देखा

खालि जांद्रा घुमौन्दु
बांजा घट्टुं भग्वाड़ि मंगदु
खर्ड़ी डाल्यों छैल घाम तपदु
रीता उर्ख्याळौं कुटद
गंज्याळु सी देखा

चम्म सुलार कुर्ता
ट्वपली मा
मंगत्यों कि टोल
बर्खदा बसग्याळ्
छुमछ्योंदा अकाळ्
दिल्ली का दिलन्
देरादुण कु पैसा
लुटौंदु देखा

संगति फैल्यान्...

Source : Jyundal (A Collection of Garhwali Poems)
Copyright@ Dhanesh Kothari

Monday, November 22, 2010

कौन डरता है खंडूरीराज से ?

क्या भविष्य में भी भारतीय जनता पार्टी पूर्व मुख्यमंत्री रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल भुवनचंद्र खंडूरी के नेतृत्व में दुबारा चुनाव के मैदान में कुद सकेगी? बाबा रामदेव के दो करोड़ की रिश्वत के खुलासे के बाद शायद यह सवाल उत्तराखण्ड के बहुत से लोगों को मथ रहा होगा। हालांकि अभी किसी के नाम का खुलासा नहीं हुआ है। हो सकता है कि समय रहते कंट्रोलरों के द्वारा सब कुछ नेपथ्य में धकेल दिया जाय और खुलासे का बुलबुला फूटने से पहले ही सिकुड़ जाये। यहां सवाल यह भी उभरकर सामने आता है कि आखिर खंडूरी राज से किसे डर लगता है। उत्तराखण्ड राज्य के वर्तमान विपक्ष को, पार्टी के ही कुछ सहयोगियों को, नौकरशाहों को, माफिया तंत्र को या फिर बाबा रामदेव को जो अब अपनी राजनीतिक पारी को शुरू करने की जमीन बनाने लगे हैं। अतीत में इसका कुछ अहसास मिल जायेगा। जब फ्लैश बैक में जाकर उस दिन को देखा जाय, जब खंडूरी राज की विदाई के बाद तत्कालीनडरे हुए लोगों की भीड़ नये राजा के देहरादून पहुंचने और ताजपोशी होने तक उन्मादित थी। दूसरा गुजरा हुआ लोकसभा चुनाव जिसमें कांग्रेस को राज्य की पांचों सीट आसानी से जितने दी गई थी। इसी फ्लैश बैक में देखें तो निश्चित ही खंडूरी के शासनकाल में भू माफियाओं को अपने धंधे की वाट लगती दिखाई दी। नौकरशाहों के साथ ही ट्रांसफर-पोस्टिंग से गुजारा करने वालों में भी असहजता रही। अपने नेताओं पर चुनाव में पैसा लगा चुके लोगों की बेहतर रिर्टन की उम्मीद धूमिल होने लगी थी। ऐसा ही काफी कुछ है जिसे सिलसिलेवार गिना जा सकता है। आज के परिदृश्य में देखें तो तिवारीराज की ताजगी सभी को दिखाई दे रही है। लाल नीली बत्तियों के साथ ही गाहेबगाहे ठसक के दर्शन हो रहे हैं। मलाई के लिए बीते कुंभ के बाद प्रकृति ने भी मेहरबानी कर आपदा का मुंह खोल दिया। साहित्य से लालित्य तक हर तरफ खुशगवार मौसम दिख रहा है। ऐसे में यदि आंकलन करें और माने की अगले चुनाव में क्या होगा? तो साफ लगता है कि डरने वालों की फेहरिस्त लंबी हो सकती है। लिहाजा यदि आने वाले दिनों में एक ही नहीं कई बाबा दुर्वासा का स्वांग भर लें तो अचरज में नहीं आना चाहिए। बाबा रामदेव का अधूरा सच (क्योंकि नामों का खुलासा अब तक नहीं हुआ है) तो यही कुछ संकेत देता है। सो जब जनरल जंग के मैदान में पैदल हो जायेंगे तो चित्त-पट्ट के खेल को मनमाफिक खेला जा सकता है। लेकिन इसके आगे भी एक ताकत है जो आज भी कुछ उसी अंदाज में (उत्तराखण्ड से तो उप्र ही अच्छा था ) कहती है कि, खंडूरीराज इस नवेले राज्य के लिए बेहतर था।

