Tuesday, April 24, 2012

उत्तराखंड जनमंच के जल अधिकार सम्मेलन

उत्तराखंड जनमंच के जल अधिकार सम्मेलन में शामिल संगठनों ने केंद्र सरकार को चेतावनी दी है यदि 28 अप्रैल तक विष्णुगाड-पीपलकोटी, लोहारीनाग पाला,पाला मनेरी और भैंरों घाटी पन बिजली परियोजनाओं पर निर्माण कार्य कराने के आदेश जारी नहीं किए गए तो बद्रीनाथ के कपाट खुलने के दिन 29 अप्रैल को बद्रीनाथ राजमार्ग पर पीपलकोटी के समीप दो घंटे का सांकेतिक चक्का जाम किया जाएगा और इसी दिन बद्रीनाथ दर्शन को पहुंच रहे शंकराचार्य समेत परियोजना विरोधी संतों का बद्रीनाथ राजमार्ग पर कौड़िया में घेराव किया जाएगा। जल अधिकार सम्मेलन में शामिल अन्य प्रस्तावों मे परियोजना प्रीाावितों और विस्थापितों की समस्यायें सुलझाने के लिए एक अर्द्ध न्यायिक आयोग गठित करने और टिहरी बांध विस्थापितों के कल्याण के लिए आठ सौ करोड़ रुपयेकी शुरुआती धनराशि से कल्याण कोष स्थापित करने की मांग की है। 

http://janpakshindia.blogspot.in/2012/04/uttrakhand-janmanch-calls-for-agitation.html

Wednesday, March 14, 2012

फूल संगरांद

फूलदेई फूलदेई संगरांद
सुफल करो नयो साल तुमकु श्री भगवान
रंगीला सजीला फूल ऐगीं , डाळा बोटाला ह्र्याँ व्हेगीं
पौन पंछे दौड़ी गैन, डाळयूँ फूल हंसदा ऐन,
तुमारा भण्डार भर्यान, अन्न धन्न कि बरकत ह्वेन
औंद रओ ऋतु मॉस. होंद रओ सबकू संगरांद.
बच्यां रौला तुम हम त, फिर होली फूल संगरांद
फूलदेई फूलदेई संगरांद

Monday, February 27, 2012

‘उत्तराखंड की भाषाई विरासत को बचाना एक बड़ी चुनौती’

धाद : लोकभाषा एकांश द्वारा आयोजित  ”आखिर कैसे बचेंगी लोकभाषाएं  ” व्याख्यान माला-4

http://himwarta.com/wp-content/uploads/2012/02/dhad-himwarta.22.jpg
देहरादून (तन्मय ममगाईं) :  समाज और सरकार दोनों स्तरों पर उत्तराखंड की लोकभाषाओं की निरन्तर अनदेखी होती रही है जिसका नतीजा है के कुमाऊंनी और गढ़वाली दोनों भाषाएं अपने मूल से कटने लगी हैं। मौजूदा वक्त में भाषायी विरासत को बचाये रखना एक बड़ी चुनौती है। ये बातें सामने आईं देहरादून में हुए एक संगोष्ठी में। अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर धाद : लोकभाषा एकांश की ओर से “आखिर कैसे बचेंगी लोक भाषाएं ” व्याख्यान माला – 4 के तहत ये आयोजन किया गया था।  ’ प्राथमिक शिक्षा  में लोक भाषाओं की प्रासंगिता ‘ विषय पर ये संगोष्ठी राजेश्वर नगर सामुदायिक केंद्र , सहस्रधारा रोड में आयोजित की गई थी।
हिमालयी  लोकभाषाओं पर शोधकर्ता डाo कमला पन्त ने मुख्य वक्ता के रूप में कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि हमारी लोकभाषाओं में कुछ ऐसी विशेषताएं हैं जो अन्य भाषाओं में नहीं हैं | आज के वैश्विकरण के दबाव  में इन भाषाओं पर मंडरा रहे खतरे के प्रति हमें सजग होकर अपनी मातृभाषाओं के विकास  के लिये  इस रचनात्मक आन्दोलन  को आगे बढ़ाना चाहिए  |
धाद के संस्थापक लोकेश नवानी ने आधार वक्तव्य देते हुए कहा कि उत्तराखंड भारत का भिन्न भाषायी क्षेत्र है जिसमे गढ़वाली और कुमाउनी दो प्रमुख लोक भाषाएं हैं परन्तु समाज और सरकार दोनों स्तरों पर उत्तराखंड कि लोकभाषाओं कि निरन्तर अनदेखी होती रही है | फलतः ये भाषाएं अपने मूल से कटने लगी  हैं | आज भाषायी विरासत को बचाने एवं उसके विकास के उद्देश्य से धाद ने लोकभाषा आन्दोलन का सूत्रपात किया है |
मातृभाषा दिवस की पूर्व संध्या पर आदित्य राम नवानी लोकभाषा साहित्य सम्मान से सम्मानित एवं ‘ उत्तराखंड खबर सार ‘  के सम्पादक श्री विमल नेगी ने  यूनेस्को की  एक भाषा रिपोर्ट का जिक्र करते हुए कहा की दुनिया में 96 % लोग 4 % भाषाओं को बोलते हैं और ठीक इसके उलट 96 % भाषाओं को 4 % लोग ही बोलतें हैं | इससे स्पष्ट है की बड़ी भाषाएं छोटी भाषाओं को हजम करने में लगीं हैं |
धाद के केंद्रीय समन्वयक श्री तन्मय ममगाईं ने कहा की हाल  ही मैं प्रथम संस्था द्वारा जारी कि गयी असर 2011 की रिपोर्ट बताती है की उत्तराखंड की लगभग 67 प्रतिशत विद्यार्थियों  की स्कूली भाषा और मात्रभाषा भिन्न है इसलिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या के अनुसार  लोकभाषाओं को प्राथमिक शिक्षा का हिस्सा बनाने की बात अविलम्ब प्रारंभ होनी चाहिए।
धाद लोकभाषा एकांश के सचिव श्री शांति प्रकाश ज़िज्ञासु ने व्याख्यान माला  की रुपरेखा श्रोताओं  के सम्मुख  रखते हुए  कहा की प्राथमिक,माध्यमिक एवं विश्वविद्यालय स्तर पर लोकभाषाओं को उचित स्थान दिलाने ले लिये एक संगठित भाषायी आन्दोलन की आवश्यकता है |
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डाo कुटज भारती ने कहा की वस्तुतः  धाद का लोकभाषा आन्दोलन चतुर्मुखी  है | हमें स्वयं परिवार के बीच अपनी मातृभाषाओं में संवाद को प्राथमिकता देनी होगी तथा समाज को उसके मूल्यों के प्रति जागरूक करना होगा | संगोष्ठी को अन्य वक्ताओं ने भी संबोधित किया  जिनमें  आदित्यराम  नवानी लोकभाषा सम्मान से नवाजे गए डाo हयात  सिंह  रावत (सम्पादक  :  पहरू ,अल्मोड़ा), कवि जगदीश जोशी (कालाढूंगी,नैनीताल), युवा कवि गीतेश सिंह नेगी (मुंबई), डाo राजेन्द्र बलोधी  (देहरादून) आदि प्रमुख थे। कार्यक्रम का संचालन लोकभाषाविद डाo  अरविन्द गौड़ ने किया | साहित्यकार तोताराम ढौंढीयाल ने आमंत्रित अतिथियों एवं श्रोताओं का आभार व्यक्त किया | कार्यक्रम में अनेक बुद्धिजीवियो, कलाकारों एवं साहित्यकारों ने शिरकत कि जिनमे ख्याति प्राप्त रेखा चित्रकार बी.मोहन नेगी (पौड़ी), गणेश वीरान (पौड़ी), नवीन नौटियाल, जीतेन्द्र जुयाल ,कवियत्री बीना कंडारी, दिनेश कुकरेती (कोटद्वार), कवि धनेश कोठारी (ऋषिकेश), बी.बी.एस. रावत (कोटद्वार), रणजीत सिंह पायल, श्रीमती कमला टम्टा, शूरवीर सिंह नेगी, कृष्ण चन्द्र उनियाल,डी .एस.डोभाल, शैलेन्द्र भंडारी, विन्नी उनियाल,एन.के.शाह, धीरेन्द्र गाँधी, आर.के.ध्यानी, सतेन्द्र रावत आदि मुख्या श्रोता कार्यक्रम में उपस्थित रहे।