Sunday, November 21, 2010

सिखै

सि
हमरा बीच बजार
दुकानि खोली
भैजी अर भुला
ब्वन्न सिखीगेन

मि
देळी भैर जैकि
भैजी अर भुला
ब्वन्न मा
शर्माणूं सिखीग्यों

Copyright@ Dhanesh Kothari

Sunday, October 31, 2010

पण कब तलक

मेरा बिजाल्यां बीज अंगर्ला
सार-खार मेरि भम्मकली
गोसी कबि मेरु भुक्कि नि जालू
कोठार, दबलौं कि टुटलि टक्क
पण, कब तलक

मेरा जंगळूं का बाघ
अपणा बोंण राला
मेरा गोठ्यार का गोरु बाखरा
उजाड़ जैकि
गेड़ बांधी गाळी ल्याला
दूद्याळ् थोरी रांभी कि
पिताली ज्यू पिजण तक
पण, कब तलक

मेरा देशूं लखायां
फिर बौडिक आला
पुंगड़्यों मा मिस्यां डुट्याळ
फंड्डु लौटी जाला
पिठी कू बिठ्गु
मुंड मा कू भारू
कम ह्वै जालु
कुछ हद तक
पण, कब तलक

Copyright@ Dhanesh Kothari
Photo source- Mera pahad

Wednesday, October 27, 2010

बाघ

बाघ
  गौं मा    
जंगळुं मा मनखि   
ढुक्यां छन रात
-दिन 

डन्ना छन घौर-बौण द्‌वी   
लुछणान्‌ एक हैंका से आज-भोळ    
अपणा घौरूं मा ज्यूंद रौण कू संघर्ष   
आखिर कब तक चाटणा, मौळौणा रौला अपणा घौ     
क्य ह्‍वे सकुलु कबि पंचैती फैसला केरधार का वास्ता      
या मनख्यात जागली कबि कि पुनर्स्थापित करद्‍यां वे जंगळुं मा   
Copyright@ Dhanesh Kothari

बोये जाते हैं बेटे/और उग आती हैं बेटियां

क्यों अच्छी नहीं लगती बेटी

बोलना चाहती है औरत

Thursday, October 21, 2010

काव्य आन्दोलनों का युग १९७६- से २०१० तक

सन १९७६ से २०१० तक भारत को कई नए माध्यम मिले और इन माध्यमों ने गढ़वाली कविता को कई तरह से प्रभावित किया। यदि टेलीविजन/ऑडियो वीडियो कैसेट माध्यम ने रामलीला व नाटको के प्रति जनता में रूचि कम की तो साथ ही आम गढ़वाली को ऑडियो व वीडियो माध्यम भी मिला। जिससे गढ़वाली ललित साहित्य को प्रचुर मात्र में प्रमुखता मिली।
माध्यमों की दृष्टि से टेलीविजन, ऑडियो, वीडियो, फिल्म व इन्टरनेट जैसे नये माध्यम गढ़वाली साहित्य को उपलब्ध हुए। और सभी माध्यमों ने कविता साहित्य को ही अधिक गति प्रदान की।
सामाजिक दृष्टि से भारत में इमरजेंसी, जनता सरकार, अमिताभ बच्चन की व्यक्तिवादी-क्रन्तिकारी छवि, खंडित समाज में व्यक्ति पूजा वृद्धि, समाज द्वारा अनाचार, भ्रष्टाचार को मौन स्वीकृति; गढ़वालियों द्वारा अंतरजातीय विवाहों को सामाजिक स्वीकृति, प्रवासियों द्वारा प्रवास में ही रहने की (लाचारियुक्त?) वृति और गढ़वाल से युवा प्रवासियों की अनिच्छा, कई तरह के मोहभंग, संयुक्त परिवारों का सर्वथा टूटना, प्राचीन सहकारिता व्यवस्था का औचित्य समाप्त होना, ग्रामीण व्यवस्था पर शहरीकरण का छा जाना; गढ़वालियों द्वारा विदेश गमन; सामाजिक व धार्मिक अनुष्ठानो में दिखावा प्रवृति, पहाड़ी भू-भाग में कृषि कार्य में भयंकर ह्रास; गांव के गांव खाली हो जाना, आदि सामाजिक परिवर्तनों ने गढ़वाली कविताओं को कई तरह से प्रभावित किया। हेमवती नंदन बहुगुणा द्वारा इंदिरा गाँधी को चैलेंज करना जैसी घटनाओं का कविता पर अपरोक्ष असर पडा। व्यवस्था पर भयंकर चोट करना इसी घटना की एक उपज है।
जगवाळ फिल्म के बाद अन्य फिल्मों का निर्माण; गढ़वाली साहित्यिक राजधानी दिल्ली से देहरादून स्थानांतरित होना व पौड़ी, कोटद्वार, गोपेश्वर, स्युन्सी बैजरों जैसे स्थानों में साहित्यिक उप राजधानी बनने ने भी कविताओं को प्रभावित किया। गढ़वाली कवियों व आलोचकों ने गढ़वाली को अन्तरराष्ट्रीय भाषाई स्तर देने की कोशिश भी इसी समय दिखी।
कवित्व व कविता की दृष्टि से यह काल सर्वोत्तम काल माना जाएगा और अभास भी देता है। आने वाला समय गढ़वाली कविता का स्वर्णकाल होगा। इस काल में शैल्पिक संरचना, व्याकरणीय संरचना, आतंरिक संरचना- वाक्य, अलंकार, प्रतीक, बिम्ब, मिथ, फैन्तासी, लय, विरोधाभास, व्यंजना, विडम्बना, पारम्परिक लय, शास्त्रीय लय, मुक्त लय, अर्थ लय, में कई नए प्रयोग भी हुए तो परंपरा का भी निर्भाव हुआ। सभी अलंकारों का खुलकर प्रयोग हुआ है और सभी रसों के दर्शन इस काल की गढ़वाली कविताओं में मिलता है। कलेवर, संरचना के हिसाब से भी कई नए कलेवर इस वक्त गढ़वाली कविताओं में प्रवेश हुए। यथा हाइकु।
कवित्व की अन्य दृष्टि में भी संस्कृत के पारंपरिक सिद्धांत, काव्य सत्य, आदर्शवाद, उद्दात स्वरूप, औचित्य, विभिन्न काव्य प्रयोजन, नव शास्त्रवाद, काल्पनिक, यथार्थपरक, जीवन की आलोचना, सम्प्रेष्ण, स्वछ्न्द्वाद, कलावाद, यथार्थवाद, अतियथार्थवाद, अभिव्यंजनावाद, प्रतीकवाद, अस्तित्ववाद, धर्मपरक, अद्ध्यात्मपरक, निर्व्यक्तिता, व्यक्तिता, वस्तुनिष्ठ - कविता संग्रहों में अबोध बंधु सम्पादित शैलवाणी (१९८०) एवं मदन डुकलान सम्पादित व भीष्म कुकरेती द्वारा समन्वय सम्पादित चिठ्ठी-पतरी (अक्टुबर २०१०) का बृहद कविता विशेषांक व अंग्वाळ (प्रकाशनाधीन, जिसमें गढ़वाली कविता का इतिहास व तीन सौ से अधिक कवियों की कविता संकलित हैं) विशिष्ठ संग्रह हैं। कई खंडकाव्य भी इस काल में छपे हैं।  अन्य कविता संग्रहों में जो की विभिन्न कवियों के कवियों की कविता संकलन हैं में ग्वथनी गौ बटे (सं. मदन डुकलान), बीजिगे कविता (सं. मधुसुदन थपलियाल) एवं ग्वै (सं.तोताराम ढौंडियाल) इस काल के कवियों की फेरिहस्त लम्बी है,