सौजन्‍य ... http://himwarta.com/dhad-garhwali-270212/

Wednesday, January 25, 2012

उत्‍तराखंड में दुविधा और विरोधाभास के बीच झूलती रही टीम अण्‍णा

नैनीताल। टीम अण्णा का दो दिन का उत्‍तराखण्ड दौरा विरोध, सवाल और शंकाओं से भरा रहा। टीम अण्णा ने हरिद्वार, देहरादून, हल्द्वानी और रूद्रपुर में सभाएं कर केन्द्र सरकार के लोकपाल बिल को कोसा। उत्‍तराखण्ड के लोकायुक्त विधेयक और मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खण्डूडी़ की खुद जमकर तारीफ की और लोगों से भी कराई। लगे हाथ कांग्रेस-भाजपा समेत सभी राजनीतिक दलों को भ्रष्ट करार दे दिया। टीम अण्णा ने केन्द्र के लोकपाल बिल की कमजोरियों और उत्‍तराखण्ड के लोकायुक्त विधेयक की खूबियों को लेकर उठे सवालों का जवाब देना गैर जरूरी समझा। उत्‍तराखण्ड के लोकायुक्त विधेयक की खुली हिमायत की वजह जानने की जुर्रत करने वालों का मुंह बन्द कर बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। गोकि सवाल करना सिर्फ टीम अण्णा का ही विशेषाधिकार हो। पूरे दौरे के दौरान केन्द्र के लोकपाल और उत्‍तराखण्ड के लोकायुक्त विधेयक को लेकर उठे सवालों से कन्नी काटती टीम अण्णा खुद विरोधाभासों में फॅसी नजर आई।
टीम अण्णा ने सभी जगह कमोवेश एक सी बातें दोहराई। टीम के वरिष्ठ सदस्य अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि कांग्रेस ही नहीं निशंक सरकार में भी भ्रष्टाचार हुआ है। सपा-बसपा भी भ्रष्टाचार से अछूते नहीं है। अब मौका आ गया है कि जनता भष्टाचारियों को सबक सिखायें। बकौल अरविन्द केजरीवाल उत्‍तराखण्ड के लोकायुक्त बिल को हू-ब-हू पूरे देश में लागू कर दिया जाना चाहिए। अगर केजरीवाल की इस बात को मंजूर कर लिया जाए, तो देश में ऐसा लोकपाल विधेयक आना चाहिए, जिसके चयन समिति का अध्यक्ष प्रधानमंत्री और राज्यों के संदर्भ में मुख्यमंत्री हो। लोकपाल के वार्षिक क्रियाकलापों की निगरानी के लिए लोकसभा और राज्यों के संदर्भ में विधान सभा की एक कमेटी बने। किसी को बेवजह उत्पीड़ित करने की मंशा से झूठी शिकायत करने पर शिकायतकर्ता के ऊपर एक लाख रुपये तक का जुर्माना हो, जिसकी वसूली राजस्व बकाये की भॉति की जाए। प्रधानमंत्री, केन्द्रीय मंत्रिमण्डल के सभी सदस्यों और सभी सांसदों, राज्य के मुख्यमंत्री, मंत्रिमण्डल के सभी सदस्यों और सभी विधायकों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों में तब तक जॉच या सुनवाई नहीं हो, जब तक लोकपाल की बैंच के अध्यक्ष सहित पूरी पीठ के सभी सदस्य एक राय से इस बात की इजाजत नहीं दें। यानी न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी।
जी हॉ, सरसरी नजर में ये खूबियॉ है- उत्‍तराखण्ड सरकार द्वारा पास किये गये सशक्त लोकायुक्त विधेयक की। उत्‍तराखण्ड के लोकायुक्त विधेयक की प्रस्तावना भ्रष्टाचार उन्मूलन अधिनियम-1988 से शुरू होती है। यानी यह विधेयक भ्रष्टाचार उन्मूलन अधिनियम-1988 के तहत बनाया गया है। यह केन्द्रीय एक्ट है, जो कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने के लिए अपने आप में सम्पूर्ण और सक्षम है। उत्‍तराखण्ड के लोकायुक्त विधेयक की धारा-4(9-एक) के मुताबिक लोकायुक्त के चयन के लिए एक चयन समिति बनेगी। मुख्यमंत्री इस चयन समिति के अध्यक्ष होगें। चयन समिति में नेता प्रतिपक्ष समेत छह सदस्य होगें। धारा-14(2) में लोकायुक्त के वार्षिक क्रियाकलापों की निगरानी के लिए विधानसभा की एक कमेटी गठित करने का प्राविधान रखा गया है। विधेयक की धारा-18 के मुताबिक लोकायुक्त की बैंच के अध्यक्ष सहित सम्पूर्ण पीठ के सभी सदस्यों की एक राय से इजाजत के बिना मुख्यमंत्री, मंत्रिपरिषद के किसी सदस्य और विधानसभा के किसी सदस्य के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले में जॉच या सुनवाई नहीं हो सकती है। यानी राजनीतिक भ्रष्टाचार की खुली छूट। सवाल यह है कि अगर हजारे पक्ष के लोग इस लोकायुक्त विधेयक को बेहद मजबूत और आर्दश बता रहे है, तो केन्द्र सरकार द्वारा संसद में पेश लोकपाल बिल पर उन्हें आपत्ति क्यों है?
हजारे पक्ष के उत्‍तराखण्ड के लोकायुक्त विधेयक को एक मजबूत बिल बताने की एक वजह तो समझ में आती है। वह यह कि इस विधेयक में लोकायुक्त को जॉच तथा सजा के लिए अपनी मशीनरी को नियुक्त करने का अधिकार दिया गया है। किसी शिकायत की जॉच और सजा देने वाली मशीनरी लोकायुक्त की खुद की होगी। लोकायुक्त को नियम बनाने का अधिकार दिया गया है। लोकायुक्त को मानहानि के मामले में हाईकोर्ट के बराबर अधिकार दिये गये है। लोकायुक्त में की गई शिकायत वापस नहीं ली जा सकती है। ये सभी बिन्दु टीम अण्णा के एजेन्डे में शामिल रहे हैं। टीम अण्णा ने एक ओर देश के सभी राजनीतिक दलों को भ्रष्टाचार में डूबा बताया। उत्‍तराखण्ड की निशंक सरकार को भी भ्रष्ट करार दिया। कहा कि - देश के किसी राजनीतिक दल ने जन लोकपाल बिल की सच्ची हिमायत नहीं की। लिहाजा विधानसभा चुनाव में जनता भ्रष्टाचारियों को हराये और सिर्फ ईमानदार सियासी पार्टियों को ही वोट देने की अपील की।
सवाल यह है कि बकौल टीम अण्णा घोटाले करने वाले भाजपा समेत सभी पार्टी के उम्मीदवारों को अगर जनता हरा दे, तो जीतने वाला बचेगा कौन। अगर उत्‍तराखण्ड में लोकायुक्त बिल लाने के ऐवज में जनता वोट करती है, तो खण्डूडी़ के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। मुश्किल यह है कि उत्‍तराखण्ड की विधानसभा में सत्तर सीटें है। खण्डूडी़ एक ही सीट से चुनाव लड़ रहे है। बाकी बची 69 विधानसभा सीटों पर जनता वोट दे, तो आखिर किसको दें। टीम अण्णा ने जनता को इस दुविधा से निकलने का कोई साफ रास्ता नहीं सुझाया। टीम अण्णा की इस पूरी कसरत से आम लोगों में यह संदेश साफ तौर पर गया कि टीम अण्णा लोकायुक्त विधेयक के बहाने भाजपा को मदद करने की इच्छा तो रखती हैं, लेकिन भाजपा पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों से भी दूरी बनाये रखना चाहती हैं। टीम अण्णा की इस दुविधा और विरोधाभास के चलते ही उनका उत्‍तराखण्ड दौरा कई सवालों को जन्म दे गया।
नैनीताल से वरिष्‍ठ पत्रकार प्रयाग पाण्‍डे की रिपोर्ट.
Category: यूपी-यूके इलेक्शन 2012
Published on Wednesday, 25 January 2012 16:39
Written by प्रयाग पाण्डे