इस तरह हम पाते हैं कि आधुनिक गढ़वाली काव्य अपने समय कि सामाजिक परिस्थितियों को समुचित रूप से दर्शाने में सक्षम हो रही है और समय के साथ संरचना व नए सिद्धान्तों को भी अपनाती रही है।
उत्तराखंड आन्दोलन, हिलांस पत्रिका आन्दोलन, धाद द्वारा ग्रामीण स्तर पर कवि सम्मलेन आयोजन आन्दोलन, कविता पोस्टर, प्रथम गढ़वाली भाषा दैनिक समाचार पत्र गढ़ऐना का प्रकाशन, चिट्ठी-पतरी, उत्तराखंड खबरसार, गढ़वालै धै या रन्तरैबार जैसे पत्रिकाओं या समाचार पत्रों का दस साल से भी अधिक समय तक प्रकाशित होना, उत्तराखंड राज्य बनाना आदि ने भी गढ़वाली कविता को प्रभावित किया। समीकरण, विद्वतावाद; व्क्रोक्तिवाद, आदि सभी इस युग की कविताओं में मिल जाती हैं। काव्य विषय में भी विभिन्नता है सभी तरह के विषयों की कविता इस काल में मिलती हैं अबोध बंधु बहुगुणा का भुम्याल, कन्हैयालाल डंडरियाल का नागराजा (पाँच भाग) और प्रेमलाल भट्ट का उत्तरायण जैसे महाकाव्य इस काल की विशेष उपलब्धि हैं। विशेष उल्लेखनीय मानी जाएँगी। 
गढ़वाली कवितावली का द्वितीय संस्करण भी एक ऐतिहासिक घटना है। कुमाउनी, गढ़वाली भाषाओं के विभिन्न कवियों की कविता संकलन एक साथ दो संकलन प्रकाशित हुए हैं। दोनों संग्रहों उड़ घेंडुड़ी और डांडा कांठा के स्वर के संपादक गजेन्द्र बटोही हैं। पूरण पंत पथिक’, मदन डुकलान, लोकेश नवानी, नरेंद्र सिंह नेगी, हीरा सिंह राणा, नेत्रसिंह असवाल, गिरीश सुंदरियाल, वीरेन्द्र पंवार, जयपाल सिंह रावत 'छ्‌यपड़ु दा’, हरीश जुयाल, मधुसुदन थपलियाल, निरंजन सुयाल, धनेश कोठारी, वीणापाणी जोशी, बीना बेंजवाल, नीता कुकरेती, शांति प्रसाद जिज्ञासु, चिन्मय सायर, देवेन्द्र जोशी, बीना पटवाल कंडारी, डा. नरेंद्र गौनियाल, महेश ध्यानी, दीन दयाल बन्दुनी, महेश धस्माना, सत्यानन्द बडोनी, डा. नन्द किशोर हटवाल, ध्रुब रावत, गुणानन्द थपलियाल, कैलाश बहुखंडी, मोहन बैरागी, सुरेश पोखरियाल, मनोज घिल्डियाल, कुटज भारती, नागेन्द्र जगूड़ी नीलाम्बर, दिनेश ध्यानी, देवेन्द्र चमोली, सुरेन्द्र दत्त सेमल्टी, चक्रधर कुकरेती, विजय कुमार भ्रमर, बलवंत सिंह रावत, सुरेन्द्र पाल, भवानी शंकर थपलियाल, खुशहाल सिंह रावत, रजनी कुकरेती, दिनेश कुकरेती, श्री प्रसाद गैरोला, रामकृष्ण गैरोला, राकेश भट्ट, महेशानन्द गौड़, शक्ति ध्यानी, जबर सिंह कैन्तुरा, डा. राजेश्वर उनियाल, संजय सुंदरियाल, प्रीतम अपच्छयाण, डा. मनोरमा ढौंडियाल, देवेन्द्र कैरवान, अनसूया प्रसाद डंगवाल, विपिन पंवार, विवेक पटवाल, जगमोहन सिंह जयाड़ा, विनोद जेठुरी, सुशील पोखरियाल, शशि हसन राजा, हेमू भट्ट हेमू, गणेश खुगसाल, डा. नन्दकिशोर ढौंडियाल, डा. प्रेमलाल गौड़ शास्त्री, मोहनलाल ढौंडियाल, सतेन्द्र चौहान, शकुंतला इस्टवाल, विश्वप्रकाश बौड़ाई, अनसूया प्रसाद उपाध्याय, राजेन्द्र प्रसाद भट्ट, शिव दयाल शलज, शशि भूषण बडोनी, बच्चीराम बौड़ाई, संजय ढौंडियाल, कुलबीर सिंह छिल्ब्ट, चित्र सिंह कंडारी, अनिल कुमार सैलानी, रणबीर दत्त, चन्दन, रामस्वरूप सुन्द्रियाल, सुशील चन्द्र, अशोक कुमार उनियाल यज्ञ, दर्शन सिंह बिष्ट, तोताराम ढौंडियाल, ओमप्रकाश सेमवाल, सतीश बलोदी, सुखदेव दर्द, देवेश जोशी, गिरीश पन्त मृणाल, मायाराम ढौंडियाल, लीलानन्द रतूड़ी, रमेश चन्द्र संतोषी, गजेन्द्र नौटियाल, सिद्धिलाल विद्यार्थी, विमल नेगी, नरेन्द्र कठैत, रमेश चन्द्र घिल्डियाल, हरीश मैखुरी, मुरली सिंह दीवान, विनोद उनियाल, अमरदेव बहुगुणा, गिरीश बेंजवाल, ब्रजमोहन शर्मा, ब्रजमोहन नेगी, सुनील कैंथोला, हरीश बडोला, उद्भव भट्ट, दिनेश जुयाल, दीपक रावत, पृथ्वी सिंह केदारखण्डी, बनवारी लाल सुंदरियाल व एन शर्मा, मदन सिंह धयेडा, मनोज खर्कवाल, सतीश रावत, मृत्युंजय पोखरियाल, हरिश्चंद्र बडोला मुख्य कवि हैं।  
@Bhishma Kukreti