पहाड़ की जनता के साथ धोखा कर रहे हैं बीसी खडूड़ी


उत्तराखंड की बीजेपी सरकार को.. खंडूड़ी है जरूरी... का एक चुनावी नारा क्या मिला कि उसने इस पहाड़ी राज्य के जनहित के मुद्दों को ही जमीन में दफना दिया है. आज जहाँ पहाड़ी क्षेत्र में रहने वाली 60 प्रतिशत महिलायें खून की कमी के जूझ रही हों तथा 72 प्रतिशत महिलायें बिना इलाज के किसी न किसी बीमारी को ढोने को मजबूर हों, वहां करोड़ों रुपये के घोटाले हो जाने के बाबजूद मुख्यमंत्री खंडूड़ी ने उन पर एक जांच बैठानी भी जरूरी नहीं समझी. खंडूरी है जरूरी.. इसलिए उनसे कुछ सवाल करने जरूरी हैं.. खंडूड़ी जी ने मुख्यमंत्री काल के दौरान पूरे पहाड़ में घूम-घूमकर निशंक पर प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से भ्रष्टाचार के आरोप लगाए लगाए.. तथा इन आरोपों के समर्थन में बीजेपी हाई कमान से लेकर आरएसएस नेताओं तक अपनी बात पहुंचाई. खंडूड़ी द्वारा पेश सुबूतों के आधार पर दिल्ली के नेताओं को अपने चहेते निशंक की बलि देनी पड़ी.
राज्य की जनता को उम्मीद थी कि मुख्यमंत्री की कुर्सी मिलते ही खंडूड़ी, भ्रष्ट लोगों को सलाखों के पीछे पंहुचाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगें. पर कुर्सी मिलते ही खंडूड़ी ने एक रहस्यमय छुपी साध ली.. अब खंडूड़ी से एक सवाल पूछना लाजिमी है कि जिस निशंक को वे भ्रष्ट बताते थे उनके बारे में कुर्सी मिलते ही उन्होंने मौन क्यों साध लिया? इसका मतलब या तो या तो निशंक ईमानदार थे और खंडूड़ी ने हाई कमान को गुमराह कर उनकी बलि ली और या फिर उनका सारा खेल कुर्सी तक ही सीमित था. कम से कम उन्हें एक जांच तो बैठानी ही चाहिए थी. वैसे वे कांग्रेस राज के 56 घोटालों की जांच बैठाकर फ्लॉप हो चुके हैं, जिसकी जांच पर लाखों रुपये खर्च होने के बाबजूद पांच साल बाद भी कुछ नहीं निकल पाया. खंडूड़ी जैसे फ़ौजी अफसर पर मुझे भी आम उत्तराखंडी की तरह गर्व है और वहां की जनता ने उन्हें फ़ौज से सेवानिवृति के बाद उम्मीद से ज्यादा दिया है.. अब उनकी बारी थी जो वे नहीं दे पा रहे हैं.
दस साल में उत्तराखंड के पहाड़ों से पलायन बढ़ा है.... दुःख की बात है कि अभी तक पहाड़ों में बागवानी के लिए कोई ठोस रणनीति नहीं बनी है यहाँ तक कि किसानों के खेतों की मिट्टी की जांच की कोई व्यवस्था भी नहीं हो सकी है. महिलाओं के हेल्थ कार्ड की बात कोई नहीं करता. बेरोजगारी चरम पर है और दो हजार वेतन पर पहाड़ी लड़के शहरों में काम करने के लिए मजबूर हैं. वहां की जमीनों को औने पौने दामों पर दलाल लूट रहे हैं. जिसको रोकने की कोई व्यवस्था नहीं हो सकी है. खंडूड़ी जी के इर्द गिर्द भ्रष्ट नौकरशाही का कब्जा अब भी मौजूद है. और सबसे खतरनाक बात यह है कि पलायन के शिकार पहाड़ का युवा ही नहीं खुद खंडूड़ी व निशंक जैसे बड़े नेता भी हुए हैं और दोनों ने कठिन पहाड़ी क्षेत्र के बजाय कोटद्वार तथा डोईवाला जैसे मैदानी क्षेत्र को चुना. उन्हें अपने गिरेवान में झाँक कर देखना होगा कि क्या वे सच्चे अर्थ में पहाड़ की सेवा करना चाहते हैं या फिर पहाड़ की राजनीति करना चाहते है..   
लेखक विजेंद्र रावत उत्‍तराखंड के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.
Published on Tuesday, 24 January 2012 20:50
Written by विजेंद्र रावत

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