Wednesday, October 20, 2010

अनसिक्योर्टी


 
डाल्यों फरैं
अंग्वाळ बोट
ताकि,
डाल्यों तैं
अनसिक्योर्टी फील न हो
Copyright@ Dhanesh Kothari

मेरि पुंगड़्यों


मेरि पुंगड़्यों
हौरि धणि अब किछु नि होंद
पण, नेता खुब उपजदन्
 
मेरि पुंगड़्यों
बीज बिज्वाड़
खाद पाणि
लवर्ति-मंड्वर्ति
किछु नि चैंद
स्यू नाज पाणि
डाळा बुटळा
खौड़ कत्यार तक
किछु नि होंद
पण, नेता खुब उपजदन्
 
मेरि पुंगड़्यों
यू न घामन् फुकेंदन्
न पाळान् अळैंदन्
न ह्यूंद यूं कु ठिणीं
न रूड़्यों यि ठंगरेंदन्
बसगाळ, बिजुग्ति बर्खि बि
यूंकि चाना नि पुरोंद
झाड़-झंक्काड़
हर्याळी का आसार
किछु नि दिखेन्दन्
पण, नेता खुब उपजदन
 
Copyright@ Dhanesh Kothari

१९५१ से १९७५ तक

सारे भारत में स्वतंत्रता उपरान्त जो बदलाव आये वही परिवर्तन गढ़वाल व गढ़वाली प्रवासियों में भी आये, स्वतंत्रता का सुख, स्वतंत्रता से विकास, इच्छा में तीव्र वृद्धि, समाज में समाज से अधिक व्यक्तिवाद में वृद्धि, आर्थिक स्थिति व शिक्षा में वृद्धि, राजनेताओं द्वारा प्रपंच वृद्धि आदि इसी समय दिखे गये हैं।
गढ़वाल के परिपेक्ष में पलायन में कई गुणा वृद्धि, मन्यार्डरी अर्थव्यवस्था से कई सामजिक परिवर्तन, औरतों का प्रवास में आना, संयुक्त परिवार से व्यक्तिपुरक परिवार को महत्व मिलना, गढ़वालियों द्वारा, सेना में उच्च पद पाना, होटलों में नौकरी से लेकर आईएएस ऑफिसर की पदवी पाना, नौकरीपेशा वालों को अधिक सम्मान, कृषि पर निर्भरता की कमी, कई सामाजिक-धार्मिक कुरुरीतियों में कमी। किन्तु नयी कुरीतियों का जन्म, हेमवती नंदन बहुगुणा का धूमकेतु जैसा पदार्पण या राजनीती में चमकना, गढ़वाल विश्वविद्यालय, आकाशवाणी नजीबाबाद जैसे संस्थानों का खुलना, देहरादून का गढ़वाल कमिश्नरी में सम्मलित किया जाना, १९६९ में कांग्रेस छोड़ उत्तरप्रदेश में संविद सरकार का बनना, फिर संविद सरकार से जनता का मोहभंग होना, गढ़वाल चित्रकला पुस्तक का प्रकाशन, उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा गढ़वाली साहित्य को पहचान देने, चीन की लड़ाई, मोटर बस रास्तों में वृद्धि, लड़कियों की शिक्षा को सामाजिक प्रोत्साहन, अंतरजातीय विवाहों की शुरूआत (हेमवती नंदन बहुगुणा व शिवानन्द नौटियाल उदाहरण हैं), जाड़ों में गृहणियों द्वारा परदेश में पति के पास भेजने की प्रथा का आना, पुराने सामाजिक समीकरणों का टूटना व नए समीकरणों का बनना आदि इस युग की विशेषताएं है, चौधरी चरण सिंह द्वारा हिंदी की वकालत हेतु अंग्रेजी विषय को माध्यमिक कक्षाओं से हटाना जैसी राजनैतिक घटनाओं ने भी गढ़वाली समाज पर प्रभाव डाला। जिसका सीधा प्रभाव गढ़वाली कवियों व उनकी कविताओं पर पड़ा।
कविता के परिपेक्ष में सामाजिक संस्थाओं द्वारा साहित्य को अधिक महत्व देना, गढ़वाली साहित्यिक राजधानी दिल्ली का बन जाना, कवि सम्मेलनों का विकास, नाटकों का मंचन वृद्धि, साहित्यिक गोष्ठियों का अनुशीलन, जीत सिंह नेगी की अमर कृति तू ह्वेली बीराका रचा जाना, मैको पाड़ नि दीण और घुमणो कु दिल्ली जाणजैसे लोकगीतों का अवतरण, लोकगीतों का संकलन एवं उन पर शोध, चन्द्र सिंह राही का पदार्पण आदि मुख्य घटनाएँ हैं।
कविताओं ने नए कलेवर भी धारण किये, इस युग में कई नए प्रयोग गढ़वाली कविताओं में मिलने लगे,
अबोधबंधु बहुगुणा, कन्हैयालाल डंडरियाल, जीत सिंह नेगी, गिरधारी लाल थपलियाल कंकाल’, ललित केशवान, जयानंद खुकसाल बौळया’, प्रेमलाल भट्ट, सुदामा प्रसाद डबराल 'प्रेमी', जैसे महारथियों के अतिरिक्त पार्थसारथि डबराल, नित्यानंद मैठाणी, शेरसिंह गढ़देशी, डा. गोविन्द चातक, गुणानन्द पथिक, भगवन सिंह रावत अकेला’, डा. शिवानन्द नौटियाल, महेश तिवाड़ी,
पुराने छंद गीतेय शैली से भी मोह, हिंदी भाषा पर कम्युनिस्ट प्रभाव भी गढ़वाली कविता में आने लगा, अनुभव गत विषय, रियलिज्म, व्यंग्य में नई धारा, नये बिम्ब व प्रतीक, प्रेरणादायक कविताओं से मुक्ति से छटपटाहट, पलायन से प्रवासियों व वासियों के दुःख, शैलीगत बदलाव, विषयगत बदलाव, कवित्व में बदलाव आदि इस युग की देन हैं और इस युग की गढ़वाली कविताओं की विशेषता भी है। मानवीय संवेदनाओं को इसी युग में नयी पहचान मिली। शिवानन्द पाण्डेय प्रमेश’, रामप्रसाद गैरोला, जगदीश बहुगुणा किरण’, महावीर प्रसाद गैरोला, चन्द्र सिंह राही, डा. उमाशंकर थपलियाल 'समदर्शी', डा उमाशंकर थपलियाल 'सतीश', ब्रह्मानंद बिंजोला, भगवन सिंह कठैत, महिमानन्द सुन्द्रियाल, सचिदानन्द कांडपाल, रघुवीर सिंह रावत, डा. पुरुषोत्तम डोभाल, परशुराम थपलियाल, मित्रानंद डबराल शर्मा, श्रीधर जमलोकी, जीवानन्द श्रीयाल, कुलानन्द भारद्वाज 'भारतीय', मुरलीमनोहर सती गढ़कवि’, वसुंधरा डोभाल, उमादत्त नैथाणी, सर्वेश्वर जुयाल, अमरनाथ शर्मा, विद्यावती डोभाल, ब्रजमोहन कबटियाल, चंडी प्रसाद भट्ट व्यथित’, गोविन्द राम सेमवाल, जयानंद किशवान, शम्भू प्रसाद धस्माना, जग्गू नौडियाल, घनश्याम रतूड़ी, धर्मानन्द उनियाल, बद्रीश पोखरियाल, जयंती प्रसाद बुड़ाकोटी, पाराशर गौड़ जैसे कवि मुख्य हैं। इनमे से कईयों ने आगे जाकर कई प्रसिद्ध कवितायेँ गढ़वाली कविता को दीं। जैसे पाराशर गौड़ का इन्टरनेट माध्यम में कई तरह का योगदान
 @Bhishma Kukreti